हल्द्वानी के वियाबान वनों का सबसे बड़ा रहस्य: लंकापति रावण के दादाजी ने की थी यहाँ घोर तपस्या! जानें गर्गांचल, भद्रवट और जाग्रत कालीचौड़ धाम का पौराणिक सच

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हल्द्वानी/उत्तराखण्ड के प्रवेश द्वार काठगोदाम और हल्द्वानी के समीप घने, सुरम्य और वियाबान वनों के मौन आंचल में एक ऐसा आध्यात्मिक और पौराणिक रहस्य छिपा है, जिसके तार सीधे सतयुग और त्रेतायुग के स्वर्णिम कालखंड से जुड़ते हैं। जिस वन-प्रांतर को आज सामान्य पर्वतीय तलहटी समझा जाता है, वह वास्तव में अनादि काल से ब्रह्मलीन महर्षियों, सिद्ध-योगियों और देव-शक्तियों की महासाधना का जीवंत केंद्र रहा है। स्कन्दपुराण के मानसखण्ड के पन्नों को गहराई से उघाड़ें तो ज्ञात होता है कि इस निर्जन वन-क्षेत्र में कभी लंकापति रावण के पितामह (दादाजी) ने ऐसी कठोर तपस्या की थी जिससे देवलोक तक में हलचल मच गई थी।

यह समूचा क्षेत्र केवल एक सामान्य देवी-स्थान नहीं, अपितु गर्गांचल पर्वत, भद्रवट तीर्थ, देव-शक्तियों से अभिमंत्रित चित्रशिला और गार्गी-पुष्पभद्रा नदियों का एक अत्यंत दुर्लभ देव-मंडल है। इसी महातीर्थ के केंद्रबिंदु में साक्षात विराजमान हैं संपूर्ण चराचर की अधीश्वरी, करुणामयी भगवती आदिशक्ति महाकाली का परम जाग्रत धाम—‘कालीचौड़’।

गर्गांचल की रजत आभा और रावण के पितामह की घोर तपस्या

कालीचौड़ के उत्तर-पूर्व में आकाश को छूता हुआ खड़ा है पावन ‘गर्गांचल पर्वत’। यह वही पर्वत है जहाँ महर्षि गर्ग ने सहस्रों वर्षों तक तपस्या कर भगवान शिव और विष्णु को प्रसन्न किया था। चाँदी की खानों, दिव्य वानस्पतिक लताओं, 66 पवित्र सरोवरों और कोकिलाओं के मधुर गुंजन से आप्लावित इस शैल-शिखर की महिमा का गान करते हुए महर्षि वेदव्यास मानसखण्ड के इकतालीसवें अध्याय में कहते हैं—

शेषस्य दक्षिणे भागे पुण्यो गर्गगिरिः स्मृतः। लतापादपसंकीर्णो नानाधातुविराजितः॥

किन्तु इस पावन पर्वत की उपत्यका का सबसे रहस्यमयी और विस्मयकारी प्रसंग लंका के अधिपति दशानन रावण के कुल से जुड़ा है। पुराणों के अनुसार, प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र, महर्षि विश्रवा के पिता तथा लंकापति रावण व धनाधिपति कुबेर के सगे दादाजी—महर्षि पुलस्त्य ने अपने दो अन्य ब्रह्मर्षि भाइयों—अत्रि और पुलह के साथ इसी क्षेत्र को अपनी महातपस्या का केंद्र बनाया था। स्कन्दपुराण में स्वयं वेदव्यास जी इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हैं—

अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः ऋषयो गर्गपर्वतम्। समाजग्मुर्महाभागास्तपस्तप्तुं सुदुष्करम्॥

आख्यान है कि जब रावण के दादाजी पुलस्त्य मुनि, अत्रि और पुलह के साथ चित्रशिला के दर्शन कर गर्गांचल की दुर्गम ऊँचाइयों पर चढ़ रहे थे, तब मध्याह्न के प्रचंड सूर्य-ताप से उनका कंठ सूखने लगा और वे तीनों महर्षि तीव्र प्यास से व्याकुल हो उठे। पर्वत के उस निर्जन शिखर पर जब जल का कोई स्रोत नहीं मिला, तब इन तपस्वियों ने पर्वत की भूमि को खोदा और मानसरोवर का ध्यान किया। महर्षियों के तपोबल और स्मरण-मात्र से मानसरोवर का पवित्र जल वहाँ प्रकट हो गया और उस गर्त ने एक दिव्य ताल का रूप ले लिया। स्कन्दपुराण में इस ताल को ‘तृषिसंज्ञक’ अथवा ‘त्रि-ऋषि सरोवर’ कहा गया, जो आज कूर्मांचल की विश्वप्रसिद्ध ‘नैनीताल’ झील के रूप में सुशोभित है। महर्षि व्यास कहते हैं—

ये निमज्जन्ति मनुजाः सरे वै तृषि-संज्ञिते। मानसस्नानजं पुण्यं प्राप्नुवन्ति न संशयः॥

अर्थात जो मनुष्य इस त्रि-ऋषि सरोवर में स्नान करता है, उसे बिना किसी संशय के साक्षात कैलास-मानसरोवर में स्नान का संपूर्ण पुण्यफल प्राप्त होता है। रावण के पूर्वज पुलस्त्य मुनि की उसी तपो-ऊर्जा से यह समूचा गर्गांचल और कालीचौड़ का अंचल आज भी स्पंदित है।

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भद्रवट क्षेत्र: जहाँ दर्शन मात्र से पिघल जाते हैं करोड़ों पाप

कालीचौड़ के सानिध्य में एक और परम दुर्लभ तीर्थ विद्यमान है, जिसे शास्त्रों में ‘भद्रवट’ नाम से अभिहित किया गया है। महर्षि वेदव्यास जी के अनुसार, भद्रवट कोई साधारण वन-क्षेत्र नहीं, बल्कि सिद्धों, गंधर्वों और अप्सराओं द्वारा नित्य सेवित पृथ्वी का साक्षात बैकुंठ है—

क्षेत्रं भद्रवटं नाम सर्वपापप्रणाशनम्। सेवितं सिद्धगन्धर्वैर्गन्धर्वीभिस्तथैव च॥

व्यास जी स्पष्ट कहते हैं कि कुरुक्षेत्र और पुष्कर में सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय स्नान करने से, सहस्रों कपिला गायों के दान से, माघ मास के प्रयाग-स्नान से, यहाँ तक कि गया में पिंडदान और काशी में देह त्यागने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सब पुण्य भद्रवट क्षेत्र के केवल दर्शन करने से ही सुलभ हो जाता है।

मानसखण्ड के तैंतालीसवें अध्याय में महर्षि गर्ग और एक खस देश के क्रूर व्याध (शिकारी) की कथा आती है। जब वह हिंसक व्याध मृगों और शूकरों का संहार करते हुए गर्गाश्रम पहुँचा, तो समाधि में लीन महर्षि गर्ग के दर्शन पाकर उसका हिंसक हृदय पिघल गया। उसने हाथ जोड़कर कातर स्वर में पूछा कि “हे मुनिश्रेष्ठ! मुझ जैसे घोर पापी की सद्गति किस क्षेत्र में हो सकती है?” तब महर्षि गर्ग ने उसे कालीचौड़ की इसी परिधि में स्थित भद्रवट और चित्रशिला जाने का मार्ग बताते हुए कहा—

दृष्ट्वा भद्रवटं क्षेत्रं तथा चित्रशिलां शुभाम्। विलीयन्ते हि पापानि हिमवद् भास्करोदये॥

अर्थात जैसे प्रभात वेला में सूर्य की पहली किरण पड़ते ही हिमालय का विशाल हिमखंड गलकर विलीन हो जाता है, ठीक उसी प्रकार भद्रवट और चित्रशिला के दर्शन करते ही जीव के समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक पाप तत्काल भस्म हो जाते हैं। उस व्याध ने वहाँ जाकर तीन वर्ष तक तप और पूजन किया और देहावसान के उपरांत वह दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर सीधे सत्यलोक को प्राप्त हुआ।

पुष्पभद्रा-गार्गी संगम और चित्रशिला पर त्रिदेवों का साक्षात वास

भद्रवट और कालीचौड़ के चरणों में अमृत-धारा के समान प्रवाहित होती हैं दो पुण्य-सरिताएं—गार्गी और पुष्पभद्रा। इन दोनों के संगम पर स्थित है देव-शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित अत्यंत मनोहारी ‘चित्रशिला’ (वर्तमान रानीबाग)। इस शिला की अलौकिकता का बखान करते हुए स्कन्दपुराण में उल्लेख मिलता है—

यस्मिन् क्षेत्रे महापुण्या शिला देवविनिर्मिता। धन्या चित्रशिला नाम महेन्द्राद्यैः सुसेविता॥ यस्मिन् ब्रह्मा च विष्णुश्च महादेवस्तथैव च। सार्धं स्वशक्तिभिर्विप्रा विराजन्ते न संशयः॥

इसी चित्रशिला पर सतयुग के आरंभ में सुतपा नामक एक तेजस्वी मुनि ने अपनी भुजाओं को ऊपर उठाकर, सूखे पत्तों और वायु का भक्षण करते हुए 36 वर्षों तक अखंड मौन तपस्या की थी। उनके कठोर तपोबल से प्रसन्न होकर स्वयं जगदीश्वर भगवान विष्णु, चतुरानन ब्रह्मा और देवाधिदेव महादेव अपनी-अपनी पराशक्तियों—वैष्णवी, ब्राह्मी और माहेश्वरी—के साथ उसी शिला पर प्रत्यक्ष प्रकट हुए थे। भगवान विष्णु ने सुतपा मुनि को अपने साथ वैकुंठ लोक में स्थान दिया।

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इस संगम पर स्नान और चित्रशिला के अर्चन की महिमा बताते हुए वेदव्यास जी घोषणा करते हैं—

यैः स्नानं पुष्पभद्राया जले पुण्यप्रदे द्विजाः। निमज्य पुष्पभद्राया जले यैः पूज्यते शिला। ते मातृजठरं विप्रा न पश्यन्ति पुनः पुनः॥

दक्षिणे पुष्पभद्रायाः पुण्यं भद्रवटं हि ये। प्रपश्यन्ति महाभागास्ते यान्ति परमां गतिम्॥

अर्थात जो प्राणी पुष्पभद्रा के पावन जल में डुबकी लगाकर चित्रशिला का वंदन करता है, उसे पुन: माता के गर्भ के कष्ट (पुनर्जन्म) का सामना नहीं करना पड़ता; और जो पुष्पभद्रा के दक्षिण तट पर स्थित पावन भद्रवट के दर्शन करता है, वह निश्चित रूप से परम गति को प्राप्त होता है।

महर्षि मार्कण्डेय का महातप और प्रलयंकारी माया-दर्शन

श्रीमद्भागवत और स्कन्दपुराण के अनुसार, यह समूचा पुष्पभद्रा अंचल महर्षि मार्कण्डेय की भी अमर तपस्थली रहा है। मार्कण्डेय जी ने जब यहाँ शिव और शक्ति की अनन्य आराधना की, तो देवराज इन्द्र का सिंहासन हिल उठा। इन्द्र ने तप भंग करने के लिए कामदेव, वसंत ऋतु और गंधर्व-अप्सराओं की पूरी सेना भेज दी। अग्नि, यम और वरुण ने भीषण तूफान खड़े किए, किन्तु मार्कण्डेय जी अपने ध्यान से विचलित नहीं हुए।

अंततः भगवान श्रीहरि ‘नर और नारायण’ रूप में ऋषि के सम्मुख साक्षात प्रकट हुए। जब भगवान ने वरदान माँगने को कहा, तो मार्कण्डेय जी ने केवल प्रभु की अमोघ ‘माया’ के दर्शन की इच्छा व्यक्त की। उसी क्षण इसी भद्रवट क्षेत्र में महाप्रलय उपस्थित हो गया। सूर्य, चंद्र और संपूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न हो गए और अथाह जलराशि के बीच मार्कण्डेय जी ने एक वट-वृक्ष के पत्ते पर अपने पैर का अंगूठा चूसते हुए दिव्य बाल-मुकुंद के दर्शन किए। शिशु के एक ही श्वास के साथ मार्कण्डेय जी उसके उदर में चले गए, जहाँ उन्होंने संपूर्ण चौदह भुवनों को देखा और बाहर आते ही भगवान का आलिंगन करना चाहा, किन्तु वह बालक अंतर्धान हो गया और सारा वातावरण पूर्ववत शांत हो गया। आदिशक्ति महाकाली और भगवान भुवनेश की कृपा से ही मार्कण्डेय जी को नश्वर माया का अखण्ड बोध हुआ और वे अष्ट-चिरंजीवियों में श्रेष्ठ कहलाए।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का आगमन और ‘कालीचौड़’ नामकरण का रहस्य

युगों-युगों तक महर्षियों की यह गुप्त तपोभूमि वियाबान वनों की ओट में छिपी रही। कलियुग में सनातन धर्म की ध्वजा लेकर जब जगद्गुरु आदि शंकराचार्य कूर्मांचल की तराई में पधारे, तो गार्गी नदी में स्नान करते ही उनका अंतर्मन जाग उठा। वे एकाएक अपने शिष्यों से कह उठे—”यहाँ तो संपूर्ण अरण्य में भगवती काली की कोई अलौकिक और प्रचंड आभा व्याप्त है, अवश्य ही निकट कोई महाशक्ति विद्यमान है!”

स्थानीय भक्तों के साथ जब आदि शंकराचार्य बीहड़ जंगलों को पार कर आगे बढ़े, तो घनी झाड़ियों और दुर्गम पत्थरों के बीच उन्हें माँ कालिका का प्राचीन, जाग्रत विग्रह दिखाई दिया। आदिगुरु कई दिनों तक उसी एकांत में समाधि लगाकर साधनारत रहे। धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की भारी भीड़ वहाँ जुटने लगी। यह पावन देवालय एक अत्यंत संकरी, उबड़-खाबड़ और कंटीली पहाड़ी ढलान पर स्थित था। आदिगुरु के आदेश पर भक्त-मंडली ने वहाँ की झाड़ियों को काटा और उस दुर्गम टीले को समतल बनाकर एक विस्तृत ‘चौरस’ मैदान का रूप दिया। पर्वत की ढलान पर निर्मित इसी समतल चौरस भूमि के कारण कालांतर में इस स्थान का नाम ‘कालीचौड़’ प्रसिद्ध हुआ।

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आदि शंकराचार्य ने ही यहाँ माँ के उग्र स्वरूप को शांत कर लोक-कल्याण के लिए उनके मंगलमयी ‘वैष्णव स्वरूप’ की विधिवत प्रतिष्ठा की। तब से लेकर आज तक यहाँ माँ की आराधना का यह पावन मंत्र वियाबान वनों में निरंतर गूँजता रहता है—

काली-काली महाकाली कालिके परमेश्वरी। सर्वानन्दकरी देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

महायोगी गोरखनाथ की प्रथम धूनी और सिद्ध संतों का समागम

कालीचौड़ धाम नाथ संप्रदाय और हिमालयी सिद्धों का भी मुख्य साधना केंद्र रहा है। जनश्रुतियों के अनुसार, जब महायोगी गुरु गोरखनाथ जी ने कूर्मांचल की धरती पर पदार्पण किया, तो चूँकि काठगोदाम पर्वतों का मुख्य प्रवेश द्वार था, उन्होंने अपनी पहली धूनी इसी कालीचौड़ के वनों में रमाई। यहाँ माँ कालिका की कठोर तपस्या से सिद्धियाँ प्राप्त करने के बाद ही गुरु गोरखनाथ जी को उत्तराखण्ड के महान लोकदेवताओं—हरू, सैम और न्याय के अधिष्ठाता ग्वेल (गोल्ज्यू) महाराज—का परम गुरु बनने का गौरव प्राप्त हुआ। चम्पावत में आज भी अनवरत प्रज्वलित गुरु गोरखनाथ की अखंड धूनी वस्तुतः इसी कालीचौड़ की साधना का अमर फल मानी जाती है।

कालांतर में इस दिव्य धाम में महायोगी सोमवारी बाबा, हैड़ाखान बाबा, टाटम्बरी बाबा और ननतिन बाबा जैसे सिद्ध संतों ने भी कंदराओं में गुप्त साधनाएँ कीं। वर्ष 1942 के आसपास, कलकत्ता के एक अनन्य बंगाली साधक को माँ काली ने स्वप्न में दर्शन देकर इस बीहड़ वन में स्थित अपने विग्रह की खोज की प्रेरणा दी। उस साधक ने काठगोदाम आकर इस गुप्त स्थल को पुन: खोज निकाला, जिसके बाद हल्द्वानी निवासी रामकुमार जी व अन्य स्थानीय भक्तों ने मिलकर मंदिर को भव्य रूप दिया। मंदिर के जीर्णोद्धार के समय वहाँ पाली भाषा में उत्कीर्ण एक प्राचीन ताम्रपत्र भी प्राप्त हुआ, जो इस धाम की अति-प्राचीनता और ऐतिहासिकता पर अकाट्य मुहर लगाता है।

कालीचौड़ धाम के निकट का यह संपूर्ण क्षेत्र पुराणों में ‘भद्रपुर’ भी कहा गया है, जहाँ कालिया नाग और भद्रनागों ने तपस्या कर सर्प-भय से मुक्ति पाई थी। गंगोलीहाट की जाग्रत हाट कालिका और बागेश्वर के कांडा की भद्रकाली की तरह ही, कालीचौड़ का यह वैष्णवी दरबार कूर्मांचल की पराशक्ति का हृदय-स्थल है।

जहाँ एक ओर गर्गांचल के शिखर रावण के दादाजी महर्षि पुलस्त्य की तपो-गाथा का उद्घोष करते हैं, वहीं दूसरी ओर पुष्पभद्रा और चित्रशिला का पावन संगम मानव को समस्त बंधनों से मुक्त कर परमपद प्रदान करता है। काठगोदाम के शांत और सघन वनों की सुरम्य गोद में स्थित कालीचौड़ धाम आज भी हर उस प्राणी का कल्याण करता है, जो सांसारिक मायाजाल को त्यागकर निर्मल भाव से जगतजननी महाकाली के चरणों में अपना शीश नवाता है।

@ रमाकान्त पन्त

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