काठगोदाम / रानीबाग
क्या हिमालय की उपत्यकाओं में कोई ऐसा भी गुप्त महातीर्थ विद्यमान है, जिसका मात्र नाम स्मरण करने से करोड़ों ब्रह्महत्या जैसे अक्षम्य पाप भी कपूर की भाँति उड़ जाते हैं? जहाँ एक वटवृक्ष की छत्रछाया में स्वयं सृष्टि के पालनहार श्रीहरि विष्णु ने योगनिद्रा ली और जहाँ विश्वकर्मा द्वारा रचित एक देदीप्यमान शिला पर त्रिदेव अपनी समस्त महाशक्तियों सहित सशरीर प्रकट हुए?
स्कन्दपुराण के मानसखण्ड (अध्याय ४२) के पन्नों में दर्ज यह वह पावन सत्य है, जो सदियों से सांसारिक कोलाहल से दूर केवल उच्च कोटि के ऋषियों और सिद्धों का परम गोपनीय रहस्य रहा है।
१. ‘भद्रवट’ का महात्म्य: महातीर्थों का भी अधिपति तीर्थ
सत्ययुग की पावन बेला में जब महर्षि शौनक आदि ऋषियों ने परम ज्ञानी महर्षि वेदव्यास जी से पूछा कि “हे विप्रर्षे! वह कौन-सा परम धाम है जहाँ समस्त तीर्थों की यात्रा और समस्त महादानों से भी अनंत गुना अधिक पुण्य सहज ही प्राप्त हो जाता है?”
तब व्यास जी ने तीनों लोकों को रोमांचित करने वाला रहस्योद्घाटन किया। उन्होंने बताया कि उस दिव्य क्षेत्र का नाम ‘भद्रवट’ है।
व्यास जी के अनुसार:
* जो फल कपिला गोदान, प्रयागराज में माघ-स्नान और सूर्य-चन्द्र ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र व पुष्कर में स्नान करने से मिलता है,
* जो मोक्ष काशी में देहत्याग, गया में पिंडदान तथा मानसरोवर के अमृत जल में डुबकी लगाने से प्राप्त होता है,
* जो पुण्य केदारनाथ के पावन जलपान और देवाधिदेव महादेव के पूजन से मिलता है—
वह समस्त पुण्यफल अकेले ‘भद्रवट’ की पावन माटी का स्पर्श करने मात्र से सुलभ हो जाता है।
श्लोक १:
क्षेत्रं भद्रवटं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।
सेवितं सिद्धगन्धर्वैर्गन्धर्वीभिस्तथैव च॥
यं स्मृत्वा मुनिशार्दूला ब्रह्महत्यादिकोटयः।
प्रद्रवन्ति न सन्देहः क्षेत्रं भद्रवटस्य हि॥
(अर्थ: भद्रवट नाम का यह क्षेत्र समस्त पापों का समूल नाश करने वाला है, जिसकी सेवा सिद्ध, गन्धर्व और अप्सराएँ करती हैं। हे मुनिश्रेष्ठों! इस क्षेत्र का केवल स्मरण करने मात्र से करोड़ों ब्रह्महत्या आदि घोर पाप तत्काल भाग जाते हैं, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है।)
२. ३६ वर्षों की मूक साधना: सुतपा मुनि का विस्मयकारी तप
ऋषियों के मन में जिज्ञासा जागी कि मृत्युलोक में इस गुप्त क्षेत्र और वहाँ स्थित ‘चित्रशिला’ का पता सर्वप्रथम किसे और कैसे चला?
व्यास जी ने सतयुग के आरंभ की एक स्तब्ध कर देने वाली कथा सुनाई। उस युग में ‘सुतपा’ नाम के एक परम तेजस्वी मुनि हुए। उन्होंने पुष्पभद्रा नदी के पवित्र जल में स्नान किया और भद्रवट वृक्ष की छाया में बैठकर मौन व्रत धारण कर लिया।
* अतुलनीय हठयोग: मुनि सुतपा ने अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठा लीं (ऊर्ध्वबाहु)।
* आहार का पूर्ण त्याग: उन्होंने भोजन का एक दाना तक ग्रहण नहीं किया; वे केवल वृक्षों से टूटकर गिरने वाले सूखे जीर्ण पत्तों और वायु का भक्षण करते रहे।
* समय की भीषण अवधि: पूरे छत्तीस (३६) वर्षों (त्रिगुणं द्वादशाब्दं अर्थात् तीन बार बारह वर्ष) तक मुनि सुतपा ने अडिग, अविचल और मौन रहकर ऐसा कठोर तप किया कि देवलोक का सिंहासन भी डोल उठा।
श्लोक २:
ऊर्ध्वबाहुर्महातेजाः शीर्णपर्णानिलाशनः।
त्रिगुणं द्वादशाब्दं वै तपस्तेपे सुदुष्करम्॥
ततः काले व्यतीते तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः।
मुनेरनुग्रहार्थाय ययुर्भद्रवटं द्विजाः॥
(अर्थ: दोनों भुजाएँ उठाए, केवल सूखे पत्तों और वायु का आहार करते हुए उस महातेजस्वी मुनि ने ३६ वर्षों तक अत्यंत दुष्कर तप किया। तब उनकी कठोर साधना से संतुष्ट होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव मुनि पर अनुग्रह करने भद्रवट पहुँचे।)
३. विश्वकर्मा की ‘चित्रशिला’ और त्रिदेवों का साक्षात प्रकटीकरण
जब मुनि के तपोबल से तीनों लोक प्रकाशमान हो उठे, तब मुनि पर कृपा करने के लिए त्रिदेव उस वनक्षेत्र में पधारे।
वहाँ पुष्पभद्रा नदी के प्रवाह के मध्य एक अलौकिक शिला विद्यमान थी। यह कोई साधारण पत्थर नहीं था; इसे स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा ने सोने जैसी दीप्ति और नाना प्रकार की दिव्य धातुओं के सम्मिश्रण से निर्मित किया था, जिसे ‘चित्रशिला’ कहा गया।
तीनों देव अपनी-अपनी महाशक्तियों—ब्राह्मी, वैष्णवी और माहेश्वरी के साथ उस स्वर्णिम शिला पर विराजित हो गए।
अचानक सन्नाटे को चीरती हुई मेघ के समान गंभीर और अमृतमयी वाणी गूँजी:
“हे ऋषिशार्दूल! तुम धन्य हो। तुम्हारी इस निष्काम तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। अब अपनी आँखें खोलो और मेरी ओर देखो!”
मुनि सुतपा ने जैसे ही अपने नेत्र खोले, उनके सामने एक अवर्णनीय दृश्य उपस्थित था:
* शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए, चतुर्भुज रूप में वनमाला से विभूषित भगवान विष्णु,
* वक्षःस्थल पर चमकता भृगुलता व श्रीवत्स चिह्न,
* सहस्रों सूर्यों के समान दिव्य कांति से युक्त श्रीहरि के साथ ब्रह्मा और देवाधिदेव महादेव भी चित्रशिला पर विराजमान थे।
मुनि ने मौन रहकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। अंतर्यामी भगवान विष्णु ने मुनि के मौन संकल्प को जान लिया और उन्हें अपने दिव्य विमान पर बैठाकर देवताओं सहित सीधे वैकुंठ लोक ले गए।
४. दुर्लभ मानव देह और चित्रशिला के दर्शन का महा-सौभाग्य
महर्षि व्यास जी बताते हैं कि चौरासी लाख योनियों के चक्रव्यूह में मानव देह पाना ही अत्यंत कठिन है, और उस मानव जन्म में इस दिव्य चित्रशिला के दर्शन प्राप्त हो जाना सुदुर्लभ से भी अति दुर्लभ है।
श्लोक ३:
दुर्लभं मानुषं जन्म मानुषे मुनिसत्तमाः।
सुदुर्लभतरं तत्र शिलासन्दर्शनं शुभम्॥
तत्रापि दुर्लभं मन्ये पुष्पभद्रासरिज्जले।
मज्जनं मुनिशार्दूला ब्रह्महत्याविनाशनम्॥
(अर्थ: हे मुनिश्रेष्ठों! इस संसार में मनुष्य का जन्म अत्यंत दुर्लभ है, उस मनुष्य जन्म में भी इस मंगलमयी दिव्य चित्रशिला का दर्शन मिलना सुदुर्लभतर है; और पुष्पभद्रा नदी के पावन जल में डुबकी लगाना तो दुर्लभतम है, जो ब्रह्महत्या जैसे पापों को भी नष्ट कर देता है।)
५. भूगोल का साक्षी: रानीबाग और मार्कण्डेय मुनि की तपस्थली
पुराणों का यह पावन क्षेत्र आज भी धरती पर जीवंत है:
* आधुनिक भूगोल के अनुसार, काठगोदाम (उत्तराखंड) से नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित ‘रानीबाग’ ही वह प्राचीन तीर्थ है, जहाँ पुष्पभद्रा (गौला नदी) के तट पर रंग-बिरंगे पाषाणों से सुशोभित ‘चित्रशिला’ आज भी विद्यमान है।
* श्रीमद्भागवत महापुराण (द्वादश स्कंध) के अनुसार, इसी पुष्पभद्रा नदी के तट पर आगे चलकर परम तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि ने भी कठोर तपस्या कर भगवान हृषीकेश को प्रसन्न किया था और महाकाल पर विजय प्राप्त की थी।
अंतिम सत्य: गर्भवास के कष्ट से सदा के लिए मुक्ति
इस पूरे आख्यान का सबसे बड़ा आध्यात्मिक सत्य यह है कि जो भी पुण्यात्मा पुष्पभद्रा नदी के निर्मल जल में स्नान करके इस चमत्कारी चित्रशिला और दक्षिण तट पर स्थित पवित्र भद्रवट की पूजा करता है, उसे फिर कभी मृत्युलोक में जन्म लेकर माता के गर्भ का कष्ट नहीं भोगना पड़ता।
श्लोक ४:
यैः स्नानं पुष्पभद्राया जले पुण्यप्रदे द्विजाः।
निमज्य पुष्पभद्राया जले यैः पूज्यते शिला॥
ते मातृजठरं विप्रा न पश्यन्ति पुनः पुनः।
दक्षिणे पुष्पभद्रायाः पुण्यं भद्रवटं हि ये।
प्रपश्यन्ति महाभागास्ते यान्ति परमां गतिम्॥
(अर्थ: हे विप्रगण! जो मनुष्य पुण्यप्रदा पुष्पभद्रा नदी के जल में स्नान कर इस दिव्य शिला का पूजन करते हैं, वे बार-बार माता के गर्भ (पुनर्जन्म के चक्र) का मुख नहीं देखते। और जो पुष्पभद्रा के दक्षिण तट पर स्थित पवित्र भद्रवट के दर्शन करते हैं, वे महाभाग्यशाली जीव परम गति—मोक्ष को प्राप्त होते हैं।)
भद्रवट की वह शीतल छाया और पुष्पभद्रा की लहरों में चमकती चित्रशिला आज भी संसार के त्रितापों से झुलसते जीवों को यह अमर संदेश दे रही है कि जहाँ अनन्य निष्काम भक्ति और मौन तप होता है, वहाँ भवसागर के समस्त बंधन स्वतः ही कट जाते हैं।
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