घने जंगलों में पेड़ की गोद में बैठी ‘शेरावाली’: जानिए क्यों महायोगी के संकल्प के बाद भी यहाँ नहीं बन सका कोई मंदिर?

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घने जंगलों में पेड़ की गोद में बैठी ‘शेरावाली’: जानिए क्यों महायोगी के संकल्प के बाद भी यहाँ नहीं बन सका कोई मंदिर?

देवभूमि उत्तराखंड के आँचल में आस्था, रोमांच और अलौकिक रहस्यों से जुड़े अनगिनत तीर्थ हैं, लेकिन हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र से कुछ दूरी पर स्थित माँ सूर्या देवी का दरबार अपने आप में एक अनोखा विस्मय समेटे हुए है। यहाँ न तो कोई गगनचुंबी शिखर है और न ही सोने-चांदी से मढ़ा कोई गर्भगृह। यहाँ साक्षात् जगतजननी माँ शेरावाली सदियों पुराने एक विशाल वट वृक्ष की गोद में विराजमान हैं।

कल-कल बहती शैलजाम नदी के तट पर प्रकृति की खुली वादियों में स्थित यह शक्तिपीठ सदियों से भक्तों के आकर्षण और अगाध श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।

वह रहस्य: जब देवी ने महायोगी को भी मंदिर बनाने से रोक दिया

अक्सर भक्त अपने आराध्य के लिए भव्य से भव्य मंदिर का निर्माण करवाते हैं, लेकिन सूर्या देवी के दरबार का रहस्य बिल्कुल अलग है। मान्यता है कि भगवती यहाँ किसी चारदीवारी या छत के नीचे नहीं, बल्कि प्रकृति के खुले आँचल में ही रहना चाहती हैं।

कहा जाता है कि जब भी किसी श्रद्धालु ने यहाँ पक्का मंदिर बनाने का विचार किया, माता ने स्वप्न में आकर उसे ऐसा करने से स्पष्ट मना कर दिया। जनश्रुतियों के अनुसार, जब सुप्रसिद्ध सिद्ध संत महायोगी हैड़ाखान बाबा ने भी यहाँ भव्य मंदिर निर्माण का दृढ़ संकल्प लिया, तब स्वयं माँ सूर्या देवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर इस कार्य से रोक दिया। यही कारण है कि आज भी माता उसी प्राचीन वट वृक्ष के तने में विराजित हैं। विस्मयकारी बात यह भी है कि शैलजाम नदी का भीषण से भीषण प्रवाह भी सदियों से खड़े इस पावन वट वृक्ष का बाल भी बांका नहीं कर सका।

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पांडव कालीन इतिहास और शास्त्रों में वृक्ष-स्वरूपा देवी

इस पावन धाम की जड़ें महाभारत कालीन इतिहास से भी जुड़ी हैं। माना जाता है कि अज्ञातवास और वनवास काल के दौरान पांडवों ने इस शांत और सुरम्य घाटी में रहकर माँ सूर्या देवी की कठोर साधना की थी।

शास्त्रों और देवी भागवत में भी वृक्षों में आदिशक्ति के वास की महिमा गाई गई है:

अश्वत्थवट निम्बाम्रकपित्थ बदरीगते। पनसार्ककरीरादिक्षीर वृक्षस्वरुपिणी॥ दुग्ध वल्लीनिवासार्हे दयनीये दयाधिके। दाक्षिण्यकरुणारुपे जय सर्वज्ञवल्ल्भे॥

अर्थात् पीपल, वट, नीम, आम और कैथ जैसे वृक्षों में निवास करने वाली भगवती साक्षात् करुणा, दया और शिव-शक्ति का ही स्वरूप हैं। वट वृक्ष के मध्य विराजमान माँ सूर्या देवी को भक्तजन महामाया, मंगला, वैष्णवी और कालरात्रि के विराट स्वरूप में पूजते हैं।

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बारह महीनों की 12 अनूठी पूजा विधियाँ

मान्यता है कि सच्चे मन से इस दरबार में शीश नवाने वाले साधक कभी खाली हाथ नहीं लौटते। देवी के साधकों और जानकारों के अनुसार, साल के 12 महीनों में माँ को अलग-अलग प्रकार के विशेष नैवेद्य अर्पित करने का विधान है:

  • श्रावण: दही का भोग
  • भाद्रपद: शर्करा (खांड/शक्कर)
  • आश्विन: शुद्ध खीर
  • कार्तिक: गाय का ताजा दूध
  • मार्गशीर्ष: फेनी
  • पौष: दधि-कूर्चिका (विशेष दुग्ध प्रसाद)
  • माघ: गाय का शुद्ध देसी घी
  • फाल्गुन: श्रीफल (नारियल)
  • चैत्र: निर्मल भाव और आस्था के पुष्प-मोती
  • वैशाख: गुड़ मिश्रित प्रसाद
  • ज्येष्ठ: शुद्ध शहद
  • आषाढ़: ताजा मक्खन (नवनीत) एवं महुए का रस

कैसे पहुँचें इस अलौकिक धाम?

उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित गौलापार से पूर्व दिशा की ओर लगभग 17 किलोमीटर की यात्रा तय कर शैलजाम नदी के तट पर स्थित इस रमणीक स्थल तक पहुँचा जा सकता है। मंदिर परिसर के समीप ही रक्षक स्वरूप भगवान काल भैरव का भी पावन मंदिर स्थित है। शांत वादियों और नदी की कलकल ध्वनि के बीच माता के दर्शन मात्र से ही मन एक अलौकिक शांति से भर उठता है।

आस्था का जीवंत प्रमाण: गौलापार निवासी भक्त भरत पांडे का अटूट विश्वास

गौलापार क्षेत्र के स्थानीय निवासियों की माँ सूर्या देवी के प्रति अगाध श्रद्धा पीढ़ियों से चली आ रही है। इन्हीं आस्थावान भक्तों में एक प्रमुख नाम गौलापार निवासी भरत पांडे का है, जिनका जीवन और अनुभव माँ की अपार कृपा की जीती-जागती मिसाल है।

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भरत पांडे बताते हैं कि जब भी जीवन में कोई संकट, असमंजस या कठिन घड़ी आई, वट वृक्ष की गोद में विराजी माँ सूर्या देवी के दरबार में लगाई गई सच्ची अरदास कभी खाली नहीं गई। उनका कहना है—

“शैलजाम नदी के तट पर विराजमान माँ सूर्या देवी केवल एक पूज्य विग्रह नहीं, बल्कि समूचे गौलापार क्षेत्र की साक्षात् रक्षिका हैं। जिसने भी प्रकृति की गोद में स्थित इस पावन दरबार में निश्छल भाव से शीश नवाया, माँ ने उसकी हर विपदा हर ली और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया।”

भरत पांडे जैसे निष्ठावान भक्तों का यह अटूट विश्वास ही है जो नए श्रद्धालुओं के भीतर भी माँ के प्रति गहरी श्रद्धा जगाता है और यह साबित करता है कि सदियों बाद भी माँ सूर्या देवी का यह दरबार भक्तों के कष्ट निवारण का सबसे बड़ा संबल बना हुआ है।

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