जब सिंहासन छोड़ सड़कों पर उतरा वो ‘अमर राजा’… जिसके आगे मिट गईं कई सल्तनतें!

ख़बर शेयर करें

 

आकाशे तारकं लिङ्गं, पाताले हाटकेश्वरम्।
मृत्युलोके महाकालं, लिङ्गत्रयं नमोऽस्तुते॥

सनातन परंपरा में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि आकाश में तारकेश्वर, पाताल में हाटकेश्वर और मृत्युलोक में महाकाल का वास है। उज्जैन का महाकालेश्वर इसलिए श्रद्धा का केंद्र नहीं बना कि वह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस धाम की पहचान उस विश्वास से बनी है, जिसके अनुसार महाकाल आज भी उज्जयिनी के राजा हैं। राजसिंहासन बदलते रहे, सल्तनतें आईं और चली गईं, पर इस नगरी का अधिपति कभी नहीं बदला।
सावन का पहला सोमवार आते ही उज्जैन का मिज़ाज बदल जाता है। क्षिप्रा के घाटों पर सुबह की आरती के साथ दिन शुरू होता है। मंदिरों की घंटियां, “हर-हर महादेव” का उद्घोष, कांवड़ियों की टोलियां और भस्म रमाए साधुओं की टोलियां बता देती हैं कि यह साधारण महीना नहीं है। वर्षा से धुली सड़कें, हवा में घुली मिट्टी की सोंधी खुशबू और हर ओर गूंजता शिव नाम, पूरे शहर को एक अलग ही आभा से भर देते हैं।
श्रावण का भगवान शिव से संबंध पुराणों में विस्तार से मिलता है। समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को शिव ने अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की। विष की तपन शांत करने के लिए देवताओं ने जल अर्पित किया। उसी स्मृति में आज भी सावन भर शिवलिंग पर जलाभिषेक होता है। शिवपुराण की कोटिरुद्र संहिता में महाकाल की कथा आती है। अवंती नगरी पर दूषण नामक असुर का अत्याचार बढ़ा तो भगवान शिव महाकाल रूप में प्रकट हुए। अधर्म का अंत हुआ और भक्तों के आग्रह पर शिव उसी भूमि पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए। तभी से उज्जयिनी महाकाल की नगरी कहलाने लगी।
उज्जैन में पीढ़ियों से प्रचलित है कि “राजा महाकाल, बाकी सब उनकी प्रजा।” यही विश्वास महाकाल की सवारी का आधार है। राजा अपनी प्रजा का हाल जानने राजमहल से निकलते है। महाकाल भी सावन में अपने गर्भगृह से निकलकर नगर भ्रमण करते हैं। यही कारण है कि इस यात्रा को लोग शोभायात्रा नहीं, राजाधिराज बाबा महाकाल की सवारी कहते हैं।
सावन के सोमवार की दोपहर चढ़ते-चढ़ते शहर का हर रास्ता महाकाल मंदिर की ओर मुड़ जाता है। सुबह से लोग सवारी मार्ग पर जगह घेर लेते हैं। कोई गांव से ट्रैक्टर भरकर आया है, कोई रात भर ट्रेन का सफर तय करके पहुंचा है। बुजुर्ग अपनी छड़ी के सहारे खड़े हैं। बच्चों को कंधों पर बैठाए पिता बार-बार सड़क की ओर देखते हैं। महिलाएं पूजा की थाली में फूल सजाती हैं। किसी के हाथ में रुद्राक्ष की माला है, किसी के होंठों पर शिव तांडव स्तोत्र फिर वह क्षण आता है, जिसका इंतजार हजारों आंखें कर रही होती हैं।
चांदी की पालकी में विराजमान बाबा महाकाल बाहर आते हैं। देखते ही देखते पूरा वातावरण “जय श्री महाकाल” के उद्घोष से गूंज उठता है। हाथ अपने आप जुड़ जाते हैं। कई आंखें नम हो जाती हैं। अनेक श्रद्धालु भाव-विभोर होकर सिर झुका देते हैं। उस समय किसी को भीड़ दिखाई नहीं देती, सबकी दृष्टि अपने आराध्य पर टिक जाती है।
पालकी आगे बढ़ती है और उसके साथ चलता है आस्था का अथाह सागर। सबसे आगे ध्वज, फिर घुड़सवार दल, पारंपरिक बैंड, अखाड़ों के साधु, वैदिक ब्राह्मण, भजन मंडलियां और हजारों श्रद्धालु। ढोल की थाप पर गूंजते “हर-हर महादेव” के स्वर वातावरण में ऐसा कंपन पैदा करते हैं, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। ऐसा लगता है मानो पूरी उज्जयिनी एक साथ शिवमय हो गई हो।
सवारी जिस गली से गुजरती है, वह कुछ समय के लिए तीर्थ बन जाती है। छतों से फूल बरसते हैं। कहीं गुलाब की पंखुड़ियां उड़ रही हैं, कहीं गेंदे के फूलों की वर्षा हो रही है। महिलाएं आरती उतारती हैं। छोटे-छोटे बच्चे हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं। दुकानों के बाहर रंगोली बनी है। व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों के सामने दीप जलाकर राजा का स्वागत करते हैं। जिन घरों के सामने से सवारी निकलती है, वहां उस दिन उत्सव का वातावरण रहता है।
महाकाल की सवारी का एक दृश्य हर बार लोगों को रोमांचित कर देता है। पालकी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, भीड़ भी उसके साथ बहने लगती है। कोई नंगे पैर चल रहा है, कोई “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रहा है। कोई बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम करता है। कई श्रद्धालु तो वर्षों से एक ही स्थान पर खड़े होकर बाबा के दर्शन करते हैं। उनका कहना होता है कि “राजा हमारे द्वार आए हैं, इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा।”
उज्जैन की यह परंपरा धर्म के साथ-साथ संस्कृति की भी पहचान है। मालवा के लोकवाद्य, अखाड़ों की परंपरा, संतों की उपस्थिति, वैदिक मंत्र, लोकभजन और जनभागीदारी । सब मिलकर ऐसी तस्वीर बनाते हैं, जो भारत की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। यही कारण है कि सावन के हर सोमवार को देश के अलग-अलग राज्यों से हजारों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। विदेशों से आने वाले पर्यटक भी इस शाही सवारी को देखकर भारतीय आस्था की विराटता का अनुभव करते हैं।
शाम ढलने लगती है। सवारी अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ती है। घंटों से खड़े लोग थके जरूर होते हैं, मगर उनके चेहरे पर संतोष साफ दिखाई देता है। उन्हें लगता है कि आज महाकाल ने उन्हें देखा है, उनकी प्रार्थना सुनी है। यही भाव हर वर्ष उन्हें फिर उज्जैन खींच लाता है।
सावन बीत जाता है, बारिश का मौसम भी बदल जाता है, मगर महाकाल की सवारी की स्मृतियां लोगों के मन में पूरे वर्ष जीवित रहती हैं। उज्जैन की पहचान महाकाल मंदिर से है, मगर उसकी आत्मा उस दिन दिखाई देती है, जब राजाधिराज अपने गर्भगृह से निकलकर अपनी प्रजा के बीच आते हैं। यही वह परंपरा है जिसने सदियों से आस्था को जीवित रखा है और यही वह दृश्य है, जिसे देखने के बाद हर श्रद्धालु के मुख से सहज ही निकल पड़ता है

यह भी पढ़ें 👉  प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, संवैधानिक अधिकार चाहिए

(पवन वर्मा -विनायक फीचर्स)
*”जय श्री महाकाल” *(विनायक फीचर्स)*

Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad