लालकुआँ रविवार की सुनहरी प्रभात बेला में माँ अवंतिका देवी मंदिर प्रांगण का दृश्य सामान्य दिनों से सर्वथा भिन्न था। मंदिर के शांत और भक्तिमय वातावरण में अचानक उस वक्त एक दिव्य ऊर्जा और कौतूहल का संचार हो गया, जब देश की राजधानी दिल्ली और असम से पहुंचे श्रद्धालुओं का जत्था मां के दरबार में नतमस्तक दिखाई दिया। आस्था की यह ऐसी अनूठी डोर थी, जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर भक्तों को सीधे मां के चरणों में खींच लाई थी।
मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य चन्द्रशेखर जोशी ने वेद मंत्रोच्चार के बीच सभी श्रद्धालुओं को माँ अवंतिका के पौराणिक महात्म्य, अलौकिक इतिहास और उनकी कृपा से अवगत कराया। मंदिर के पावन स्वरूप और सिद्ध पीठ की महत्ता को सुनकर हर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठा। इस पावन अवसर पर मंदिर कमेटी के वरिष्ठ मार्गदर्शक कुन्दन सिंह नेगी, आदर्श रामलीला कमेटी के अध्यक्ष बी. सी. भट्ट, मंदिर कमेटी के अध्यक्ष लक्ष्मण खाती तथा समाजसेवी विरेन्द्र कोरंगा की अगुवाई में बाहर से पधारे अतिथियों का पारंपरिक व आत्मीय अभिनंदन किया गया। सभी आगंतुकों को माता की पवित्र मंगल पट्टिका पहनाई गई और स्मृति स्वरूप ‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ पुस्तक सप्रेम भेंट की गई।
दिल्ली से पधारे श्रद्धालु कृष्णा भराली ने अपने भावुक उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि माँ अवंतिका की महिमा किसी अलौकिक आकर्षण की तरह है, जो दूर बैठे भक्तों को भी अपनी ओर खींच लेती है। उन्होंने कहा, “हमने केवल मां के चमत्कारों और इस पावन धाम की महिमा के बारे में सुना था, परंतु यहां कदम रखते ही जिस असीम शांति और वात्सल्य की अनुभूति हुई, उसने अंतरात्मा को तृप्त कर दिया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो मां वर्षों से हमारी ही प्रतीक्षा कर रही थीं। यह यात्रा मात्र एक दर्शन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे सुखद और पावन आध्यात्मिक उपलब्धि बन गई है।”
मां के जयकारों और भक्तिमय भजनों से संपूर्ण परिसर दिनभर गुंजायमान रहा। इस गरिमामयी समागम ने यह सिद्ध कर दिया कि श्रद्धा जब अटूट हो, तो दूरियां मिट जाती हैं और माँ अवंतिका का दरबार हर समर्पित हृदय को अपनी असीम कृपा से सराबोर कर देता है।
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