पहाड़ों के गर्भ में छिपा युगों पुराना अलौकिक रहस्य: जानिए क्यों नभ-मंडल छोड़ एक पाषाण-शिला पर उतर आया था भगवान भास्कर का अखंड तेज! — @ रमाकान्त पन्त @
देवभूमि उत्तराखंड की शांत और सुरम्य पर्वतमालाओं के सीने में एक ऐसा गूढ़ और रोमांचकारी रहस्य छिपा है, जो सत्ययुग के उस रोंगटे खड़े कर देने वाले कालखंड से जुड़ा है जब समूची सृष्टि एक महाबली असुर के खौफ से कांप उठी थी। स्कन्द पुराण के ‘मानसखण्ड’ के पन्नों में दर्ज यह अमर गाथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि उस अप्रतिम ईश्वरीय चमत्कार की जीती-जागती गवाह है जिसके कारण साक्षात् भुवन-भास्कर सूर्यदेव को अपना नभ-मंडल छोड़कर सदा-सदा के लिए धरातल की एक शिला पर प्रतिष्ठित होना पड़ा था।
प्राचीन काल में कौशिकी (कोसी) और गार्गी नदी के संगम क्षेत्र में स्थित द्रोणाचल तथा कञ्जार पर्वत की शांत कंदराओं में महर्षिगण घोर तपस्या में लीन थे। तभी वहाँ कालनेमि नामक एक अत्यंत क्रूर और महाबली दैत्य का आतंक शुरू हो गया। उस दुर्दांत असुर ने ऋषियों के पावन आश्रमों को तहस-नहस कर दिया और यज्ञ की आहुतियों व सामग्रियों को जबरन छीन लिया। चारों तरफ हाहाकार मच गया। प्राण-रक्षा के लिए व्याकुल और भयभीत ऋषिगण जब भागते हुए कौशिकी नदी के तट पर पहुँचे, तो उन्होंने इस घोर संकट और अंधकार से मुक्ति पाने के लिए प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की करुण पुकार करते हुए स्तुति की:
नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे त्रयीमयायाखिलविश्वमूर्तये। दिव्यप्रकाशाय सुवर्णधारिणे सुघोरसंसारभयप्रणाशिने॥
ऋषियों के इस निश्छल और भावपूर्ण आर्तनाद को सुनकर भगवान दिवाकर अत्यंत तेजस्वी रूप में प्रत्यक्ष प्रकट हो गए। तब कांपते हुए मुनियों ने हाथ जोड़कर विनती की—”हे प्रभु! जब तक आप सम्मुख हैं, हम निर्भय हैं; किंतु जैसे ही आप अपने लोक को लौटेंगे, वह पापी असुर हमारे कुल का समूल नाश कर देगा।” अपने शरणागत भक्तों की व्याकुलता देखकर करुणा के सागर सूर्यदेव ने एक अद्भुत और अभूतपूर्व लीला रची। उन्होंने अपने संपूर्ण दिव्य तेज और तेजोमय अंश को एक पवित्र ‘वट-शिला’ पर सदा के लिए स्थापित कर दिया। उस प्रचंड दैवीय प्रकाशपुंज और ताप को देखकर काल जैसा बलशाली कालनेमि भी भय से थर्रा उठा और वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
ततःप्रभृति वै विप्रा देवो भूमण्डले स्थितः। पुण्ये वटशिलामध्ये बडादित्येति गीयते॥
उस पावन वट-शिला के मध्य दिव्य रूप में विराजमान होने के कारण ही भगवान सूर्य का यह विग्रह पूरे संसार में ‘बड़ादित्य’ (वृद्धादित्य) के नाम से विख्यात हुआ। मान्यता है कि कौशिकी नदी में स्नान करके बड़ादित्य के इस पाषाण रूप के दर्शन करने मात्र से जन्म-मृत्यु के चक्र, समस्त रोगों, पापों और भय का समूल नाश हो जाता है।
कालांतर में इसी दिव्य स्थान पर 9वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य कत्यूरी राजवंश के प्रतापी राजा कटारमल ने एक भव्य और विशाल देवालय का निर्माण कराया, जिसे आज पूरी दुनिया कटारमल सूर्य मंदिर के नाम से जानती है। ओडिशा के विश्वप्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर के बाद इसे भारत का दूसरा सबसे प्राचीन और विशाल सूर्य धाम माना जाता है।
अल्मोड़ा से दूरी और पहुँचने का मार्ग: यह पावन तीर्थ उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से रानीखेत मार्ग पर लगभग 17 से 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘कटारमल’ (अधेली सुनार) गाँव में एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। अल्मोड़ा से कोसी तक पक्की सड़क से वाहनों द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है, जिसके बाद चीड़ और बांज के घने, मनोहारी जंगलों के बीच से लगभग 1.5 किलोमीटर का सुरम्य पहाड़ी पैदल मार्ग तय करके मंदिर परिसर तक पहुँचते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम (लगभग 105 किमी) तथा निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर (लगभग 140 किमी) है।
स्थापत्य कला और खगोलीय विज्ञान का बेजोड़ संगम: पहाड़ी ढलान पर एक विशाल वर्गाकार चबूतरे पर निर्मित इस परिसर में मुख्य ‘बड़ादित्य’ मंदिर के चारों ओर नागर शैली में तराशे गए 44 छोटे-बड़े सहायक मंदिरों का समूह है, जो देखते ही बनता है। इस मंदिर की वास्तुकला इतनी सटीक और वैज्ञानिक है कि वर्ष के कुछ विशेष दिनों में प्रात:काल उगते हुए सूर्य की सबसे पहली स्वर्णिम किरण सीधे मुख्य गर्भगृह में स्थापित सूर्य प्रतिमा पर पड़ती है। मंदिर के प्राचीन, नक्काशीदार काष्ठ-द्वार इतने अनूठे थे कि उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित यह पावन धाम आज भी आस्था, इतिहास और खगोल विज्ञान का ऐसा जाग्रत केंद्र है, जहाँ कदम रखते ही हर श्रद्धालु युगों पुराने उस दिव्य भास्कर-तेज का जीवंत अहसास करने लगता है।
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