कैलाश के हिम-सन्नाटे में खोया वो अलौकिक रहस्य: नन्दा की विदाई पर रो पड़ा चार सींगों वाला मूक तपस्वी
पहाड़ केवल पाषाण और हिम के ढेर नहीं हैं; यह उस जगतजननी, आदिपराशक्ति माँ नन्दा का मायका है। और संसार में बेटी की विदाई से अधिक मर्मभेदी, हृदय-विदारक दृश्य भला दूसरा क्या हो सकता है? जब हिमालय की अपनी लाडली, सबकी अधिष्टात्री माँ नन्दा बारह वर्षों के बाद ससुराल (कैलाश) के लिए विदा होती है, तो मानो प्रकृति का कण-कण विरह की वेदना से तड़प उठता है। 280 किलोमीटर की इस बीहड़, विजन और प्राणलेवा नन्दा राजजात यात्रा के केंद्र में न कोई राजा होता है, न कोई सामंत—वहाँ केवल एक ही मूक सत्ता चलती है, जिसे देवभूमि श्रद्धा से पूजती है: ‘चौसिंगिया खाडू’ (चार सींगों वाला मेढ़ा)।
क्या था उस मूक जीव का अहोभाग्य!
सोचिए, उस चौसिंगिया खाडू का कैसा अलौकिक और अवर्णनीय सौभाग्य रहा होगा! पिछले जन्मों के न जाने किस अखंड पुण्य, किस कठिन तपस्या का फल उस मूक प्राणी को प्राप्त हुआ था कि उसे स्वयं त्रिलोकीनाथ भगवान शिव की अर्धांगिनी का दूत बनने का गौरव मिला। न उसके गले में कोई बंधन होता है, न कोई चरवाहा उसे हांकता है। शून्यांक से नीचे गिरते तापमान, हिंस्र बर्फीली हवाओं, रणसिंघों की भयंकर गूँज और लाखों भक्तों के उन्माद के बीच वह कभी डगमगाता नहीं। जैसे स्वयं भगवान भूतभावन शिव उसके चारों सींगों को थामकर अपनी शक्ति को कैलाश ले जाने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हों।
धियाणियों का विलाप और खाडू की भीगी आँखें
जैसे-जैसे यात्रा बीहड़ पगडंडियों से आगे बढ़ती है, पड़ाव-दर-पड़ाव पहाड़ की धियाणियाँ (विवाहित बेटियाँ) रोती-बिलखती, आँसुओं की धारा बहाती उसके सम्मुख आ गिरती हैं। दृश्य इतना कारुणिक होता है कि पत्थर भी पिघल जाए। कांपते हाथों से महिलाएँ उसके मस्तक पर रोली-पिठ्यां का तिलक लगाती हैं, अपनी छाती से चिपटाकर कलेवा भेंट करती हैं और सिसकते हुए उसके कानों में अपनी आत्मा उड़ेल देती हैं: “हे खाडू भाई! कैलाश में मेरी नन्दा से कहना कि मायके वाले उसे कभी भूले नहीं हैं… वहाँ श्मशानवासी शिव के बीच उसे कोई कष्ट न होने देना… हमारे आँगन का सुख-दुख, हमारी विरह-व्यथा माँ के चरणों में रख देना…”
और वह चार सींगों वाला मूक जीव? वह भागता नहीं, छटपटाता नहीं; वह एक स्नेही भाई की भाँति ठिठक जाता है। अपनी गहरी, करुण कत्थई आँखों से उन विलाप करती बहनों को ऐसे निहारता है, मानो सदियों से सिसकती पहाड़ की हर बेटी के आंसुओं का घूंट अपनी आत्मा में समा रहा हो। उसकी नीरवता में लाखों सिसकियों की गूँज होती है।
होमकुंड की अंतिम सीमा: जहाँ मानवीय सांसें भी थम जाती हैं
त्रिशूल पर्वत के चरणों में स्थित 17,500 फीट ऊंचे हिम-कुण्ड ‘होमकुंड’ पहुँचते-पहुँचते सांसें जमने लगती हैं। यहाँ आकर मनुष्यता की सीमा समाप्त हो जाती है। इसके आगे न कोई राजा जा सकता है, न कोई संत, न कोई पुजारी। यहाँ सिर्फ महाप्रयाण होता है।
यज्ञ की अंतिम आहुति के साथ जब होमकुंड में पूर्णाहुति पड़ती है, तो समस्त ब्रह्मांड एक अलौकिक, श्मशानवत सन्नाटे में डूब जाता है। गंगाजल और यज्ञ-भस्म से उस खाडू का अंतिम महा-अभिषेक किया जाता है। उसके चारों सींगों पर सिंदूर और स्वर्ण-पत्र मढ़े जाते हैं। उसकी पीठ पर बाँध दिया जाता है नन्दा के मायके का भेजा सारा अश्रुपूरित दहेज—रेशमी वस्त्र, स्वर्णाभूषण, कलेवा, सुगंधित धूप और रिंगाल की पवित्र छंतोली।
जब उस मूक जीव के कपोलों से बह निकले साक्षात विदाई के आँसू…
और ठीक उसी क्षण वह हृदय-विदारक चमत्कार घटित होता है, जिसे स्मरण करते ही आँखों से नीर की अविरल धारा बह निकलती है।
जो चार सींगों वाला खाडू 280 किलोमीटर तक एक वीर, अडिग संन्यासी की तरह आगे-आगे चला था, वह अंतिम विदाई की वेला में अचानक काँपने लगता है। उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखों के कोरों से गर्म अश्रुधारा छलक पड़ती है। एक मूक, बेजुबान पशु के कपोलों पर बहते हुए वे मानवीय आँसू साक्षात विदाई का रुदन बन जाते हैं! उपस्थित लाखों श्रद्धालुओं का कलेजा मुँह को आ जाता है, हर आँख से आँसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।
खाडू एक बार पीछे मुड़कर समूची मानव-सृष्टि को अंतिम बार देखता है—मानो भीगी पलकों से कह रहा हो: “अब लौट जाओ मायके वालो… तुम्हारी लाडली का भार अब मेरे कंधों पर है। मैं इसे इसके कैलाश तक पहुँचा आऊँगा।”
बर्फ के अंधड़ में सदा-सदा के लिए महा-अंतर्धान
इसके बाद, बिना किसी के धकेले, बिना एक बार भी पीछे मुड़े, वह चार सींगों वाला देवदूत सीधी, दुर्गम हिम-दीवारों और उस अनंत शून्य की ओर अकेला कदम बढ़ा देता है।
सफेद कोहरा धीरे-धीरे उतरता है… बर्फ का एक अलौकिक बवंडर उठता है… लाखों आँखें टकटकी लगाए उस श्वेत ढलान को ताकती रह जाती हैं… और पलक झपकते ही, वह चार सींगों वाला रहस्यमयी खाडू उन अगम्य, अनंत हिम-शिखरों में सदा-सदा के लिए विलीन हो जाता है।
सैकड़ों वर्षों के इतिहास में कभी उस खाडू की देह का एक तिनका या अवशेष नहीं मिला। वह कहाँ चला गया? क्या वह नंदी का ही कोई दिव्य स्वरूप था जो अपनी ईश्वरी का भार उठाकर शिव के धाम में समा गया? यह रहस्य आज भी बर्फ की चादर में लिपटा हुआ है।
पीछे छूट जाती है केवल होमकुंड की भस्म में सुलगती पवित्र धूप की महक, त्रिशूल पर्वत की अनंत नीरवता, और विरह में डूबे लाखों श्रद्धालुओं के कंठों से फूटती हुई वही एक मार्मिक, अश्रुपूरित सिसकी— “जै माँ नन्दा… फिर ऐए भोल… फिर ऐए मायके!”
@रमाकान्त पन्त@
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