विशेष आलेख: रमाकान्त पन्त
भगवान श्रीहरि विष्णु के पावन अवतार भगवान हयग्रीव की विधिवत आराधना साधक को समस्त प्रकार की विद्याओं और ज्ञान से संपन्न करती है। गरुड़ पुराण के आचार काण्ड (अध्याय ३४) में स्वयं भगवान विष्णु ने देवाधिदेव महादेव (रुद्र) की जिज्ञासा शांत करते हुए हयग्रीव पूजन के गूढ़ विधान और इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन किया है। इस आराधना से जगत् के स्वामी भगवान विष्णु अत्यंत संतुष्ट होकर साधक पर अपनी पूर्ण कृपा बरसाते हैं।
करोड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान है भगवान का स्वरूप
गरुड़ पुराण के अनुसार भगवान हयग्रीव का स्वरूप अत्यंत भव्य और अलौकिक है। उनका वर्ण शंख, कुंद पुष्प, चंद्रमा, कमल की नाल के तंतु और रजत (चांदी) के सदृश श्वेत व उज्ज्वल है। वे चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं। मुकुट, कुंडल, वनमाला और पीतांबर से सुशोभित प्रभु का तेज करोड़ों सूर्यों की भांति प्रकाशित होता है।
सर्वविद्या प्रदायक मूल मंत्र और न्यास
भगवान हयग्रीव की पूजा का मूल मंत्र समस्त ज्ञान व विद्याओं का अक्षय स्रोत माना गया है:
- मूल मंत्र: ‘ॐ स्रौं क्षौं शिरसे नमः’
- अंगन्यास व करन्यास: पूजन से पूर्व ‘ॐ क्षां हृदयाय नमः’, ‘ॐ क्षीं शिरसे स्वाहा’, ‘ॐ क्षूं शिखायै वषट्’, ‘ॐ क्षैं कवचाय हुम्’, ‘ॐ क्षौं नेत्रत्रयाय वौषट्’ और ‘ॐ क्षः अस्त्राय फट्’ मंत्रों से विधिवत न्यास कर शरीर और मन को पवित्र किया जाता है।
पीठ-पूजन और नव-शक्तियों की अर्चना
पूजन के अंतर्गत स्वस्तिक अथवा सर्वतोभद्र मंडल के मध्य में भगवान अच्युत की स्थापना की जाती है। मंडल के विभिन्न भागों में धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य का पूजन होता है। इसके उपरांत कमल की पंखुड़ियों पर नव-शक्तियों—विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना तथा अनुग्रहा—का विधिवत आह्वान व पूजन किया जाता है।
षोडशोपचार और आयुध पूजा
मंडल में भगवान हयग्रीव का आह्वान कर उन्हें पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, सुंदर वस्त्र और यज्ञोपवीत समर्पित किया जाता है। इसके पश्चात:
- ऐश्वर्य और मंगल प्रदान करने वाली महादेवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
- प्रभु के दिव्य आयुधों—शंख, चक्र, गदा, पद्म, खड्ग, मूसल, पाश, अंकुश और धनुष-बाण का अर्चन होता है।
- इंद्र, अग्नि, यम सहित दसों दिशाओं के दिग्पालों और गुरु-परंपरा (ब्रह्मा, नारद, सिद्ध, गुरु और गुरु-पादुका) का नमन किया जाता है।
महास्तुति और फलश्रुति
पूजन के समापन पर गंध, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य अर्पित कर प्रदक्षिणा की जाती है तथा ‘ॐ नमो हयशिरसे विद्याध्यक्षाय वै नमः’ मंत्र से प्रभु की स्तुति की जाती है।
भगवान हयग्रीव विद्यास्वरूप, विद्याप्रदाता, शांत, असुरों व दुष्टों के संहारक और ब्रह्मा-विष्णु स्वरूप हैं। जो साधक अपने हृदय-कमल में प्रभु के इस दिव्य रूप का ध्यान धरते हुए इस पावन विधि का श्रवण, मनन या पाठ करता है, वह जीवन में सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त कर अंततः परमपद (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
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