माँ अवंतिका मंदिर पहुंचकर इस तरह मनाया अपनी दिवंगत पुत्री का जन्म दिवस भाजपा हल्दूचौड़ मण्डल अध्यक्ष ने, विधायक सहित सैकड़ों रहे उपस्थित

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लालकुआँ भारतीय जनता पार्टी के हल्दूचौड़ मण्डल के अध्यक्ष विजय रोहित दुम्का एवं श्रीमती चित्रा दुम्का ने अपनी दिवंगत पुत्री माही दुम्का के जन्म दिवस के अवसर पर माँ अवंतिका मन्दिर में पहुंचकर माँ अवंतिका व अवंतिकेश्वर महादेव का पूजन अर्चन कर मन्दिर में भण्डारे का आयोजन किया इस कार्यक्रम में क्षेत्रीय विधायक डा० मोहन सिंह बिष्ट सहित तमाम भक्तों ने भाग लेकर भण्डारे का प्रसाद ग्रहण किया
पूजा अर्चना का कार्य मंदिर के आचार्य पण्डित चन्द्रशेखर जोशी ने पूर्ण विधि विधान के साथ सम्पन कराया माही की याद में उसके जन्म दिवस पर विशेष रूप से कन्या पूजन का भी आयोजन हुआ
इस अवसर पर विधायक डा० मोहन सिंह बिष्ट के अलावा सांसद प्रतिनिधी लक्ष्मण सिह खाती विधायक प्रतिनिधि गोविन्द सिह राणा युवा समाज सेवी विनय रजवार सभासद धन सिह बिष्ट योगेश उपाध्याय हेमन्त पाण्डे मण्डल उपाध्यक्ष अशोक पढ़ालनी महामन्त्री राजकुमार फुलारा क्षेत्र पंचायत सदस्य कमला दुर्गापाल हेम दुर्गापाल वरिष्ठ भाजपा नेता दयाकिशन दुम्का विनोद भट्ट सरिता जड़ौत मेघा त्रिपाठी सहित स्व० माही दुम्का के दादा शिव दत्त दुम्का व दादी रेखा दुम्का सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे

पूजा – अर्चना व भण्डारे के दौरान मंदिर के आचार्य पण्डित चन्द्रशेखर जोशी ने कहा हर प्राणी के अंतस में ईश्वर का वास होता है इसलिए जिसे बीते समय में दुम्का दम्पति जिसे अपनी पुत्री मानते थे उसी को आज नन्दा व राधा स्वरूप में पूजकर ईश्वरीय विधान के प्रति सच्ची आस्था प्रकट कर रहे है यही सनातन का सिद्धान्त है उन्होंने कहा नन्दाष्टमी व राधाष्टमी के संगम में ही माही का जन्म दिन है ये भी विधि का गजब संयोग है ऐसे अवसर पर अपनी पुत्री की याद में इनके द्वारा कराया गया भण्डारा पूजन सच्चा पूजन है

यहां यह भी बताते चले कि लालकुआं में स्थित माँ अवंतीका का मंदिर प्राचीन शक्ति स्थलों में एक है देवी माँ के इस दरबार में जन्मदिवस मनाने व अपने पूर्वजों पित्रजनों का स्मरण करने की परंपरा काफी समय से प्रचलित है मान्यता है कि यहां पर किसी भी कार्य के उद्देश्य से की जाने वाली पूजा अर्चना का पूर्ण फल प्राप्त होता है इसी क्रम में प्रसंग वश नन्दाष्टमी राधाष्टमी पर माँ अवंतिका की अद्भुत महिमा

रुक्मणी व श्री कृष्ण की आराध्या देवी

रुक्मणी व श्री कृष्ण की आराध्या देवी अवान्तिका के मदिरं में आदि शक्ति जगत-जननी माता जगदम्बा का विराट स्वरुप जहां भांति-भांति रुपों में पूजित है, कुमाऊं के प्रवेश द्वार लालकुआं नगर में अवन्तिका माता के रुप में यह देवी बड़े ही श्रद्वा के साथ पूजित है, मान्यता है, कि मर्यादित, संयमित नीतिसम्मत, सिद्वान्तपरक, मूल्यपरक कुल मिलाकर शान्तिपूर्वक जीवन यापन व्यतीत करने के इच्छुक भक्तों के लिए माँ अवन्तिका की शरणागति ही हर तरह के संशय, संकट भय रोग,शोक दुख दरिद एवं विपदाओं से मुक्त करती है। शिव के साथ माँ का पूजन वैभव को प्रदान करने वाला कहा गया है।
मानस भूमि के प्रवेश द्वार ललिता देवी की नगरी लालकुआं नगर के उतर दिशा में माता अवन्तिका का दरबार सदियों से पूज्यनीय है, इस स्थान पर माता अवन्तिका की पूजा कब से होती है यह सब अज्ञात है। कुछ देवी भक्तों का मानना है, कि पूर्वकाल में घनघोर जंगल होने के कारण वट वृक्ष के नीचे माता की एक छोटी सी मूर्ति थी जिसे भक्तजन ललिता देवी, वन देवी, कोकिला देवी, त्रिपुर सुन्दरी आदि तमाम रुपों में अपनी अपनी भावनाओं को इस देवी को पूजते थे,

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प्रसिद्ध संतो की रही है विश्राम स्थली

हिमालय की और जाने वाले ऋषि मुनी संतजन इस क्षेत्र में विश्राम के दौरान इस देवी को विभिन्न रुपों में पूजकर हिमालय भूमि की और प्रस्थान करते थे, इसलिए नगर का यह क्षेत्र हिमालयी संस्कृति की आधार भूमि मानी जाती है, इसलिए देवभूमि हिमालय के बारे में पुराणों में कथन है, ‘‘अस्त्युन्तरस्या दिषि देवतात्मा हिमालयों नाम नगाधिराजः’’ वास्तव में महाशक्ति ही परम ब्रहमा के रुप में हिमालय भूमि के कदम-कदम पर प्रतिष्ठित है, यहां पधारने वाले लोग सबसे अधिक श्रद्वा स्वभाविक रुप से माता श्री के चरणों में अर्पित करता है, हिमालय भूमि में प्रवेश से पूर्व यहां से गुजरने वाले आगन्तुकों को अवन्तिका माता के दर्शन के बाद ही हिमालय दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है, हिमालय भूमि में नौ दुर्गाओं दस महाविघाओं सहित अनके स्वरुपों में उनकी लीलाऐं दृष्टिगोचर होती है,

परमात्मास्वरुपिणी अवन्तिका है उज्जैन की महादेवी

अवंतिका माता उज्जैन की महाशक्ति देवी है उज्जैन नगरी में श्री महाकाल के साथ उनकी पूजा की जाती है उत्तराखंड में लालकुआं में माँ अवंतिका का एकमात्र मंदिर है जिसे अवंती नगरी की भांति ही परम श्रद्धा के साथ पूजा जाता है परमात्मास्वरुपिणी अवन्तिका शक्ति मन्दिर परिसर में आज धीरे-धीरे अनेकों देवी देवताओं के छोटे-छोटे मन्दिर है, जिनका निमार्ण स्थानीय भक्तजनों ने बड़े ही श्रद्वा भाव के साथ किया है, चैत्र, आषाढ़, अष्विन, और माघ इन मासों के चारों नवरात्रों में यहां अवन्तिका देवी का विधि का पूर्वक पूजन किया जाता है।
अवन्तिका माता की महिमा का वर्णन अनन्त व अगोचर है, अवन्तिका देवी के बारे में पुराणों में अनेको कथाएं मिलती है,

करुणामयी देवी के रूप में है पूजित

माँ अवन्तिका देवी करुणामयी, दयामयी तथा ममता का अथाह सागर कही गयी है, अपने भक्तों से स्नेह रखना तथा उनका सर्वत्र मंगल करना माँ का परम स्वभाव है। शास्त्रकारों का कथन है, कि विषम परिस्थितियों के बीच जो भक्त सम्पूर्ण श्रद्वा विश्वास व समर्पण की भावना से अपने आराधना के श्रद्वा पृष्प माँ के चरणों में अर्पित करता है, वह कल्याण का भागी बनता है, इसलिए माता अवन्तिका की अराधना, उपासना वदंना मनुष्य के लिए कल्याणकारी बतलायी गयी है, इसी शक्ति तत्व में माता के सभी रुप समाहित है, जो सृष्टि के कल्याण के लिए अनेकानेक लीलाओं का सतत सृजन करती है।
‘‘आधारभूता जगतस्त्वमवेका मही स्वरुपेण यतः स्थितासि’’ इस देवी के दरबार में समान्यतः जीवन में असाध्य रोगों व गम्भीर संकटो से छुटकारा पाने के लिए हर तरह की विध्न बाधाए शान्त करने के लिए विधि पूर्वक किए जाने वाला पूजन अत्यधिक प्रभावशाली व तत्काल फलदायी माना गया है, स्वयं ब्रहमा जी ने माँ की स्तुति एवं महिमागान करते हुए कहा है, कि हे देवी तुम्ही इस विश्व ब्रहमाण्ड को धारण करती हो, तुम से ही इस जगत की सृष्टि होती है, तुम्ही से पालन होता है, देवी तुम्ही महामाया हो, महाविधा हो महामेद्या हो, महास्मृति और महामोहारुपा भी महादेवी व महेश्वरी भी तुम्हीं हो, तुम ही श्री ईश्वरी व बोध स्वरुपा बुद्वि हो तथा लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति, तथा क्षमा भी तुम्हीं हो तुम खड्ग धारिणी, घोर रुपा तथा गदा चक्र, और धनुष धारण करने वाली हो तुम सौम्य और सौम्यतर हो इतना ही नही जितने भी सौम्य पदार्थ एवं सुन्दर वस्तुंए है, तुम उनमें अत्यधिक सुन्दर हो इस तरह उस सर्वस्वरुपा आघ शक्ति माँ अवन्तिका की महिमा अनन्त है। उनके अर्धश्लोकी परमश्लोक से यह बात पूर्ण रुप से स्पष्ट हो जाती है।
सर्व रवल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्
(श्रीमद देवी भा0 1/15/52)
अर्थात् सब कुछ में ही हूं, और दूसरा कोई भी सनातन नही है।

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जानकार लोग बताते है ललिता देवी व वन दुर्गा के रुप इस में स्थान पर देवी पूजन की प्रारम्भिक प्रक्रिया धीरे धीरे अवन्तिका व कोकिला आदि अनेकों रुप में हुई बारहाल गौरतलब बात यह है, कि माता अवन्तिका का मूल स्थान उज्जैन में है, जो मन्दिरों का शहर है, यहां राम घाट क्षिप्रानदी ऋषि संदीपनी आश्रम सहित असख्ंय मंदिर है, समुद्र मथंन से भी इस नगरी की रोचक गाथा जुड़ी हुई है, देष में अनेक स्थानों पर माता अवंतिका की पूजा होती है, उतर प्रदेश में बुलंदशहर जनपद की अनूप शहर तहसील के अंतर्गत जहांगीराबाद से 15 किमी दूर पतित पावनी गंगा नदी के तट पर इस देवी का दरबार सदियों से पूज्यनीय है, अंवतिका देवी को अम्बिका माता रुप से प्रकट हाने की दंत कथा काफी प्रसिद्व है, दूर-दराज क्षेत्रों से लोग दर्शन हेतु यहां पधारते है।

श्री कृष्ण व रुक्मणी ने भी की थी माँ की पूजा

योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने माता अवन्तिका की कृपा से ही रुक्मिणी को प्राप्त किया और रुक्मिणी की पूजा से ही प्रसन्न होकर माता ने उन्हें भगवान श्री कृष्ण से विवाह होने का वरदान दिया, माता अवन्तिका के प्रसंग में इस संबध में अनेकों दतं कथाएं प्रचलित है, गौरतलब बात यह है, कि सात पुरियों में अवन्तिका पुरी का विषेश स्थान है।
प्रथम मोक्ष दायिनी पुरीः- श्री अयोध्या
द्वितीय मोक्षदायिनी पुरीः- श्री मथुरा
तृतीय मोक्षदायिनी पुरीः- श्री हरिद्वार
चतुर्थ मोक्ष दायिनी पुरीः- श्री काषी
पंचम मोक्ष दायिनी पुरीः- श्री कांचीपुरम्
छठी मोक्षदायिनी पुरीः- श्री अवन्तिका
सप्तम् मोक्षदायिनी पुरीः- द्वारिका

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लालकुआं स्थित अवन्तिका देवी के बारे में स्थानीय बुर्जगजन बताते है, कि पूर्व में यहां पर माता के वाहन का आवगमन रहता था, बाद में धीरे-धीरे नगर में बढ़ती बसासत के बाद शेर के दर्शन दुर्लभ हो गये इस स्थान पर शक्ति का अवतरण कब और कैसे हुआ सब कुछ अज्ञात है, साथ ही नगर की बसासत के प्रारम्भिक चरण में क्षेत्र की समृद्वि व शान्ति के लिए यहां पर कोटगाड़ी देवी की स्थापना भी की गई ज्ञातव्य हो कि कोटगाड़ी अर्थात् कोकिला देवी का मूल शक्ति पीठ जनपद पिथौरागढ़ के पाखूं नामक क्षेत्र में है, यह देवी न्यायकारी देवी के रुप में प्रसिद्व है, यहां पर अवन्तिका माता के साथ साथ कोकिला माता की पूजा करने से भक्तजनों को परम शान्ति की प्राप्ति होती है, वर्तमान समय में स्थानीय भक्तजनों ने मंदिर को भव्य व दिव्य रुप प्रदान किया है।

माँ अवन्तिका की पूजन विधी

अवन्तिका देवी को अम्बिका माता के नाम से भी पुकारा जाता है।
ये स्वयंभू देवी है, इसलिए भू देवी के रुप में भी इनकी पूजा की जाती है।
अवंतिका देवी को सिन्दूर, व चोला एव आभूषण चढ़ाया जाता है।
इनके दरबार में घी से दीपक जलाया जाता है।
कुंवारी युवतियां अच्छे पति की कामना से अंवतिका देवी का पूजन करती है।
रुक्मिणी ने भगवान श्री कृष्ण को पति के रुप में पाने के लिए इनकी ही आराधना की
अंवितका देवी के पूजन के पष्चात् श्री कृष्ण व रुक्मिणी का पूजन अखण्ड सौभाग्यदायक माना जाता है।
अंवितका देवी पापों का नाष करने वाली तथा भुक्ति और मुक्ति प्रदायनी है।
भक्त प्रहलाद भी माता अवन्तिका की कृपा पाकर कृतार्थ हुए थे वामन पुराण में इसका जिक्र है।
भगवान श्री कृष्ण, श्री बलराम व श्री सुदामा को मां अवन्तिका का विसेषं आर्षीवाद था।
अंवतीखण्ड में विस्तार से देवी के महात्म्य का वर्णन आता है, तथा कहा जाता है।
शरीर रुपी पाप तभी तक गर्जना करते है, जब तक मां अवन्तिका का स्मरण नही किया जाता है।
अत्री ऋषि ने इनकी घोर तपस्या से महाऋषि का स्थान प्राप्त किया।
मंगल देव की उत्पति भी माँ अवन्तिका की कृपा से ही हुई इनके पूजन से मंगल का दोष मिट जाता है।
माता अवन्तिका के पूजन के साथ महाकाल की पूजा का विधान है।
अवन्तिका माता के अन्य नमः- विषाला देवी, प्रतिकल्पा देवी, मां कुमुदवती, मंदनी, स्वर्णषृगा,नंदनी अमरावती सहित असंख्य नाम है।

 

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