स्कंद पुराण के मानस खंड में वर्णित है गण पर्वत (गणनाथ-ताकुला) का अद्वितीय माहात्म्य; देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा स्थापित प्रतिमा की महादेव ने की थी विधिवत महापूजा
ताकुला (अल्मोड़ा) — रमाकान्त पन्त
सनातन संस्कृति में किसी भी मांगलिक अनुष्ठान, यज्ञ अथवा विवाह से पूर्व विघ्नविनाशक भगवान श्रीगणेश की पूजा का सर्वोपरि विधान है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के शिव-पार्वती विवाह प्रसंग में एक अत्यंत विस्मयकारी चौपाई लिखी है—‘मुनि अनुशासन गनपतिहि पूजेहु शंभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥’ अर्थात् भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के समय भी मुनियों ने श्रीगणेश की पूजा संपन्न कराई थी। यह विचार किसी को भी गहरे कौतूहल में डाल देता है कि जो गणेश कालांतर में माता पार्वती के उबटन से प्रकट हुए और शिव-पार्वती के पुत्र कहलाए, स्वयं महादेव ने अपने विवाह और सृष्टि के अन्य दिव्य कार्यों से पूर्व उनकी आराधना क्यों की?
इस गूढ़ और अलौकिक रहस्य का सविस्तार उद्घाटन महर्षि वेदव्यास जी ने स्कंद पुराण के ‘मानस खण्ड’ के 69वें अध्याय में किया है। इसका सीधा संबंध देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में स्थित पावन ‘गण पर्वत’ (गणनाथ क्षेत्र, ताकुला) से है।
अनादि ‘प्रणव’ (ॐकार) के साक्षात स्वरूप हैं गणाध्यक्ष
स्कंद पुराण के अनुसार, जब नैमिषारण्य में ऋषियों ने महर्षि व्यास से गणाध्यक्ष की महिमा और उनके पूजन के वास्तविक फल के विषय में जिज्ञासा प्रकट की, तब व्यास जी ने स्पष्ट किया कि संसार में मानव जीवन पग-पग पर अदृश्य विघ्नों से घिरा रहता है। इन विघ्नों के कारण मनुष्य के शुभ संकल्प और सत्कर्म विनष्ट हो जाते हैं।
व्यास जी ने स्पष्ट किया कि भगवान गणेश केवल एक रूप या पुत्र मात्र नहीं, बल्कि वे अनादि परब्रह्म और वेदों के मूल मंत्र ‘प्रणव’ (ॐ) के साक्षात विग्रह हैं। जिस प्रकार ॐ के उच्चारण के बिना कोई भी वेद-मंत्र प्रारंभ नहीं हो सकता, उसी प्रकार गणाध्यक्ष के स्मरण के बिना देव-पूजा भी फलदायी नहीं होती:
यथा सर्वत्र वेदेषु प्रणवः प्रथमोच्यते। तथा सर्वत्र पूजायां गणेशः प्रथमोच्यते॥ (अर्थात्: जिस प्रकार सभी वेदों के अध्ययन व पाठ में सर्वप्रथम ‘प्रणव’ (ॐ) का उच्चारण अनिवार्य है, ठीक उसी प्रकार संपूर्ण ब्रह्मांड की समस्त पूजा-पद्धतियों में श्री गणेश का पूजन ही सर्वप्रथम किया जाता है।)
देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा प्रतिमा निर्माण और महादेव की आराधना
मानस खंड के अनुसार, समस्त सृष्टि और मानव जाति के संकटों के निवारण हेतु देवशिल्पी विश्वकर्मा (त्वष्टा) ने गण पर्वत के अग्रभाग (सर्वोच्च शिखर) पर भगवान श्रीगणेश की एक परम कल्याणकारी और दिव्य प्रतिमा की प्रतिष्ठा की थी। इसके उपरांत, जगत के कल्याण और कार्यों की निर्विघ्न सिद्धि के निमित्त स्वयं देवाधिदेव महादेव ने पर्वत के शिखर पर आरोहण कर रक्तचंदन, अक्षत, धूप और दूर्वांकुरों से प्रथम पूज्य गणपति का विधिवत पूजन व अभिषेक किया था।
शास्त्र में यहां तक स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि जो मनुष्य गण पर्वत के शिखर पर गणपति का अर्चन किए बिना सीधे भगवान आशुतोष की पूजा का प्रयास करते हैं, उनकी वह साधना निष्फल हो जाती है:
ये गणेशमपूज्याशु पर्वताग्रे द्विजोत्तमाः। कल्पयन्ति महापूजां शङ्करस्य तपोघनाः। तेषां निरर्थका पूजा जायते नात्र संशयः॥ (अर्थात्: जो लोग पर्वत के अग्रभाग पर पहले गणेश जी का विधिवत पूजन किए बिना सीधे भगवान शंकर की महापूजा करते हैं, उनकी वह पूजा सर्वथा निरर्थक हो जाती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।)
पावन ‘गणिका नदी’ का प्राकट्य और पुण्य तीर्थों की श्रृंखला
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने गण पर्वत पर गणाध्यक्ष के अभिषेक का उपक्रम किया, तब उन्होंने स्कन्दी को जलाभिषेक हेतु पावन जल लाने का निर्देश दिया। स्कन्दी भगवान शिव की आज्ञा शिरोधार्य कर साक्षात पुण्यतोया सरयू नदी का पावन जल लेकर उपस्थित हुए।
महादेव के गणों द्वारा पर्वत के छोर से जिस अमृतमयी धारा को प्रवाहित किया गया, वही भूतल पर ‘गणिका’ नदी के नाम से विख्यात हुई। स्कंद पुराण के अनुसार, गणिका नदी में स्नान करने से सरयू स्नान के समान ही पुण्य फल की प्राप्ति होती है और मनुष्य देवराज इंद्र के लोक को प्राप्त करता है।
- स्कन्दीसर: गणिका नदी के मूल (उद्गम) में ‘स्कन्दीसर’ नामक दिव्य सरोवर स्थित है। इसमें स्नान और पितृ-तर्पण करने से मनुष्य की पूर्ववर्ती और परवर्ती दस पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।
- गण-सेवित तीर्थ: इसी पावन परिधि में शिव-गणों द्वारा सेवित ‘रिति तीर्थ’, ‘काम तीर्थ’ तथा ‘गणेश तीर्थ’ अवस्थित हैं।
- सत्ययुग तीर्थ: यहां स्थित सत्ययुग तीर्थ में पिंडदान व श्राद्ध करने से साधक के 101 कुलों का उद्धार होता है और वे दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक गमन करते हैं।
- गोत्रजा संगम व गणिकेश महादेव: आगे चलकर जहां गणिका नदी का संगम ‘गोत्रजा’ नदी से होता है, वहां ‘गणिकेश’ नामक महादेव विराजते हैं तथा पर्वत की अधित्यका (शिखर) पर साक्षात माता गिरिजा (पार्वती) का वास है।
गोमती के दक्षिण में स्थित ‘टङ्गण’ (ताकुला) की अमर विरासत व पहुंच मार्ग
स्कंद पुराण के मानस खंड में जिस सुरम्य भूभाग को गोमती नदी के दक्षिण में स्थित ‘टङ्गण’ प्रांत (महाभारत काल में प्रतङ्गण) कहा गया है, वही आज का ऐतिहासिक ताकुला और गणनाथ क्षेत्र है।
सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से ताकुला की दूरी लगभग 32 किलोमीटर है। अल्मोड़ा से कोसी-सोमेश्वर-ताकुला मोटर मार्ग अथवा अल्मोड़ा-बागेश्वर मुख्य मार्ग के जरिए आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है। ताकुला मुख्य बाजार से देवदार और बांज के घने जंगलों के बीच गण पर्वत (गणनाथ धाम) का मनोहारी आध्यात्मिक मार्ग शुरू होता है। यह वही पावन भूमि है जहां स्वयं महादेव ने गणपति की आदि-सत्ता को प्रणाम कर संसार को यह संदेश दिया था कि अहंकार और पद से परे, मर्यादा और निर्विघ्नता का मार्ग केवल प्रथम पूज्य गणाध्यक्ष के चरणों से होकर ही गुजरता है।
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