नई दिल्ली:
सुरक्षा बलों का अभेद्य पहरा, अत्याधुनिक उपकरणों की सूक्ष्म जांच और बहुस्तरीय सुरक्षा का वह अनुशासित चक्रव्यूह, जहां परिंदा भी बिना अनुमति पर नहीं मार सकता। कौतूहल और रोमांच के बीच जैसे ही सुरक्षा के कड़े मानकों को पार कर संसद भवन के मुख्य तोरण द्वार खुले, सम्मुख साकार हो उठा 140 करोड़ भारतवासियों की आस्था, संप्रभुता और जन-आकांक्षाओं का परम पावन मंदिर। दोपहर ठीक 12 बजे लालकुआं का विशिष्ट प्रतिनिधिमंडल लोकतंत्र के इस सर्वोच्च प्रांगण में प्रविष्ट हुआ और अगले दो घंटे तक इतिहास, स्थापत्य व आधुनिक भारत के अप्रतिम वैभव का साक्षी बना।
संसद के दोनों सदनों का नयनाभिराम व सजीव अवलोकन
* लोक सभा: मयूर पंखों की हरित आभा और तकनीक का स्वर्णिम संगम:
सदन के भीतर कदम रखते ही राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर’ के पंखों की हरीतिमा पर आधारित नयनाभिराम सज्जा ने मन मोह लिया। गाइड ने बताया कि यहां सांसदों के बैठने की सुव्यवस्थित व्यवस्था है। प्रत्येक आसन पर अत्याधुनिक डिजिटल टच-स्क्रीन कंसोल, त्वरित बहुभाषी अनुवाद प्रणाली और बायोमीट्रिक वोटिंग यंत्र सुसज्जित हैं। विशाल छत पर उकेरी गई बारीक नक्काशी, प्रतिध्वनि-मुक्त ध्वनिकी और सामने स्थापित अध्यक्ष (स्पीकर) की गरिमामयी सर्वोच्च आसंदी राष्ट्र के गौरवशाली लोकतांत्रिक अनुशासन का सजीव बोध करा रही थी।
* राज्य सभा: राष्ट्रीय पुष्प कमल का लालित्य और उच्च सदन का गांभीर्य:
उच्च सदन यानी राज्य सभा में प्रवेश करते ही राष्ट्रीय पुष्प ‘कमल’ की पंखुड़ियों के रूपांकन पर आधारित लाल-मखमली कालीन और भव्य स्थापत्य ने सम्मोहित कर दिया। सभापति की सर्वोच्च आसंदी, उत्कृष्ट प्रकाश व्यवस्था और सदन की शांत गंभीरता देखते ही बनती थी। गाइड ने दल को शून्यकाल, प्रश्नकाल, विधायी प्रक्रियाओं, बिल पारित होने के नियमों तथा संयुक्त सत्र के संचालन के अनछुए संवैधानिक पहलुओं से विस्तारपूर्वक अवगत कराया।
* संविधान वीथिका और ऐतिहासिक भित्तिचित्र:
दोनों सदनों के साथ-साथ दल ने संसद के केंद्रीय गलियारों व संविधान वीथिका का भी गहन अवलोकन किया। दीवारों पर भारत की 5000 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक यात्रा—सिंधु घाटी, वैदिक काल, उपनिषद, रामायण-महाभारत से लेकर स्वाधीनता संग्राम तक—के जीवंत भित्तिचित्र और पाषाण शिल्प उकेरे गए हैं, जो भारत के अमर सांस्कृतिक प्रवाह का साक्षात दर्शन कराते हैं।
भ्रमण पर गणमान्य साथियों के भावपूर्ण उद्गार
* सुरेन्द्र सिंह लोटनी (अध्यक्ष, नगर पंचायत लालकुआं):
“संसद केवल भव्य पाषाण संरचना नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की धड़कन और जनविश्वास का पावन तीर्थ है। यहां आकर जनसेवा, समर्पण और सुशासन का संकल्प और अधिक प्रगाढ़ हो जाता है।”
* बी. सी. भट्ट (अध्यक्ष, प्रेस क्लब):
“सदन की ऐतिहासिक दीर्घाओं, मयूर-कमल के अप्रतिम स्थापत्य और संसदीय मर्यादा को इतने निकट से देखना जीवन का सबसे दुर्लभ, प्रेरणादायी व अविस्मरणीय क्षण है।”
* लक्ष्मण सिंह खाती (सांसद प्रतिनिधि):
“अभेद्य सुरक्षा की सतर्कता से लेकर सदनों के हाईटेक स्वरूप तक, यह दृश्य हृदय में गौरव भर देता है कि पूरे राष्ट्र के भविष्य की नीतियां इसी पवित्र पीठ से गढ़ी जाती हैं।”
* सचिन अग्रवाल (सामाजिक कार्यकर्ता):
“संसद का अनुशासन, डिजिटल व्यवस्था और संवैधानिक गरिमा मन में राष्ट्र निर्माण और जन-कल्याण के प्रति एक नई चेतना व अगाध निष्ठा का संचार करती है।”
* विरेन्द्र कोरंगा (वरिष्ठ साथी):
“सख्त सुरक्षा के अनुशासन से लेकर सदनों के अलौकिक विहंगम तक, यह दो घंटे का सफर नए भारत के सामर्थ्य, स्वाभिमान और वैश्विक गरिमा का प्रत्यक्ष साक्षात्कार रहा।”
* धन सिंह बिष्ट (सभासद):
“लोकतंत्र के सर्वोच्च गर्भगृह की कार्यप्रणाली को भीतर से निहारना एक अद्वितीय ऊर्जा देता है। यहां से लौटने के बाद जनहित के दायित्वों को नई निष्ठा से पूरा करने की प्रेरणा मिली।”
दोपहर 12 से 2 बजे तक का यह दो घंटे का ज्ञानवर्धक व रोमांचक सफर दल के प्रत्येक सदस्य के स्मृति-पटल पर राष्ट्रीय गौरव, लोकतांत्रिक चेतना और आत्मीय उल्लास के रूप में सदा अंकित रहेगा।
— रमाकान्त पन्त
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