देवताओं के वैद्य का वो अधूरा सवाल और हिमालय की कोख में दफन विधाता का सबसे बड़ा प्रतिबंधित रहस्य
विधाता का वो प्रतिबंधित मार्ग: हिमालय की कंदराओं में छुपा मोक्ष का सबसे बड़ा रहस्यमय गलियारा
धारचूला /देवभूमि की दुर्गम कंदराओं और अनंत काल से बर्फ की मोटी चादर ओढ़े खड़े हिमालय के शिखरों के पीछे आखिर ऐसा क्या छुपा है, जिसे जानने के लिए देवताओं के वैद्य भी व्याकुल हो उठे थे? क्या हिमालय के इस अभेद्य दुर्ग को पार कर उस परम पवित्र मानसरोवर तक पहुंचने का कोई ऐसा गुप्त मार्ग भी है, जिसे विधाता ने केवल सिद्ध पुरुषों के लिए ही सुरक्षित रखा था? सदियों पुराने सनातन इतिहास के पन्नों को खंगालने पर स्कन्द पुराण के मानसखंड के जो अत्यंत दुर्लभ अध्याय सामने आते हैं, वे किसी रोमांचक रहस्यगाथा से कम नहीं हैं। यह पूरी कहानी हमें उस दिव्य कालखंड में ले जाती है जहां साक्षात भगवान वेदव्यास और देवताओं के बीच ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों पर संवाद हो रहा था।
इस विहंगम रहस्यगाथा की शुरुआत होती है देवर्षियों द्वारा पूजित उस परम पावन सरोवर की जिज्ञासा से, जिसे हम मानसरोवर कहते हैं। जैसा कि प्राचीन पांडुलिपियों के पन्नों से पता चलता है, भगवान विष्णु के तेरहवें अवतार, आयुर्वेद के प्रवर्तक और देवताओं के वैद्य भगवान धन्वन्तरि ने महर्षि दत्तात्रेय को साक्षी मानकर योगिराज व्यास से एक ऐसा प्रश्न पूछा जिसने पूरी मानव सभ्यता के लिए कल्याण का मार्ग खोल दिया।
धन्वन्तरि ने पूछा कि हे योगिराज, यह संपूर्ण संसार जानता है कि हिमालय पर्वत हमेशा भीषण हिमपात के कारण अत्यंत दुर्गम और अगम्य है। वहां की कड़ाके की ठंड और जानलेवा रास्ते किसी भी साधारण मनुष्य का प्राणांत कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में उस गिरिराज को लांघकर मानसरोवर तक कैसे पहुंचा जा सकता है? उस परम पवित्र सरोवर के प्रवेश और निकास के वे कौन से गुप्त मार्ग हैं, जिन्हें पुरातन ऋषियों ने खोजा था?
धन्वन्तरि के इस गूढ़ प्रश्न को सुनकर योगिराज दत्तात्रेय गहरी ध्यानमुद्रा में चले गए। कुछ क्षणों के गहरे सन्नाटे के बाद जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उन्होंने एक ऐसे गुप्त मार्ग का नक्शा सामने रख दिया जो सीधे मोक्ष की ओर जाता था। इतिहास में दर्ज दत्तात्रेय के अलौकिक वचनों के अनुसार, जो मनुष्य धर्म और सत्य में अगाध आस्था रखते हैं, उनके लिए यह अगम्य कैलाश भी सुगम हो जाता है। उन्होंने रहस्य खोलते हुए बताया कि इस अलौकिक यात्रा की शुरुआत उत्तराखंड के उस पर्वतराज क्षेत्र से होती है जिसे प्राचीन काल में कूर्मांचल कहा गया, जिसे आज हम कुमाऊं के नाम से जानते हैं। वन्य जीवों, मयूरों और अत्यंत दुर्लभ पक्षियों से घिरे इस कूर्मांचल पर्वत की उपत्यका से आगे बढ़ते ही रहस्यमयी नदियों और तीर्थों का सिलसिला शुरू होता है।
इस दिव्य मार्ग का पहला रहस्यमयी पड़ाव गंडकी और लोहवती नदियों के मध्य स्नान के साथ शुरू होता है, जहां से आगे बढ़कर यात्री मां सरयू के तट पर पहुंचता है। यहां शुभ कूर्मशिला की पूजा करने और हंसतीर्थ के पवित्र जल में स्नान करने के बाद असली रोमांच शुरू होता है। दत्तात्रेय कहते हैं कि इसके बाद यात्री को दारुपर्वत की ओर बढ़ना होता है, जहां धरती के भीतर छुपा संसार यानी पाताल भुवनेश्वर स्थित है। पाताल भुवनेश्वर की इस अद्भुत गुफा में तीन दिनों तक कठिन उपवास और विधि-विधान से पूजन करने के बाद मनुष्य के भीतर के सारे पाप भस्म होने लगते हैं। इसके बाद रामगंगा में स्नान कर यात्री बालीश और शिवालिकरण जैसे पावन क्षेत्रों से होते हुए आगे बढ़ता है।
जैसे-जैसे यह यात्रा आगे बढ़ती है, प्रकृति का रौद्र और अलौकिक रूप सामने आने लगता है। यह महायात्रा आगे बढ़ते हुए एक सबसे चमत्कारी मोड़ को रेखांकित करती है। यात्री पावन पर्वत और वहां से ध्वज पर्वत की ओर कदम बढ़ाता है। इसके बाद वह स्थान आता है जहां धौली और काली नदियों का संगम होता है, जिसे कालीश का संगम-स्थल कहा गया है। इस संगम पर विधिवत अर्चना करने के बाद सामने खड़ी होती है चतुर्दंश यानी चौंदास पर्वत श्रृंखला। इस पर्वत की बनावट ऐसी है मानो स्वयं विशाल हिमालय के श्वेत दांत चमक रहे हों। इस अलौकिक दृश्य को पार करते ही यात्री उस परम स्थान पर पहुंचता है जिसने महाभारत और पुराणों की रचना की पृष्ठभूमि तैयार की—वह है व्यास आश्रम।
कृष्णा द्वैपायन महर्षि वेदव्यास ने इसी स्थान पर, श्यामा यानी काली नदी के मूल में स्थित कंदरा में तपस्या में लीन होकर एक लाख श्लोकों वाले महाग्रंथ स्कन्द महापुराण की रचना की थी। यहां रहने वाले ऋषि भले ही संसार के कठोर नियमों का पालन न भी कर पाएं, तो भी वे व्यास के समान ही पूजनीय माने जाते हैं।
रहस्य केवल पहुंचने के मार्ग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मानसरोवर की सीमा में प्रवेश करते ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक ऐसा चक्र शुरू होता है जो पूर्वजों की मुक्ति की गारंटी देता है। इन प्राचीन विवरणों के अनुसार, तारक पर्वत को लांघकर जब यात्री तारिणी और शारदा के पवित्र संगम पर पहुंचता है, तो उसे सिद्ध पुरुषों की वे गुप्त गुफाएं दिखाई देती हैं जहां आज भी अदृश्य शक्तियां निवास करती हैं। इसके बाद गौरी गिरि और वह गौरी गुफा आती है जहां माता पार्वती ने सदियों तक कठिन तपस्या की थी। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी महिमा यह है कि यदि किसी मनुष्य का कोई पूर्वज अपने बुरे कर्मों के कारण यमलोक के कष्ट भोग रहा हो, या उसका कोई वंशज आचारहीन भी हो, तब भी यदि कोई व्यक्ति मानसरोवर के इस परम पवित्र जल में अपने पितरों का तर्पण करता है, तो उसके सारे पूर्वज तत्काल यमराज के बंधनों से मुक्त होकर इंद्रलोक और साक्षात वैकुंठ को प्राप्त होते हैं। मानसरोवर का केवल दर्शन कर लेना ही मनुष्य को वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल प्रदान करता है।
लेकिन इस प्राचीन महायात्रा का सबसे बड़ा सस्पेंस इसके वापसी के मार्ग में छुपा है। पहुंचने से भी ज्यादा रहस्यमयी है वहां से वापस लौटने की कला। आगे चलकर योगिराज दत्तात्रेय उस ‘निर्गम मार्ग’ यानी वापस आने के गुप्त रास्ते का खुलासा करते हैं जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मानसरोवर की परिक्रमा पूरी करने के बाद यात्री को रावणहृद यानी राक्षसताल की ओर बढ़ना होता है। यह वही स्थान है जहां लंकापति रावण ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए एक विशेष शिवलिंग की स्थापना की थी। वहां से आगे बढ़कर शारदा नदी के उद्गम स्थल पर स्नान करने के बाद यात्री ‘खेचर तीर्थ’ पहुंचता है, जहां मुंडन और उपवास की कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बाद ब्रह्मकपाल, छायाक्षेत्र, और छायाक्षेत्रेश्वर के दर्शन करते हुए यात्री रामसर, ऋणमोचन और ब्रह्मसरोवर में प्रवेश करता है। यहां से आगे बढ़ते ही नंदा पर्वत पर स्थित अत्यंत सुंदर नंदा-सरोवर का मार्ग खुलता है, जहां से निवृत्त होकर वैद्यनाथ और लोक-पूजनीय मालिका देवी के दर्शन होते हैं। अंत में वृद्धगंगा के पावन जल में स्नान कर यह वापसी का मार्ग पूरा होता है।
इस पूरी रहस्यमयी यात्रा का महात्म्य साक्षात अग्निदेव की ज्वालाओं से जुड़ा हुआ है। इस दिव्य विवरण में महायात्रा के अंतिम पड़ाव का वर्णन आता है, जहां यात्री ज्वालामुखी और रुद्रवती के उबलते और धलकते जल में स्नान कर अग्निदेव की आराधना करता है। इसके बाद ही यह परम मानस यात्रा संपन्न मानी जाती है। योगिराज दत्तात्रेय इस रहस्यमयी खोज का समापन करते हुए कहते हैं कि इस मार्ग से की गई मानसरोवर की एक यात्रा का पुण्य, हजारों अश्वमेध यज्ञों से सौ गुना अधिक और काशी में हजारों वर्षों तक वास करने से भी हजार गुना अधिक फलदायी है। जो मनुष्य इस अद्भुत और रहस्यमयी यात्रा के प्रसंग को हर सुबह उठकर शांत चित्त से सुनता या पढ़ता है, वह मृत्यु के बाद साक्षात ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है और जीवन-मरण के इस भयानक चक्र से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है। स्कन्द पुराण के मानसखंड का यह ग्यारहवां अध्याय आज भी हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि उत्तराखंड की इन कंदराओं में इतिहास और भूगोल के ऐसे कितने ही रहस्य दफन हैं, जिनका पूरी तरह सामने आना अभी बाकी है।
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