पितृ पक्ष विशेष
गरुड़ पुराण का पावन संदेश: अज्ञान में भी किया गया शिव-पूजन काट देता है यमपाश, मूल श्लोकों सहित जानें व्रत का दिव्य विधान
गरुड़ पुराण के अनुसार, प्राणी द्वारा अज्ञानवश अथवा ज्ञानपूर्वक किए गए पुण्य कभी निष्फल नहीं होते; वे अक्षय फल प्रदान करते हैं। देवाधिदेव महादेव की असीम करुणा का ऐसा ही अद्भुत प्रसंग गरुड़ पुराण (अध्याय १२८) में वर्णित है, जहाँ मात्र एक रात्रि के अनजाने शिव-स्पर्श, जागरण और जलाभिषेक से एक पापी व्याध को यमदूतों के पाश से मुक्ति मिल गई और वह सीधे शिवलोक का अधिकारी बन गया।
अर्बुद देश के निषाद राजा की पावन कथा
पौराणिक आख्यान के अनुसार, अर्बुद देश में सुंदरसेन नामक एक निषाद राजा रहता था। एक बार वह अपने कुत्तों के साथ घने वन में आखेट (शिकार) के लिए निकला, किंतु दैवयोग से उसे कोई शिकार नहीं मिला। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह रात्रि में एक जलाशय के किनारे भटकता रहा, जहाँ झाड़ियों के बीच एक शिवलिंग स्थापित था।
शारीरिक रक्षा के लिए वह उसी वृक्ष पर चढ़ गया। रातभर जागने के कारण अनजाने में वृक्ष के पत्ते टूटकर नीचे शिवलिंग पर गिरते रहे। पत्तों को हटाते समय उसने जल से शिवलिंग को प्रक्षालित (स्नान) किया। उसी समय हाथ से गिरे बाण को उठाने के लिए जब उसने घुटने टेके, तो उसका हाथ शिवलिंग से स्पर्श हो गया। इस प्रकार अज्ञानवश ही सही, उस व्याध से रात्रि-जागरण, शिवलिंग का स्नान, स्पर्श और पूजन संपन्न हो गया।
कालांतर में जब उसकी मृत्यु हुई, तो यमराज के दूत उसे पाश में बाँधकर यमलोक ले जाने लगे। तभी भगवान शिव के गणों ने आकर यमदूतों को परास्त कर दिया और व्याध को बंधनों से मुक्त करा लिया। अनजाने में किए गए इस पूजन के प्रभाव से वह निषाद अपने कुत्तों सहित निष्पाप होकर भगवान शिव का दिव्य पार्षद बन गया।
गरुड़ पुराण में वर्णित शास्त्रीय व्रत-विधान एवं मूल श्लोक
भगवान महेश्वर ने माता पार्वती को इस परम कल्याणकारी व्रत का विधान बताते हुए कहा है कि चतुर्दशी तिथि में विधिपूर्वक किया गया पूजन प्राणी को नरक-भोग से बचाता है।
१. व्रत का संकल्प
उपासक को चाहिए कि वह त्रयोदशी तिथि में शिवपूजन कर व्रत का नियम ग्रहण करते हुए इस प्रकार संकल्प करे:
प्रातर्देव चतुर्दश्यां जागरिष्याम्यहं निशि। पूजां दानं तपो होमं करिष्याम्यात्मशक्तितः॥ चतुर्दश्यां निराहारो भूत्वा शम्भो परेऽहनि। भोक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्त्यर्थं शरणं मे भवेश्वर॥
- सरल भावार्थ: हे देव! मैं रात्रिभर जागरण करूँगा। प्रातः चतुर्दशी तिथि में अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा, दान और हवन करूँगा। हे शम्भो! चतुर्दशी तिथि में निराहार रहकर अगले दिन पारण करूँगा। हे महादेव! भुक्ति (सांसारिक सुख) और मुक्ति की प्राप्ति के लिए मैं आपकी शरण में हूँ।
२. अभिषेक, हवन एवं चार प्रहर का अर्चन
व्रती को पंचामृत से महादेव को स्नान कराकर ‘ॐ नमो नमः शिवाय’ मूलमंत्र से उनका षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। इसके बाद घृतयुक्त तिल, अक्षत (चावल) और व्रीहि से निर्मित चरु की आहुति देकर हवन संपन्न करें। रात्रि के चारों प्रहरों में सत्कथाओं का श्रवण और निरंतर शिव-अर्चन करें।
३. प्रातःकालीन क्षमा-प्रार्थना
चारों प्रहरों की पूजा पूर्ण होने पर प्रातःकाल हाथ जोड़कर प्रभु के समक्ष इस स्तुति से क्षमा-प्रार्थना करें:
अविघ्नेन व्रतं देव त्वत्प्रसादान्मयार्चितम्। क्षमस्व जगतां नाथ त्रैलोक्याधिपते हर॥ यन्मयाद्य कृतं पुण्यं यद्द्रव्यस्य निवेदितम्। त्वत्प्रसादान्मया देव व्रतमद्य समापितम्॥ प्रसन्नो भव मे श्रीमन् गृहं प्रति च गम्यताम्। त्वदालोकनमात्रेण पवित्रोऽस्मि न संशयः॥
- सरल भावार्थ: हे जगन्नाथ! हे त्रैलोक्याधिपति हर! आपकी कृपा से मेरा यह व्रत निर्विघ्न संपन्न हुआ, मेरी भूलों को क्षमा करें। आज मैंने जो भी पुण्य कर्म किया और जो सामग्री निवेदित की, वह सब आपकी ही अनुकंपा से संभव हुआ। हे श्रीमन्! आप मुझ पर प्रसन्न हों और अपने लोक को प्रस्थान करें; आपके दर्शन मात्र से मैं निःसंदेह परम पवित्र हो गया हूँ।
४. ब्राह्मण-सत्कार एवं विसर्जन-प्रार्थना
पूजन के उपरांत ध्याननिष्ठ ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराएं और वस्त्र व छत्र आदि का दान देकर यह प्रार्थना करें:
देवादिदेव भूतेश लोकानुग्रहकारक। यन्मया श्रद्धया दत्तं प्रीयतां तेन मे प्रभुः॥
- सरल भावार्थ: हे देवाधिदेव! हे भूतभावन लोककल्याणकारी प्रभु! मैंने श्रद्धापूर्वक जो कुछ भी आपको समर्पित किया है, उससे आप संतुष्ट व प्रसन्न हों।
अक्षय फल की प्राप्ति
इस प्रकार क्षमापन-स्तुति करने के उपरांत व्रती को द्वादश-वार्षिक (बारह वर्ष के) व्रत का संकल्प लेना चाहिए। ऐसा करने से साधक इस लोक में यश, कीर्ति, लक्ष्मी, उत्तम संतान और सुख-समृद्धि को भोगकर अंत में परम शिवलोक को प्राप्त करता है। जो भक्त बारहों महीनों में इस व्रत-जागरण को पूर्ण कर बारह ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और दीपदान करते हैं, उन्हें निश्चित ही स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। पूर्वजों की आत्मशांति और समस्त पापों के क्षय के लिए यह शिव-आराधना परम फलदायी मानी गई है।
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