औद्योगिक विकास और प्रकृति का अद्भुत समन्वय: सेंचुरी पल्प एंड पेपर के महा-हरित संकल्प पर सीईओ अजय गुप्ता से विशेष बातचीत

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औद्योगिक विकास और प्रकृति का अद्भुत समन्वय: सेंचुरी पल्प एंड पेपर के महा-हरित संकल्प पर सीईओ अजय गुप्ता से विशेष बातचीत
लालकुआँ/ देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा पर हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक जीवंत अनुष्ठान है। आज जब दुनिया पर्यावरण असंतुलन और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद कर रही है, तब तराई और कुमाऊं क्षेत्र की प्रमुख औद्योगिक इकाई सेंचुरी पल्प एंड पेपर (सीपीपी), लालकुआं ने एक मिसाल पेश की है। हरेला पर्व के शुभ अवसर पर मिल परिसर में 5,000 पौधों के रोपण के साथ एक वृहत अभियान की शुरुआत की गई है। इस महा-अभियान के विजन, रणनीति और भविष्य की योजनाओं को समझने के लिए पेश है सेंचुरी मिल के सीईओ अजय गुप्ता के साथ एक विशेष और मार्गदर्शक साक्षात्कार।
प्रश्न हरेला पर्व पर सेंचुरी मिल के इस बृहद वृक्षारोपण अभियान का मुख्य लक्ष्य और विजन क्या है?
उत्तर (सीईओ अजय गुप्ता): हमारा विजन बेहद स्पष्ट है— औद्योगिक प्रगति और पर्यावरण का सह-अस्तित्व। इस वर्ष हरेला पर्व के पावन अवसर पर हमने सिर्फ औपचारिकता के लिए पौधे नहीं रोपे हैं, बल्कि यह हमारे उस महा-संकल्प की शुरुआत है जिसके तहत सेंचुरी मिल का सामाजिक वानिकी एवं पर्यावरण विभाग इस साल समूचे क्षेत्र में ढाई करोड़ पौधे रोपने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। हमारा विजन आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र सौंपना है, जहाँ हवा शुद्ध हो और धरती हरी-भरी हो। हम देवभूमि से पूरी दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि उद्योग और प्रकृति एक साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकते हैं।
प्रश्न : स्थानीय पर्यावरण को देखते हुए इस अभियान में किस प्रकार के पौधों को प्राथमिकता दी गई है?
उत्तर (सीईओ अजय गुप्ता): पौधों का चयन करते समय हमने तराई और कुमाऊं क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और जैव-विविधता का विशेष ध्यान रखा है। हमने मुख्य रूप से तीन श्रेणियों के पौधों को प्राथमिकता दी है। पहली श्रेणी में औषधीय और फलदार पौधे जैसे नीम, आंवला, अर्जुन और जामुन शामिल हैं, जो स्थानीय वन्यजीवों को भोजन देने के साथ-साथ पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं। दूसरी श्रेणी में पारंपरिक एवं विशाल वृक्ष जैसे पीपल और बरगद हैं, जो दीर्घकालिक रूप से सबसे ज्यादा ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं। तीसरी श्रेणी में सदाबहार और सुंदर प्रजातियां जैसे अमलतास, कचनार, करौंदा, कनेर, गुलमोहर, अशोक, चांदनी और बोतल सावनी शामिल हैं। ये पौधे न केवल भूधंसाव को रोकते हैं, बल्कि क्षेत्र के सौंदर्य को भी बढ़ाते हैं।
प्रश्न 3 : रोपे गए पौधों की सुरक्षा और उनकी देखरेख के लिए क्या ठोस व्यवस्था की गई है?
उत्तर (सीईओ अजय गुप्ता): अक्सर देखा जाता है कि लोग पौधे तो रोप देते हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में वे नष्ट हो जाते हैं। सेंचुरी मिल में हम इस धारणा को बदल रहे हैं। हमारे पास इसके लिए एक समर्पित सामाजिक वानिकी एवं पर्यावरण विभाग है। रोपे गए हर पौधे की सुरक्षा के लिए ट्री-गार्ड्स की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, मिल परिसर और आसपास के क्षेत्रों में नियमित सिंचाई (टपकन पद्धति) और जैविक खादों का उपयोग सुनिश्चित किया गया है। हम केवल पौधे लगाते नहीं हैं, बल्कि उनके वृक्ष बनने तक उनकी अभिभावक की तरह देखरेख करने की ठोस नीति पर काम कर रहे हैं।
प्रश्न इस हरित अभियान से स्थानीय ग्रामीणों, युवाओं और समाज को कैसे जोड़ा जा रहा है?
उत्तर (सीईओ अजय गुप्ता): कोई भी बड़ा बदलाव बिना जनभागीदारी के संभव नहीं है। हम इस अभियान को एक जन-आंदोलन का रूप दे रहे हैं। इसके लिए हम स्थानीय ग्राम पंचायतों, महिला मंगल दलों और युवा क्लबों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इसके तहत ग्रामीणों और किसानों को उनकी निजी और सामुदायिक भूमि पर रोपण के लिए मुफ़्त में उच्च गुणवत्ता वाले फलदार और औषधीय पौधे वितरित किए जा रहे हैं, जिससे उनकी आजीविका भी सुधरेगी। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाकर युवाओं को एक छात्र, एक पेड़ मुहिम से जोड़ा जा रहा है ताकि उनमें बचपन से ही पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव जागे।
प्रश्न : पर्यावरण संतुलन और कार्बन फुटप्रिंट कम करने के लिए मिल की भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
उत्तर (सीईओ अजय गुप्ता): एक जिम्मेदार औद्योगिक इकाई के रूप में, कार्बन फुटप्रिंट को न्यूनतम करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल है।
प्रश्न : हरेला के इस पावन अवसर पर आप आम जनता और अन्य उद्योगों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर (सीईओ अजय गुप्ता): मेरा संदेश बहुत सरल और सीधा है धरती माँ ने हमें जीवन दिया है, अब समय आ गया है कि हम इसे इसका हरा-भरा स्वरूप लौटाएं। आम जनता से मेरी अपील है कि वे त्योहारों, जन्मदिनों या किसी भी शुभ अवसर पर कम से कम एक पौधा जरूर लगाएं और उसे बड़ा करने का संकल्प लें। रही बात अन्य उद्योगों की, तो हमें यह समझना होगा कि आर्थिक प्रगति तब तक अधूरी है जब तक हमारी प्रकृति सुरक्षित नहीं है। पर्यावरण संरक्षण को केवल एक दायित्व न मानकर, अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी बनाना ही आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। आइए, मिलकर इस धरती को सुंदर और रहने योग्य बनाएं।