स्कन्दपुराण के मानसखण्ड से ‘भवानीवल्लभा’ कन्दरा का विस्तृत पौराणिक आख्यान; राजा विदूरथ की भक्ति, सुरभी की अविरल अमृतधारा, लोक-संस्कृति के ‘उड्यार’ और रामेश्वर तीर्थ की सुरम्य यात्रा
विशेष रपट: @ रमाकान्त पन्त @
अल्मोड़ा / पिथौरागढ़ सीमा। शारदीय व वासंतिक नवरात्र के पावन दिनों में जब समूचा भारतवर्ष शक्ति की उपासना में लीन रहता है, तब देवभूमि उत्तराखण्ड का मानसखण्ड (कुमाऊँ अंचल) अपने पौराणिक शक्तिपीठों की जाग्रत आभा से आलोकित हो उठता है। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जनपदों की सीमान्त सीमा पर बाँझ, बुरांश और चीड़ के सघन वनों से आच्छादित सुरम्य पनार नदी घाटी में एक ऐसी ही महाशक्ति की दिव्य कन्दरा विद्यमान है, जिसे स्थानीय जनमानस ‘भवानी उड्यार’ और सनातन पुराण ‘भवानीवल्लभा गुहा’ के नाम से नमन करते हैं।
यह कोई साधारण गुफा नहीं, बल्कि स्कन्दपुराण के मानसखण्ड (अध्याय ६७) में वर्णित वह महातीर्थ है, जहाँ साक्षात् जगज्जननी माँ पार्वती अपनी सहचर शक्तियों के साथ सर्वदा जाग्रत रहकर समस्त सांसारिक कष्टों और संतापों का हरण करती हैं।
पुराणों के पृष्ठों से: ऋषियों की जिज्ञासा और ३३ वनों का कूर्माचल
स्कन्दपुराण की कथा के अनुसार, नैमिषारण्य के शौनकादि मुनियों ने जब ज्ञानवृद्ध महर्षि वेदव्यास से करबद्ध होकर पूछा— “हे विप्रर्षे! कृपा कर हमें वह गुप्त व पावन क्षेत्र बताइए जहाँ जाते ही मनुष्य के दुःस्वप्न (बुरे स्वप्न), दुर्निमित्त (अपशकुन) और घोर दुर्गम संकट स्वतः विनष्ट हो जाते हैं?”
दुःस्वप्नं दुर्निमित्तं च यस्मिन् क्षेत्रे प्रणश्यति। तत्क्षेत्रं वद भो विप्र सर्वदुर्गस्य तारणम्॥
महर्षि व्यास ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया कि पावन ‘पर्णपत्रा’ नदी के दक्षिण में कच्छप (कूर्म) के दिव्य चरणों से चिह्नित, यक्ष-गन्धर्वों से पूजित पवित्र ‘कूर्माचल पर्वत’ स्थित है। इस पर्वतराज की गोद में ३३ सुपुण्य महावन शोभायमान हैं, जहाँ देवता, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धजन तपस्या करते हैं। इसी कूर्माचल के उत्तर भाग में यक्षराज कुबेर द्वारा पूजित वह परम शोभामयी गुफा विद्यमान है:
कूर्माचलोत्तरे भागे देवगन्धर्वसेविता। भवानीवल्लभा नाम गुहा परमशोभना। विद्यते मुनिशार्दूला यक्षराजनिषेविता॥ तत्र जागर्ति गिरिजा शक्तिभिः परिवेविता। भवानी भवदुःखस्य तारिणी मुनिसत्तमाः॥
व्यास जी स्पष्ट करते हैं कि यहाँ माँ भवानी के सम्मुख गन्ध, धूप, अक्षत और विशेष रूप से शुद्ध जाति-पुष्पों (सफेद चमेली व जूही के फूलों) से पूजन करने पर मानव को अग्निभय, चौरभय, ईति-भीति (अतिवृष्टि, अनावृष्टि व महामारी), राजभय, ग्रहपीड़ा, अकाल मृत्यु और शत्रु-बाधा से मुक्ति मिल जाती है।
राजा विदूरथ की कथा: गन्धर्व-कन्याएँ और कामधेनु का अलौकिक कौतुक
ऋषियों ने पुनः पूछा कि हे व्यास जी, इस मृत्युलोक में सर्वकल्याणकारिणी माँ भवानी की इस अप्रकट गुफा को सर्वप्रथम किसने संसार के सम्मुख प्रकट किया? तब व्यास जी ने सत्ययुग के धर्मात्मा राजा विदूरथ का वृत्तान्त सुनाया।
राजा विदूरथ दुर्गा सप्तशती में वर्णित प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा सुरथ के महाबली पुत्र थे। वे मितभाषी, सत्यवादी, ज्ञानलोलुप तथा भगवान शिव और मुकुन्द (विष्णु) के परम भक्त थे। एक बार वे आखेट के उद्देश्य से अपने व्याधों (शिकारियों) के साथ कूर्माचल के सघन जंगलों में पधारे। वन में भ्रमण करते हुए राजा ने लाल वस्त्रों में सुसज्जित रूप-यौवन सम्पन्न गन्धर्व कन्याओं के समूह को सखियों सहित क्रीड़ा करते देखा। उनके आनंद में कोई विघ्न न पड़े, इसलिए मर्यादाप्रिय राजा ने अपने सभी शिकारी व्याधों को दूसरे वन में भेज दिया।
राजा से अलग होकर जब व्याध घने वन में पहुँचे, तो उन्होंने एक अत्यंत विस्मयकारी दृश्य देखा—स्वर्गलोक से साक्षात् सुरभी (कामधेनु गाय) अवतरित होकर वन-मार्ग पर जा रही थी। उसके स्तनों के भारी भार से धरती पर अविरल अमृतमयी दुग्धधारा टपक रही थी। शिकारी आखेट भूलकर उस दिव्य कामधेनु के पीछे-पीछे चल पड़े।
गुफा के भीतर सावन की झड़ी: नव नामों से माँ की स्तुति
कामधेनु ने पहले पावन ‘सरस्वती नदी’ के निर्मल जल में स्नान किया और फिर एक विशाल शैल-कन्दरा (गिरिकन्दरा) के भीतर प्रविष्ट हो गई। अचंभित व्याध भी उसी मार्ग से गुफा के भीतर पहुँचे।
गुफा के भीतर का दृश्य अलौकिक था। वहाँ देवराज इन्द्र, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गन्धर्वराज चित्रसेन और अप्सराएँ माँ आदिशक्ति की स्तुति कर रहे थे। गन्धर्वगण माँ भगवती को इन नौ पावन नामों से पुकारते हुए वंदन कर रहे थे—भवानी, चण्डिका, कृष्णा, मृडानी, माधवी, शालिका, कुमुदा, माया, गुहावासा और हरप्रिया।
गुफा के भीतर शिला पर साक्षात् माँ भवानी विराजमान थीं और कामधेनु अपने स्तनों से माँ की पाषाण प्रतिमा पर इस प्रकार दुग्धधारा बरसा रही थी मानो सावन के महीने में वर्षा की अविरल झड़ी लगी हो:
कूर्माचलोत्तरे भागे ददृशुर्गिरिकन्दराम्। तत्र वै बहवो लोका भवानीमिति कामपि॥ स्तुवन्ति नृपशार्दूल चोपविष्टां शिलोपरि। तस्योपरि महाभागाः स्तन्यैः सा सुरभी नृप। श्रावणे वर्षधारेव प्रवर्षति न संशयः॥
शिकार का त्याग, आगमोक्त पूजन और संगम स्नान
यह दिव्य दृश्य देखकर व्याधों ने अपने धनुष-बाण और आखेट के समस्त उपकरण वहीं फेंक दिए और सीधे राजा विदूरथ के पास पहुँचे। व्याधों के मुख से यह वृत्तान्त सुनकर राजा विदूरथ तत्काल गन्धर्व कन्याओं का संग छोड़ व्याधों द्वारा बताए मार्ग से गुफा की ओर प्रस्थान कर गए।
राजा ने सरस्वती नदी को पार किया और पर्णपत्रा के दक्षिण में कूर्माचल के छोर पर स्थित उस पावन गुफा में प्रवेश किया। राजा विदूरथ ने अत्यंत एकाग्रचित्त होकर आगमोक्त विधि से पुष्प, अक्षत, नैवेद्य और धूप-दीप से माँ भवानी का विधिवत महापूजन किया। उन्होंने गन्धर्वों को नमन किया और कामधेनु सुरभी की परिक्रमा कर उन्हें शीश नवाया।
गुफा के बाहर आकर राजा ने ‘पर्णपत्रा’ और ‘सरस्वती’ नदियों के पावन संगम में विधिपूर्वक स्नान किया तथा देव-पितृ तर्पण कर महेश्वर महादेव की स्तुति की। महामाया भवानी की कृपा से राजा के जीवन के सभी अपशकुन, भय और व्याधियाँ सदा के लिए समाप्त हो गईं।
महर्षि व्यास इस माहात्म्य का फल बताते हुए कहते हैं:
इत्येतत् कथितं विप्रा देवीमाहात्म्यमुत्तमम्। दुःस्वप्नदुर्निमित्तानां तथा दुर्गभयस्य च। नाशकं सर्वरोगाणाम् आयुरारोग्यवर्धनम्॥ अर्थात् इस गुफा में भगवती का यह माहात्म्य समस्त दुःस्वप्नों, संकटों व अनिष्टों का नाश करने वाला, सर्वरोगहारी तथा मनुष्य की आयु और आरोग्य को बढ़ाने वाला है।
कुमाऊँनी संस्कृति में ‘उड्यार’ की परंपरा और सिद्धपीठ का गौरव
कुमाऊँ अंचल की लोक-संस्कृति में प्राकृतिक विशाल शैल-गुहाओं अथवा चट्टानी आश्रयों को स्थानीय बोली में ‘उड्यार’ (अथवा ओडघार) कहा जाता है।
अतीत के कठिन दौर में, जब हिमालय की घाटियों में भीषण हिमपात, मूसलाधार बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ जनजीवन को थाम देती थीं, तब ये उड्यार आदिवासियों, चरवाहों और उनके पशुधन को विषम मौसम से बचाने वाले सुरक्षित प्राकृतिक ठिकाने बनते थे। किन्तु पनार घाटी का यह उड्यार केवल भौतिक रक्षा का साधन नहीं रहा, बल्कि यह माँ भवानी (दुर्गा) की प्रत्यक्ष साधना का सिद्धपीठ बन गया। स्थानीय श्रद्धालु आज भी इसे अपनी कुलदेवी और क्षेत्र रक्षक शक्तिपीठ के रूप में पूजते हैं, जहाँ नवरात्रि के पावन दिनों में दीप प्रज्वलित कर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
पनार का नैसर्गिक सौन्दर्य और पावन ‘रामेश्वर तीर्थ’
यह गुफा जिस पनार घाटी में स्थित है, वह प्रकृति प्रेमियों और साधकों के लिए स्वर्ग के समान है। चारों ओर फैली हरी-भरी पर्वत शृंखलाओं के बीच कलकल बहती पनार (पौराणिक पर्णपत्रा) नदी का जल दर्पण सा निर्मल और शीतल है।
यही पावन पनार नदी आगे बहते हुए जब कुमाऊँ की प्राणदायिनी सरयू नदी से मिलती है, तो वहाँ निर्मित होता है कुमाऊँ का अत्यंत पावन और ऐतिहासिक ‘रामेश्वर तीर्थ’।
सरयू और पनार के इस संगम पर भगवान रामेश्वर महादेव का प्राचीन देवालय स्थित है, जिसे कुमाऊँ का ‘प्रयागराज’ माना गया है। मकर संक्रांति (उत्तरायणी) और शिवरात्रि के महापर्व पर यहाँ सहस्रों श्रद्धालु स्नान और पितृ-तर्पण के लिए पहुँचते हैं। इस प्रकार भवानी उड्यार से आरम्भ होकर रामेश्वर तीर्थ तक फैली यह पूरी घाटी प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य, सरयू-पनार के जल-प्रवाह और सनातन शक्ति-परंपरा का एक पावन समन्वय रचती है।
स्थान का सम्पूर्ण भौगोलिक विवरण (एक नज़र में)
- भौगोलिक स्थिति: उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों की सीमा के निकट, सुरम्य पनार नदी घाटी में अवस्थित।
- गुफा का नाम व पहचान: स्कन्दपुराणोक्त ‘भवानीवल्लभा गुफा’, जिसे कुमाऊँनी बोली में ‘भवानी उड्यार’ (भवानी ओडघार) कहा जाता है।
- पौराणिक नदी: श्लोक में वर्णित ‘पर्णपत्रा नदी’, जिसका वर्तमान नाम ‘पनार नदी’ है।
- संगम स्थल: पनार नदी और उसकी पौराणिक सहायक सरस्वती नदी का पावन संगम तट।
- समीपवर्ती तीर्थ: पनार नदी के आगे के प्रवाह पर स्थित पावन रामेश्वर तीर्थ (सरयू-पनार संगम एवं रामेश्वर महादेव मंदिर) तथा ऊपरी परिधि में जागेश्वर धाम (दारुकावन) का पावन क्षेत्र।
- धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यता: माँ दुर्गा का जाग्रत सिद्धपीठ; नवरात्रि में जाति-पुष्प (जूही) से पूजित होने वाली, समस्त व्याधियों और दुःस्वप्नों को हरने वाली आरोग्यदायिनी कन्दरा।
— @ रमाकान्त पन्त @
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