नीली झील का वह अंतिम रहस्य जो काट देता है जनम-मरण के सारे बंधन

ख़बर शेयर करें

 

कठिन डगर पर दिव्य ज्योति का पावन अनुपम धाम है,
रजत शिखर पर साक्षात् शिव करते जहाँ विश्राम हैं।
कण-कण में है मुक्ति का स्वर कैलाश की महिमा अगाध,
श्रद्धा से जो शीश झुकाए मिट जाते सब कष्ट-व्याध।

धारचूला/सृष्टि के प्रारंभ से ही देवभूमि के आंचल में एक ऐसा दिव्य रहस्य छुपा है, जिसकी थाह पाना साधारण मनुष्यों के वश में नहीं। भगवान दत्तात्रेय ने जब राजा को मानसरोवर के गुप्त महात्म्य की कथा सुनानी शुरू की, तो वातावरण में एक अलौकिक सुगंध तैरने लगी। यह केवल एक जलराशि की कहानी नहीं थी, बल्कि महादेव शिव द्वारा माता पार्वती को बताए गए उन परम गोपनीय तीर्थों का जीवंत वर्णन था, जो मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के कर्मों के चक्र को एक पल में बदल देते हैं। कथा के प्रथम अध्याय में महादेव कहते हैं कि सतयुग में एक समय ऐसा आया जब सामान्य से दिखने वाले जीव भी अलौकिक गति को प्राप्त होने लगे। जामदग्न्य सरोवर के तट पर जब कौवे और सियार जैसे जीव भी शिवलोक और ब्रह्मलोक जाने लगे, तो देवताओं में कौतूहल जाग उठा।
पुरा कृतयुगे देवि जामदग्न्यसरोवरे।
मृता गृध्रा वरटाश्च गता ब्रह्मपुरं प्रति॥
इस पावन भूमि पर केवल जल नहीं बहता, बल्कि ऋषियों के तप और देवताओं के संकल्प की धाराएं प्रवाहित होती हैं। यहीं पर देवगुरु बृहस्पति की असीम कृपा से इंद्र को गौतम ऋषि के श्राप से मुक्ति मिली और उनके सौ नेत्र पुनः प्राप्त हुए। जब नल पर्वत से निकलकर पुण्यमयी पुष्पभद्रा नदी ब्रह्मा जी की आज्ञा से मानसरोवर में आकर मिलती है, तो दृश्य अत्यंत मनोरम हो जाता है। गूलर के घने वृक्षों से घिरे उस स्थान पर स्वयं भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं, जिनके दर्शन मात्र से मनुष्य संसार के सारे दोषों से मुक्त हो जाता है।
जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, रहस्य और गहराता जाता है। देवगुरु द्वारा आमंत्रित देवभद्रा नदी, जो विष्णु के अंगूठे से निकलकर राजा मान्धाता के दिखाए मार्ग से होती हुई मानसरोवर में विलीन होती है, अपने भीतर तैंतीस देवताओं के लिंग रूप को समेटे हुए है। महादेव पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती, अब तुम देवभद्रा के उन तीर्थों के विषय में सुनो, जिनका केवल श्रवण करने से ही प्राणी प्राणिजगत के बंधनों से मुक्त होकर मेरे परमधाम को प्राप्त कर लेते हैं।
ततस्तु देवभद्रायां तीर्थानि शृणु पार्वति।
यानि श्रुत्वा महाभागा व्रजन्ति मम मन्दिरम्॥
इस मार्ग पर पग-पग पर चमत्कारों का संसार है। जहाँ सौरभ तीर्थ में कामधेनु के साक्षात् दर्शन होते हैं, वहीं राम तीर्थ के संगम पर स्नान करने से सैकड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी भूमि पर राजा बलि ने तीन अश्वमेध यज्ञ कर रत्नों की दक्षिणा दी थी, जहाँ आज भी भगवान विष्णु के तीन पगों के पावन चिह्न अंकित हैं। कौतूहल तब और बढ़ जाता है जब हनुमान जी द्वारा स्थापित कपि तीर्थ का जिक्र आता है, जहाँ महादेव की आराधना कर उन्होंने दस हजार हाथियों का अपार बल प्राप्त किया था।
इस रहस्यमयी क्षेत्र के पश्चिम में जब हम दृष्टि डालते हैं, तो गौरी पर्वत दिखाई देता है, जिसके उत्तर से हंसों से सुशोभित चंद्रभागा नदी बहती है। इसके मूल में साक्षात् ब्रह्मा जी संपूर्ण चराचर विश्व के चिंतन में लीन हैं। यहाँ की चंद्रवती गुफा में चंद्रमा की अद्भुत मूर्ति दिखाई देती है। इसी मानस-क्षेत्र में आगे बढ़ने पर एक ऐसा स्थान आता है जहाँ स्वयं देवराज इंद्र ने राजा शिवि की परीक्षा लेने के लिए बाज का रूप धारण किया था और महादेव साक्षात् श्येन रूप में प्रकट हुए थे।
ततस्तु विश्वनाथायां श्येनतीर्थमिति स्मृतम्।
यत्रेद्रः श्येनरूपं च शिवं नेतुं चकार ह॥
कथा जब अपने चरम और सबसे बड़े रहस्य पर पहुँचती है, तब महादेव एक ऐसा अचूक सत्य प्रकट करते हैं जो संसार के भंवर में फंसे मनुष्यों के लिए एकमात्र सहारा है। वह कहते हैं कि इस पावन सरोवर के तट पर स्थित शिला पर साक्षात् भगवान विष्णु के चरण-चिह्न अंकित हैं। जब तक कोई मनुष्य इन दिव्य चरणों के साक्षात् दर्शन नहीं कर लेता, तब तक वह इस भयानक और दुखों से भरे संसार के चक्रव्यूह में भटकता रहता है
यावन्न मानवः सम्यक्पदं विष्णोः प्रपश्यति।
तावद् भ्रमति संसारे दारुणो दुःखसंकुल॥
इस मानस-क्षेत्र में स्थित तीन विष्णु-पदों का दर्शन करते ही जीव के कर्मों के सारे बंधन और रस्सी के समान जकड़े पाश हमेशा के लिए टूट जाते हैं। उस पावन विष्णु-चरणों से अंकित भूमि को केवल श्रद्धा भाव से स्पर्श करने मात्र से अधम से अधम मनुष्य का भी कल्याण हो जाता है और वह ऊर्ध्वगामी हो जाता है। इसी श्रृंखला में अंतिम रहस्य उजागर करते हुए महादेव कहते हैं कि यहाँ स्थित वामन तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य के इक्कीस कुलों का उद्धार हो जाता है और वह साक्षात् विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। वहाँ किया गया पिण्डदान पितरों को तब तक स्वर्ग में आनंदित रखता है, जब तक सृष्टि में जल की बूंदें विद्यमान हैं।
पश्चिम दिशा के इन सभी प्रमुख तीर्थों, नदियों और शिवलिंगों का यह परम गोपनीय वर्णन समाप्त करते हुए महादेव मंद मुस्कान के साथ माता पार्वती से पूछते हैं कि हे पार्वती, इसके बाद अब तुम मुझसे और क्या सुनना चाहती हो? इस प्रकार स्कन्दपुराण के मानसखण्ड का यह परम पावन सत्रहवां अध्याय अपनी अलौकिक और रहस्यमयी महिमा को समेटे हुए यहीं विश्राम लेता है।
लेखक@ रमाकान्त पन्त@