॥ पितृ पक्ष विशेष ॥ गरुड़ पुराण में एकादशी माहात्म्य: मोक्ष और चक्रवर्ती साम्राज्य का वरदान, जानें क्यों वर्जित है दशमी-विद्धा व्रत

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॥ पितृ पक्ष विशेष ॥

गरुड़ पुराण में एकादशी माहात्म्य: मोक्ष और चक्रवर्ती साम्राज्य का वरदान, जानें क्यों वर्जित है दशमी-विद्धा व्रत

लेखक: रमाकांत पंत

सनातन धर्म में व्रतों और तिथियों का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व माना गया है। गरुड़ पुराण के १२५वें अध्याय में पितामह ब्रह्मा ने एकादशी व्रत के असीम माहात्म्य, इसके नियमों और तिथियों के चयन पर विस्तार से प्रकाश डाला है। पुराण के अनुसार, दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की एकादशी का विधिपूर्वक पालन करने से साधक को न केवल भौतिक साम्राज्य की प्राप्ति होती है, बल्कि मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

राजा मान्धाता बने चक्रवर्ती सम्राट, रुक्मांगद को मिला मोक्ष

गरुड़ पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, प्रतापी राजा मान्धाता ने विधि-विधान से एकादशी व्रत का पालन किया था। इसी पुण्य के प्रभाव से उन्होंने ‘चक्रवर्ती सम्राट’ का गौरवशाली पद प्राप्त किया। शास्त्रों का निर्देश है कि मनुष्य को कृष्ण और शुक्ल, दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।

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इसके साथ ही, महाराज रुक्मांगद के पावन चरित्र का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि उन्होंने दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत कर, रात्रि में जागरण, पुराण-श्रवण और गदाधर भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना की। इस नियम और भक्ति के प्रभाव से महाराज रुक्मांगद ने परम पद (मोक्ष) प्राप्त किया।

भूलकर भी न करें दशमी-विद्धा एकादशी, गांधारी का प्रसंग

गरुड़ पुराण में एकादशी की शुद्धि पर कड़ा नियम स्पष्ट किया गया है। यदि एकादशी तिथि में दशमी का किंचित भी वेध (मिश्रण) हो, तो ऐसा व्रत अमंगलकारी सिद्ध होता है।

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पुराण के अनुसार, महाभारत काल में महारानी गांधारी ने अज्ञानतावश ‘दशमी-विद्धा’ एकादशी का व्रत किया था। इसी अशुभ प्रभाव के परिणामस्वरूप उनके सौ पुत्रों का विनाश उनके जीवनकाल में ही हो गया।

  • असुरों और हरि का वास: जिस मास में दशमी-वेध से युक्त एकादशी होती है, उसमें असुरों का संनिधान (उपस्थिति) माना जाता है। इसके विपरीत, द्वादशी से युक्त एकादशी में स्वयं भगवान श्रीहरि का सानिध्य रहता है। इसलिए दशमी से युक्त एकादशी का परित्याग करना ही श्रेयस्कर है।
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संशय की स्थिति और त्रिसमन्वित तिथि का पुण्य

शास्त्रों के कई वचनों के कारण यदि तिथि निर्धारण में कोई संशय उत्पन्न हो, तो वैष्णव मत के अनुसार द्वादशी तिथि को व्रत रखकर त्रयोदशी तिथि में पारणा करने का विधान है।

यदि एकादशी तिथि कला मात्र (अत्यल्प समय) के लिए भी रहे, तो द्वादशी युक्त एकादशी ही पूजनीय मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी एक ही दिन एकादशी, द्वादशी और विशेष रूप से त्रयोदशी तीनों तिथियों का योग बन जाए, तो वह अत्यंत मांगलिक तिथि मानी जाती है। ऐसी तिथि पर किया गया व्रत मनुष्य के समस्त संचित पापों का शमन कर परम कल्याण प्रदान करता है।

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