थाली में छिपा कालचक्र: क्या हर पहर का निवाला लील रहा है आपकी उम्र?

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मनुस्मृति और पुराणों की अचूक चेतावनी; 24 घंटे में सिर्फ दो पहर का आहार ही है अमृत, बाकी समय मुंह चलाना धीमी आत्महत्या समान

आधुनिक जीवनशैली ने हमारी थालियों को भले ही कई तरह के स्वादों से भर दिया हो, लेकिन इस निरंतर चबाते रहने की संस्कृति ने मनुष्य की जीवन-डोर को भीतर से खोखला कर दिया है। ‘हर दो घंटे में थोड़ा-थोड़ा खाइए’ का आधुनिक नुस्खा थमाने वाले पोषण विशेषज्ञों की थ्योरी को हमारे सनातन ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही सिरे से खारिज कर दिया था। मनुस्मृति, कूर्म पुराण, मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण की संहिताओं में छिपा एक ऐसा वैज्ञानिक विधान दर्ज है, जो आज की उच्छृंखल दिनचर्या की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है। शास्त्रों की दो टूक व्यवस्था है कि इस नश्वर देह के लिए 24 घंटे में केवल ‘द्विकाल भोजन’ ही धर्मसम्मत और स्वास्थ्यवर्धक है—एक दिन के उजाले में और दूसरा रात के आगमन से पूर्व; इसके अतिरिक्त बीच में बार-बार उदर में अन्न झोंकना पोषण नहीं, बल्कि व्याधियों का बीजारोपण है।

मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय और कूर्म पुराण में इस शाश्वत सत्य पर मुहर लगाते हुए स्पष्ट उद्घोष किया गया है—‘सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं श्रुतिचोदितम्। नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः॥’ अर्थात वेदों और श्रुतियों का स्पष्ट आदेश है कि मनुष्य के लिए केवल प्रातः/मध्याह्न और सायं—दो समय ही अन्न ग्रहण करने का विधान है। सनातन दर्शन में पेट भरने को महज एक जैविक क्रिया नहीं, बल्कि साक्षात ‘अग्निहोत्र यज्ञ’ की संज्ञा दी गई है। जिस प्रकार यज्ञवेदी में नियत काल पर ही हविष्य की आहुति दी जाती है और असमय डाली गई सामग्री यज्ञ को दूषित कर देती है, ठीक उसी तरह उदर की जठराग्नि भी केवल निश्चित पहर पर ही आहुति स्वीकार करती है।

इस शास्त्रीय विधान की सबसे विस्मयकारी बात इसका सूर्य के परिभ्रमण और मानव शरीर-क्रिया विज्ञान के साथ सटीक तादात्म्य है। शास्त्र दिन के प्रथम भोजन का विधान दूसरे प्रहर में करते हैं, यानी सूर्योदय के लगभग ढाई से तीन घंटे बाद—पूर्वाह्न 9:30 से दोपहर 12:00 बजे के मध्य। इसका कारण यह है कि जैसे-जैसे सूर्य नभमंडल के शीर्ष पर पहुंचता है, ठीक उसी अनुपात में मानव शरीर की पाचक अग्नि प्रचंड होकर प्रदीप्त होती है। इस समय किया गया भारी से भारी भोजन भी शरीर में भस्म होकर ऊर्जा में बदल जाता है। वहीं, दिन के दूसरे भोजन का समय सूर्यास्त से आधा प्रहर पूर्व अथवा प्रथम प्रहर के आरंभ में, यानी शाम 6:30 से 7:30 बजे के बीच निश्चित किया गया है। ढलते सूर्य के साथ प्रकृति की ऊर्जा मंद पड़ती है और जठराग्नि शिथिल होने लगती है; इसलिए सांझ ढलते ही किया गया सुपाच्य और हल्का भोजन ही शरीर को आरोग्य प्रदान करता है, बशर्ते वह निद्रा के आगोश में जाने से कम से कम तीन घंटे पूर्व संपन्न हो चुका हो।

प्रकृति के इस चक्र के विपरीत जाकर यदि कोई अनर्गल समय पर थाली सजाता है, तो पुराण उसे भोजन नहीं, महादोष करार देते हैं। शास्त्रों ने तीन कालखंडों को भोजन के लिए पूर्णतः निषिद्ध और प्राणघातक ठहराया है। पहला है दिन और रात का संधिकाल, जिसे गोधूलि वेला या त्रिकाल संध्या कहते हैं। ‘संध्याकाले न भुञ्जीत…’ का कड़ा निर्देश देते हुए ऋषियों ने आगाह किया था कि डूबते सूर्य के समय अन्न का दाना मुख में डालना दरिद्रता और असाध्य उदर रोगों को निमंत्रण देना है। दूसरा वर्जित पहर है रात 11:00 से 2:00 बजे का निशीथ काल, जिसे आधुनिक पीढ़ी ‘मिडनाइट क्रेविंग’ का फैशनेबल नाम देती है; शास्त्रों में इसे विशुद्ध आसुरी और राक्षसी भोजन कहा गया है, जो तामसिक वृत्तियों और भयंकर व्याधियों को जन्म देता है। वहीं तीसरा और सबसे कठोर नियम अजीर्ण की अवस्था का है। ‘अजीर्णे भोजनं विषम्’—जब तक पहले खाया गया अन्न पूरी तरह पचकर रस न बन चुका हो, तब तक दूसरा ग्रास छूना साक्षात गरल पीने के समान है।

यह साधना केवल समय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भोजन करते समय दिशा और मनोभावों का अनुशासन भी उतना ही अनिवार्य है। पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन करने से आयु की वृद्धि होती है, जबकि उत्तर मुखी होकर बैठने से यश, कीर्ति और धन-धान्य का आशीर्वाद मिलता है। दक्षिण दिशा यम और पितरों की दिशा मानी गई है, इसलिए सामान्य दिनों में दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करना सर्वथा त्याज्य है। अन्न का सत्कार करते हुए थाली के चारों ओर जल का आचमन कर प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नामक पंचप्राणों को ‘पंचग्रास’ अर्पित करने की शास्त्रीय परंपरा भोजन को अध्यात्म से जोड़ती है।

क्रोध, संताप, विवाद या मोबाइल स्क्रीन की चकाचौंध में निगल लिया गया भोजन अमृत होकर भी विष बन जाता है; शांत और प्रसन्न चित्त से ग्रहण किया गया दो वक्त का सीमित आहार ही मानव को शतायु बनाता है। आज जब पश्चिम का वैज्ञानिक जगत ‘सर्कैडियन रिदम’ और ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ के नाम पर सनातन के इसी ज्ञान को नए आवरण में बेच रहा है, तब आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने ऋषि-मुनियों की इस वैज्ञानिक विरासत को पहचानें और थाली के संयम से जीवन का कायाकल्प करें।

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