जब थम गया था सूर्य का रथ और कांप उठा था कंस: विंध्याचल की कंदराओं में जाग्रत उस त्रिकोण का रहस्य, जिसके दर्शन बिना अधूरी है देवों की भी साधना

ख़बर शेयर करें

 

सृष्टि के आरंभ से ही कुछ ऐसे अलौकिक स्थान रहे हैं, जहाँ समय की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं और प्रत्यक्ष दिव्यता सांस लेती प्रतीत होती है। उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में पतित-पावनी गंगा के पावन तट पर स्थित विंध्याचल पर्वतमाला का आँचल एक ऐसा ही परम जाग्रत शक्ति-पुंज है। यह केवल पर्वत शृंखला नहीं, बल्कि धरती पर उकेरा गया साक्षात त्रिकोण यंत्र है, जिसके केंद्र में स्वयं जगदंबा ‘माँ विंध्यवासिनी’ के रूप में विराजमान हैं।

पुराणों का वचन है कि कलिकाल के घोर अंधकार में माँ विंध्यवासिनी की आराधना वह अमोध कवच है, जिसके बिना किसी भी साधक की कोई भी तंत्र, मंत्र या देव-उपासना फलीभूत नहीं हो सकती।

जब विंध्य के अहंकार ने निगल लिया था सूर्य का प्रकाश

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण और स्कंद पुराण में विंध्य पर्वत के प्राकट्य और देवी के वहाँ वास की एक अत्यंत रोमांचक कथा मिलती है। एक समय सुमेरु पर्वत की महिमा देखकर विंध्य पर्वत के मन में गहरी ईर्ष्या और अहंकार जाग उठा। सूर्य, चंद्रमा और समस्त नक्षत्र मेरु पर्वत की परिक्रमा करते थे। विंध्य ने सोचा कि उसका अस्तित्व सुमेरु से भी श्रेष्ठ है।

अहंकार के वशीभूत होकर विंध्य ने अपने शिखरों को गगनचुंबी विस्तार देना शुरू किया। वह इतना ऊंचा उठा कि उसने सूर्य का मार्ग ही पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया। दिन के समय भी पृथ्वी पर घोर अंधकार छा गया। ऋतु चक्र ठहर गया, वनस्पतियाँ सूखने लगीं और तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गई।

घबराए हुए देवगण पहले देवाधिदेव महादेव की शरण में पहुँचे। भगवान शिव ने उन्हें जगतपालक श्रीहरि विष्णु के पास भेजा। देवताओं ने भगवान विष्णु के मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे दशावतार स्वरूपों की विह्वल भाव से महास्तुति की। तब भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए देवताओं से कहा—

“विंध्य के इस अगाध अहंकार को कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं, बल्कि महर्षि अगस्त्य का तपोबल ही झुका सकता है।”

देवताओं की प्रार्थना पर महर्षि अगस्त्य दक्षिण की ओर चले। जब विंध्य पर्वत ने अपने परम पूज्य गुरु अगस्त्य मुनि को आते देखा, तो वह लज्जित होकर उनके चरणों में दंडवत नतमस्तक हो गया। दूरदर्शी महर्षि अगस्त्य ने विंध्य से कहा—“हे विंध्य! जब तक मैं दक्षिण से लौटकर वापस न आऊँ, तब तक तुम इसी मुद्रा में झुके रहना।”

अगस्त्य मुनि दक्षिण में ही रम गए और कभी लौटकर उत्तर नहीं आए। विंध्य का अहंकार सदा के लिए झुक गया और सूर्य का मार्ग निष्कंटक हो गया। इसके पश्चात देवताओं और स्वयं स्वायम्भुव मनु की प्रार्थना पर जगज्जननी भगवती ने इस झुके हुए शांत पर्वत को अपना शाश्वत निवास बनाया।

यह भी पढ़ें 👉  थाली में छिपा कालचक्र: क्या हर पहर का निवाला लील रहा है आपकी उम्र?

कंस के हाथों से फिसलकर आकाश में गूंजी वह महाचेतावनी

मार्कण्डेय पुराण के ‘दुर्गा सप्तशती’ के ग्यारहवें अध्याय (नारायणी स्तुति) में स्वयं भगवती ने अपने इस अवतार की भविष्यवाणी करते हुए कहा था:

\text{“नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥”}

द्वापर युग में जब मथुरा के कारागार में वासुदेव और देवकी के आँसुओं के बीच भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, उसी क्षण गोकुल में यशोदा के गर्भ से इस दिव्य शक्ति ने कन्या के रूप में जन्म लिया। वासुदेव जी ने बालक कृष्ण को यशोदा की गोद में रखकर उस कन्या को मथुरा पहुँचा दिया।

जब पापी कंस ने उस नवजात कन्या को पैर से पकड़कर पत्थर की शिला पर पटकना चाहा, तो वह कन्या कंस के हाथों से बिजली की भांति फिसलकर शून्य आकाश में उड़ गई। उसी क्षण आकाश में अष्टभुजा रूप धारी देवी का महातेजस्वी विग्रह प्रकट हुआ। हाथों में शंख, चक्र, गदा, धनुष-बाण लिए सिंहवाहिनी योगमाया ने उस कालरात्रि में अट्टहास करते हुए कहा—

“रे मूर्ख कंस! मुझे मारकर तुझे क्या मिलेगा? तुझे समाप्त करने वाला तेरा काल तो पृथ्वी पर जन्म ले चुका है!”

वह अलौकिक शक्ति कंस को चेतावनी देकर अंतर्धान हो गईं और सीधे विंध्य पर्वत की कंदराओं में आकर प्रतिष्ठित हुईं। इसी कारण इन्हें ‘कृष्णानुजा’ (भगवान श्रीकृष्ण की बहन) भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो भी साधक माँ विंध्यवासिनी की शरण में आता है, उस पर भगवान द्वारकाधीश और माँ जगदंबा दोनों की कृपा एक साथ बरसती है।

यह भी पढ़ें 👉  पर्वों के उल्लास के बीच देश में अशांति की कौन रच रहा पटकथा? भाजपा नेता तरुण पंत के सनसनीखेज आरोपों से सियासी हलचल तेज

धरती पर खिंचा साक्षात ‘त्रिकोण यंत्र’: तीन किलोमीटर, तीन देवियाँ

विंध्याचल की भौगोलिक बनावट कोई साधारण प्राकृतिक संरचना नहीं है, बल्कि यह तांत्रिक दृष्टि से निर्मित एक दुर्लभ त्रिकोण पीठ है। मात्र तीन किलोमीटर के घेरे में आदिशक्ति के तीनों स्वरूप साक्षात जागृत अवस्था में निवास करते हैं:

  1. शिखर पर माँ विंध्यवासिनी (महालक्ष्मी स्वरूप): गंगा तट के समीप बस्ती के मध्य स्वर्णमयी आभा बिखेरता यह मुख्य मंदिर है। यहाँ माँ विंध्यवासिनी ‘कौशिकी’ के रूप में विराजमान हैं, जिन्होंने शुंभ-निशुंभ और महिषासुर का मर्दन किया था। मंदिर प्रांगण में खर्परेश्वर महादेव और पश्चिम भाग में माँ का सम्मोहक विग्रह साधकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
  2. काली खोह में माँ महाकाली (संहार शक्ति): विंध्यवासिनी मंदिर से दक्षिण दिशा में घने वनों और पहाड़ियों की गोद में ‘काली खोह’ गुफा स्थित है। यहाँ माँ महाकाली का मुख-स्वरूप अत्यंत तेजस्वी है। इनके समीप ही भैरव बाबा का सिद्ध मंदिर है, जिनकी अनुमति बिना तांत्रिक साधना पूर्ण नहीं होती।
  3. पहाड़ के उत्तरी छोर पर माँ अष्टभुजा (महासरस्वती स्वरूप): पर्वत के ऊंचे शिखरों पर स्थित अष्टभुजा देवी का पावन मंदिर ज्ञान, विद्या और विवेक का केंद्र है। यह वही योगमाया का विग्रह है जो कंस के हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हुआ था।

विंध्याचल आने वाले श्रद्धालुओं के लिए इस त्रिकोण परिक्रमा का विशेष विधान है। जब कोई साधक इन तीनों मंदिरों की पदयात्रा करता है, तो उसके जीवन के तीनों ताप—आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—भस्म हो जाते हैं।

तीर्थों का संगम: राम के चरण से सीता के आँसुओं तक

विंध्य का यह क्षेत्र केवल शक्तिपीठ ही नहीं, बल्कि प्रभु श्री रामचंद्र की स्मृति से भी आवेष्टित है। लंका विजय के उपरांत यहाँ माता सीता के चरण-चिह्न अंकित ‘सीता कुंड’ आज भी प्रत्यक्ष दर्शनीय है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा स्थापित माता मंगला देवी का मंदिर, विंध्येश्वर महादेव, संकटमोचन हनुमान मंदिर, शीतला माता और सात पावन सरोवरों (सप्तसागर) का समूह इस पूरे पर्वत को जीवंत तपोभूमि बना देता है।

यह भी पढ़ें 👉  पर्वों के उल्लास के बीच देश में अशांति की कौन रच रहा पटकथा? भाजपा नेता तरुण पंत के सनसनीखेज आरोपों से सियासी हलचल तेज

साधना का गूढ़ रहस्य: 31 दिनों का संकल्प

शक्त परंपरा के साधकों और माँ पीताम्बरा के अनन्य उपासकों का दृढ़ विश्वास है कि ब्रह्मांड में किसी भी देवी या देवता को अपना इष्ट बनाने से पूर्व माँ विंध्यवासिनी की अनुमति लेना अनिवार्य है।

आगम शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा जी जिस शक्ति से सृष्टि रचते हैं, विष्णु जिससे पालन करते हैं और शिव जिससे संहार करते हैं—वह मूल चेतना विंध्यवासिनी ही हैं। यही कारण है कि किसी भी महाविद्या, गायत्री या इष्ट मंत्र को सिद्ध करने से पूर्व साधक को 31 दिनों तक माँ विंध्यवासिनी के बीज मंत्रों का अनुष्ठान करना चाहिए। यह 31 दिवसीय साधना साधक के चित्त को निष्कलंक कर उसके इष्ट के प्रति अचल निष्ठा स्थापित कर देती है।

प्राचीन काल में चक्रवर्ती राजा स्वायम्भुव मनु ने इसी पावन पर्वत पर घोर तप करके जगदंबा को प्रसन्न किया था और उसी कृपा के बल पर समस्त विघ्न-बाधाओं से रहित होकर निष्कंटक राज्य भोगते हुए परम मुक्ति प्राप्त की थी।

लाल ध्वजाओं से सुशोभित विंध्य की ये पर्वतमालाएं आज भी गंगा की कल-कल बहती लहरों के साथ मिलकर यही संदेश देती हैं—जिसने इस त्रिकोण यंत्र पर अपने शीश को झुका दिया, उसके भाग्य के अवरोध ठीक उसी प्रकार हट जाते हैं, जैसे अगस्त्य मुनि के एक संकेत पर विंध्य पर्वत का अहंकार झुक गया था।

(मूल आलेख व क्षेत्रीय विवरण: रमाकान्त पन्त)

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad