मोक्ष के उस अज्ञात गलियारे का रहस्य: क्या मिट सकता है जन्म-मरण का चक्र?

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मोक्ष के उस अज्ञात गलियारे का रहस्य: क्या मिट सकता है जन्म-मरण का चक्र? विशेष संवाददाता: @ रमाकान्त पन्त

नैमिषारण्य: सदियों से मानव चेतना जिस एक अबूझ पहेली को सुलझाने में जुटी रही है कि क्या संचित पापों का पूर्ण संहार और जन्म-मरण के अनंत चक्रव्यूह से मुक्ति संभव है, उसी रहस्य के तार अब गरुड़ पुराण के पृष्ठों में सुलझते नजर आ रहे हैं। महर्षि सूतजी और शौनकजी के बीच हुए इस गोपनीय संवाद ने तीर्थों के छिपे हुए विज्ञान को उजागर कर एक गहरा कौतूहल पैदा कर दिया है। आख्यान का आरंभ ही एक चौंकाने वाले तथ्य से होता है, जहाँ सूतजी बताते हैं कि समस्त तीर्थों में शिरोमणि माँ गंगा यूँ तो सर्वत्र सुलभ हैं, किंतु हरिद्वार, प्रयागराज और गंगासागर के पावन संगम जैसे तीन दुर्लभ ठिकानों पर उनका प्रभाव अलौकिक और विस्मयकारी हो जाता है। विशेषकर प्रयाग को एक ऐसा असाधारण केंद्र माना गया है, जहाँ देहत्याग करने वाले को न केवल मोक्ष मिलता है, बल्कि उसके जीवित रहते भुक्ति यानी सांसारिक सुख भी सहज प्राप्त हो जाते हैं; यहाँ पितरों के निमित्त किया गया पिंडदान समस्त पापों को भस्म कर मनोरथ सिद्ध कर देता है।

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रहस्यों की यह शृंखला यहीं नहीं रुकती; आगे बढ़ते हुए काशी में भगवान विश्वनाथ और केशव का शाश्वत पहरा मिलता है, तो कुरुक्षेत्र में दिया गया दान मनुष्य को भोग और मोक्ष के दोनों सिरों से जोड़ देता है। सोमनाथ की ज्योति से आलोकित प्रभास, भुक्ति-मुक्ति दायिनी द्वारका, सरस्वती का पावन प्रवाह, पाप-विनाशक केदार और नर-नारायण की तपोभूमि बदरिकाश्रम तक एक ऐसा अनदेखा दिव्य जाल बिछा है जो सीधे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इस आध्यात्मिक मानचित्र में पुष्कर, अयोध्या, चित्रकूट, नैमिषारण्य, काञ्ची, रामेश्वरम, महाकाल की उज्जयिनी, कामरूप की जाग्रत कामाख्या देवी और पुण्ड्रवर्धन के कार्तिकेय तक के क्षेत्र शामिल हैं, जहाँ सूर्य, शिव, गणेश, महालक्ष्मी और श्रीहरि का निरंतर सान्निध्य बना रहता है। नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, ताप्ती, कृष्णा और गंडकी जैसी पवित्र सरिताओं में स्नान, तप, जप और श्राद्ध का फल कभी समाप्त न होकर ‘अक्षय’ बन जाता है।

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किंतु इस पूरे आख्यान में सबसे रोमांचक और अप्रत्याशित मोड़ तब आता है, जब शास्त्रों ने भौतिक नदियों से दृष्टि हटाकर सीधे मनुष्य के अंतर्मन में झांकने की चुनौती दी। सूतजी एक गहरा भेद खोलते हुए कहते हैं कि ‘यह तीर्थ है और यह तीर्थ नहीं’—यह द्वंद्व केवल उन्हीं के लिए है जिनकी दृष्टि अभी संकुचित है; जो हर कण में ब्रह्म को देखता है, उसके लिए पूरा ब्रह्मांड ही तीर्थ है। इसी क्रम में सृष्टि का सबसे बड़ा ‘मानस तीर्थ’ उजागर होता है—जहाँ इंद्रिय-निग्रह और ब्रह्म-ध्यान ही वास्तविक तीर्थ हैं, और ज्ञानरूपी सरोवर के ध्यानमयी जल में अपने राग-द्वेष रूपी मैल को धो लेना ही मनुष्य को साक्षात परमगति दिला देता है।

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कथा के चरमोत्कर्ष पर एक ऐसी सनसनीखेज प्रतिज्ञा सामने आती है जो साधकों को स्तब्ध कर देती है—गंगाद्वार, कुशावर्त, विंध्यपर्वत, नीलगिरि और कनखल; ये वे पाँच महातीर्थ हैं जहाँ विधिपूर्वक डुबकी लगाने वाले जीव को इस नश्वर संसार में दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता, उसका पुनर्जन्म का बंधन सदा के लिए कट जाता है। स्वयं भगवान श्रीहरि के श्रीमुख से प्रकट हुआ यह संपूर्ण ज्ञान ब्रह्माजी, दक्ष प्रजापति और महर्षि वेदव्यास की कड़ी से गुजरता हुआ अंततः ‘गया’ महातीर्थ के सर्वोच्च रहस्य पर जाकर विश्राम लेता है, जहाँ पिंडदान से पूर्वजों को अक्षय ब्रह्मलोक की प्राप्ति सुनिश्चित होती है।

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