हिमालय की गोद में ‘देवी की रहस्यमयी अदालत’: जहां डाक से आती हैं अर्जियां और थर-थर कांपते हैं गुनहगार…

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पाखूं (पिथौरागढ़)। जहां इंसानी अदालतें हार मान लेती हैं, जहां मुकदमों की फाइलें धूल फांकने लगती हैं और जहां बेगुनाह इंसान झूठे इल्जामों की आग में झुलसकर बेबस हो जाता है—वहां देवभूमि उत्तराखंड के बीहड़ पहाड़ों के बीच इंसाफ की एक ऐसी अलौकिक कचहरी लगती है, जिसके फैसले के आगे कायनात भी सिर झुकाती है।

यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के पाखूं क्षेत्र में स्थापित ‘माता कोकिला कोटगाड़ी दरबार’ का वह दहकता हुआ सच है, जिसे सदियों से लोग ‘न्याय की सर्वोच्च देवी’ के रूप में पूजते आए हैं। नवरात्रि के पावन दिनों में इस दरबार का रहस्य और प्रभाव अपने चरम पर होता है।

दीवारों पर लटकी अनगिनत चिट्ठियां और डाक से आती फरियादें

कोटगाड़ी मंदिर परिसर में कदम रखते ही एक अजीब सी रूहानी खामोशी और कौतूहल घेर लेता है। यहां मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर देवी को संबोधित करते अनगिनत शिकायती पत्र टंगे नजर आते हैं। देश के कोने-कोने से पीड़ित लोग, जिन्हें दुनिया की किसी अदालत से इंसाफ नहीं मिला, वे सीधे ‘माता कोटगाड़ी’ के पते पर डाक द्वारा अपनी अर्जी भेजते हैं। या यहां आकर मनौती मांगते है

मान्यता है कि जब इंसान के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और देवता भी कुछ कठिन परिस्थितियों में न्याय देने में मौन साध लेते हैं, तब मां कोकिला की अदालत में सुनवाई शुरू होती है। यहां न कोई वकील होता है, न दलील—बस दिल से निकली आंसुओं की पुकार और सच का तराजू। मां का फैसला ऐसा अचूक और त्वरित होता है कि अन्यायी को अपनी गलती का पश्चाताप करने का मौका तक नहीं मिलता।

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जब ब्रिटिश हुकूमत का अंग्रेज जज क्षमा मांगने खुद खिंचा चला आया

इस दरबार से जुड़ा सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाला वाकया आजादी से पहले अंग्रेजी हुकूमत के दौर का है। दंतकथाओं के अनुसार, अंग्रेजी राज की अदालत में एक निर्दोष स्थानीय व्यक्ति को झूठे मुकदमे में सजा सुना दी गई। समाज के तानों और कानून के अंधेपन से टूट चुके उस बेकसूर ने रोते हुए कोटगाड़ी माई के चरणों में अपनी अर्जी लगाई।

कहा जाता है कि इसके कुछ ही दिनों बाद उस अंग्रेज जज के साथ ऐसी रहस्यमयी और अलौकिक घटनाएं घटने लगीं कि उसकी रातों की नींद हराम हो गई। अंतरात्मा के तीव्र दंश और देवी के अदृश्य प्रकोप से भयभीत होकर वह घमंडी अंग्रेज अफसर तमाम दुर्गम पहाड़ियों, नदी-नालों को पैदल पार करते हुए पाखूं के इस दरबार में पहुंचा। उसने भरे दरबार में माता के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की और सार्वजनिक रूप से उस निर्दोष व्यक्ति को बाइज्जत बरी करने की घोषणा की।

रहस्यमयी पर्वत शिखर: जहां गरुड़ भी नहीं भर सकते उड़ान

कोटगाड़ी दरबार का इतिहास केवल इंसानी मुकदमों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ते हैं।

  • कालिया नाग को मिला अभयदान: जब यमुना तट पर भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का मानमर्दन किया, तब कालिया और उसकी पत्नियों ने जान बख्शने की भीख मांगी। श्रीकृष्ण ने उन्हें सुरक्षित शरण के लिए पाखूं स्थित मां कोकिला के आंचल में जाने का निर्देश दिया।
  • ‘काली नाग को डान’ और गरुड़ का बंधन: कोटगाड़ी से कुछ ही दूरी पर पर्वत शिखर पर कालिया नाग का प्राचीन स्थान है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘काली नाग को डान’ कहा जाता है। देवी का ऐसा सुरक्षा चक्र इस पर्वत पर बंधा है कि नागों के चिर-शत्रु ‘गरुड़’ कभी इस चोटी के आर-पार उड़ने का साहस नहीं कर पाते।
  • चट्टान से फूटी रक्त की तीन धाराएं: किंवदंती है कि एक ग्वाले की गाय रोज एक गुप्त शिला पर अपना सारा दूध स्वयं चढ़ा जाती थी। संदेह में जब ग्वाले की पत्नी ने कुल्हाड़ी/धारदार हथियार से उस शिला पर प्रहार किया, तो शिला से दूध नहीं, बल्कि खौलते खून की तीन धाराएं फूट पड़ीं—जो पाताल, स्वर्ग और पृथ्वी तक पहुंचीं। आज भी उस शिला पर प्रहार का गहरा निशान मौजूद है, और आश्चर्य यह कि उस स्थान पर कितना भी दूध अर्पित किया जाए, वह पलक झपकते ही समा जाता है।
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ब्रह्म मुहूर्त का सन्नाटा और साक्षात शेर के पदचाप

मंदिर के ठीक समीप ‘माता गंगा’ का एक पवित्र जल कुंड है। मान्यता है कि भोर के ब्रह्म मुहूर्त में मां कोकिला स्वयं इस पावन जल में स्नान करने पधारती हैं। स्थानीय साधकों और सच्चे श्रद्धालुओं का दावा है कि इस पहर में कुंड के समीप मां के वाहन सिंह (शेर) की मौजूदगी और दर्शन के अलौकिक संकेत मिलते हैं।

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स्कंद पुराण के ‘मानस खंड’ के 51वें अध्याय में वर्णित मां भद्रकाली (कांडा, बागेश्वर) और कालिया नाग के पुत्र भद्रनाग की उपासना से जुड़ा यह समूचा परिक्षेत्र सर्पभय, शत्रु बाधा और अन्याय से मुक्ति दिलाने वाला सिद्ध पीठ है। स्थानीय पाठक और कार्की परिवारों द्वारा पीढ़ियों से संचालित इस पूजा परंपरा में बाण मसूरिया, उडर, घषाण और गोलू चोटिया जैसे वीर रक्षकों की भी संयुक्त शक्ति समाहित है।

देवी कृपा एवं न्याय प्राप्ति हेतु दो दिव्य महामंत्र

1. सर्वकल्याण एवं न्याय प्राप्ति मंत्र:

ॐ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

2. अभय एवं संकट निवारण मंत्र:

ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः। शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

इंसानी अदालतें सबूत मांग सकती हैं, मगर मां कोकिला कोटगाड़ी की अदालत केवल सत्य देखती है। अगर आप भी जीवन में किसी अन्याय, षड्यंत्र या लाचारी से घिरे हैं, तो पाखूं के इस पावन दरबार में लगाई गई एक सच्ची अर्जी कभी खाली नहीं जाती।

प्रस्तुति: @ रमाकान्त पन्त प्रभारी, उत्तराखण्ड आज

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