अखंड सौभाग्य का पावन पर्व करवा चौथ 29 अक्टूबर को: दिखावे से परे, पति-पत्नी के आत्मिक प्रेम का प्रतीक है यह व्रत — प्रसिद्ध भागवताचार्य आचार्य नवीन चन्द्र जोशी के अनुसार बुधादित्य योग में मनेगा करक चतुर्थी महापर्व

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हल्द्वानी / धर्म डेस्क: सुहागिनों का सबसे पावन और बहुप्रतीक्षित पर्व करवा चौथ (करक चतुर्थी) इस वर्ष 29 अक्टूबर, बृहस्पतिवार को पारंपरिक श्रद्धा, निष्ठा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। प्रसिद्ध भागवताचार्य आचार्य नवीन चन्द्र जोशी ने पंचांग गणना के हवाले से बताया कि इस वर्ष करवा चौथ पर ‘बुधादित्य योग’ का विशेष संयोग बन रहा है, यद्यपि इस दौरान शुक्रास्त रहेगा। शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का यह संयोग सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए अत्यंत मंगलकारी और सौभाग्यप्रद सिद्ध होता है।

तिथि विस्तार और पूजन का शुभ मुहूर्त आचार्य नवीन चन्द्र जोशी के अनुसार, कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि का प्रारंभ बुधवार की देर रात 1:08 बजे से हो जाएगा, जो 29 अक्टूबर को रात्रि 10:11 बजे तक रहेगा। इस प्रकार व्रती महिलाओं को सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय पर्यंत संपूर्ण चतुर्थी तिथि का पावन सान्निध्य प्राप्त होगा।

  • पूजन का शुभ मुहूर्त: सायं काल 5:50 बजे से रात्रि 10:11 बजे तक रहेगा।
  • चंद्रोदय का समय: रात्रि 8:12 बजे चंद्रमा के दर्शन होंगे (विभिन्न क्षेत्रों में भौगोलिक दूरी के अनुसार चंद्रोदय रात्रि 8:05 बजे के बाद देखा जा सकेगा)।
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महाभारत काल से जुड़ी है महत्ता: श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को दिया था उपदेश करक चतुर्थी व्रत की पौराणिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए आचार्य जी ने बताया कि इसका आरंभ प्राचीन काल से माना जाता है। महाभारत काल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के संकट निवारण और अखंड सौभाग्य के लिए द्रौपदी को इस दिव्य व्रत का उपदेश दिया था। इस दिन विधि-विधान से मां भगवती ‘करक देवी’ की पूजा की जाती है, जो समस्त सौभाग्यवती महिलाओं को अखंड सुहाग, दीर्घायु और संतति सुख का वरदान प्रदान करती हैं।

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शास्त्रोक्त नियम: बाह्य और आंतरिक शुद्धि दोनों अनिवार्य आचार्य जोशी ने स्पष्ट किया कि शास्त्रों में इस व्रत के लिए बाह्य (शारीरिक) और आभ्यंतर (मानसिक व आत्मिक) दोनों नियमों के पालन का विधान है:

  • व्रती को सत्य, शौच (पवित्रता) और दया के भाव में रहकर इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए।
  • प्रातः काल अरुणोदय वेला (सूर्योदय से पूर्व) उठकर स्नान-ध्यान करें और नित्य देवार्चन पूर्ण करें।
  • सूर्योदय के पश्चात निर्जला रहकर व्रत का संकल्प लें।
  • सायं काल शुभ वेला में भगवती करक देवी की षोडशोपचार पूजा करें।
  • रात्रि में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को विधिपूर्वक अर्घ्य देकर पूजन करें और तत्पश्चात पति के कर-कमलों से प्रसाद रूपी जल ग्रहण कर व्रत का पारण (उद्यापन) करें।
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आडंबर से दूर, आत्मा के एकत्व का पर्व वर्तमान परिवेश पर विचार रखते हुए आचार्य नवीन चन्द्र जोशी ने कहा कि आधुनिक समय में इस पावन व्रत के स्वरूप में कुछ विकृतियां व औपचारिकताएं आ गई हैं। महंगे उपहारों और प्रदर्शन के कारण यह पर्व धीरे-धीरे दिखावे का रूप लेता जा रहा है, जो चिंताजनक है। वास्तव में यह व्रत किसी भौतिक उपहार का मोहताज नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अनन्य प्रेम, त्याग, निष्ठा और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि का प्रतीक है। यह पावन पर्व इस सत्य की अनुभूति कराता है कि दांपत्य जीवन में शरीर भले ही दो हों, किंतु उनकी आत्मा और हृदय सदा एक रहते हैं।

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