‘गया’ तीर्थ से भी परे पाताल के गर्भ में छिपा पितृ-मुक्ति का महा-रहस्य: जब शेषनाग ने खोला ‘कपालमोचन’ का वह गुप्त भेद, जिसे जाने बिना अधूरी मानी गई पितरों की परम तृप्ति!

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‘गया’ तीर्थ से भी परे पाताल के गर्भ में छिपा पितृ-मुक्ति का महा-रहस्य: जब शेषनाग ने खोला ‘कपालमोचन’ का वह गुप्त भेद, जिसे जाने बिना अधूरी मानी गई पितरों की परम तृप्ति!

सनातन परंपरा का सबसे बड़ा अनसुलझा आध्यात्मिक रहस्य

पिथौरागढ़/ पाताल भुवनेश्वर: सनातन धर्म में पितरों की अक्षय तृप्ति, पिंडदान और मोक्ष की जब भी चर्चा होती है, तो संपूर्ण आर्यावर्त की दृष्टि फल्गु नदी के तट पर बसे सुप्रसिद्ध ‘गया’ तीर्थ की ओर मुड़ जाती है। किंतु क्या मृत्युलोक की सीमाओं से परे, पृथ्वी के अतल गर्भ में कोई ऐसा गोपनीय धाम भी विद्यमान है जिसकी दिव्यता के आगे शास्त्रों ने गया तीर्थ के पिंडदान को भी एक सीमा में बांध दिया है?

स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में महर्षि वेदव्यास और सूत जी का संवाद एक ऐसा चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन करता है, जो सामान्य कर्मकाण्डीय मान्यताओं को झकझोर कर रख देता है। पुराणों के अनुसार, सरयू और रामगंगा के मध्य दारुपर्वत की पाषाण कंदराओं में स्थित ‘पाताल भुवनेश्वर’ केवल देवी-देवताओं की तपोस्थली नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का वह परम ‘कपालमोचन’ केंद्र है जहाँ साक्षात ब्रह्मा जी का पंचम मस्तक गिरा था।

इस स्थल का रहस्योद्घाटन तब हुआ जब नागराज शेष ने सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण को पाताल लोक के गुप्त भूगोल से परिचित कराते हुए एक ऐसा शास्त्र-सत्य बताया, जिसने पितृ-मुक्ति के स्थापित विधानों में तहलका मचा दिया।

शेषनाग की वह चेतावनी: गया से भी श्रेष्ठ पाताल का ‘ब्रह्मकपाल’

पाताल के अतल अंधकार को अपनी मणियों के सूर्यवत तेज से आलोकित करने वाले सहस्रफणी शेषनाग ने राजा ऋतुपर्ण को उस कंदरा के दर्शन कराए, जिसे अनादिकाल से ‘कपालमोचन क्षेत्र’ या ‘ब्रह्मकपाल’ कहा जाता है।

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नागराज शेष ने पितृ-तर्पण की सर्वोच्च गोपनीयता खोलते हुए राजा से स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो मनुष्य इस गुप्त तीर्थ का संधान किए बिना केवल लोक-प्रथा के वशीभूत होकर कर्म करते हैं, वे मूल सत्य से वंचित रह जाते हैं:

शिरःकपालं सन्त्यज्य पाताले नृपसत्तम। मोहाद् गयायां दद्याच्छः स पितॄन् पातयेत् स्वकान्॥

(अर्थात: हे नृपश्रेष्ठ! पाताल में साक्षात उपस्थित इस मूल ‘ब्रह्मकपाल’ की अवहेलना करके जो मनुष्य अज्ञान और मोहवश केवल ‘गया’ में पिंडदान करने चला जाता है, उसके पितर परम संतुष्टि को प्राप्त नहीं होते और वह अपने पूर्वजों को पूर्ण मुक्ति से वंचित कर देता है।)

नागराज ने आगे स्पष्ट किया कि स्वयं को बड़ा ज्ञानी और पण्डित मानने वाले जो अभिमानी जन पाताल के इस कपालमोचन तीर्थ में आकर सुरभि (कामधेनु) के पावन जल से पितरों का तर्पण नहीं करते, वे घोर अंधकार और नरकगामी संताप के भागी बनते हैं। यह वचन स्पष्ट करता है कि पितृ-तर्पण की संपूर्ण श्रृंखला में पाताल का यह ब्रह्मकपाल अत्यंत गोपनीय और सर्वोच्च शिखर माना गया है।

कामधेनु का दुग्ध-अमृत और राजा ऋतुपर्ण के 101 कुलों का उद्धार

इस रहस्यमयी कंदरा की अलौकिकता केवल पत्थरों तक सीमित नहीं थी। राजा ऋतुपर्ण ने विस्मय से देखा कि इसी ब्रह्मकपाल के समीप साक्षात देवगौ सुरभि (कामधेनु) उपस्थित थीं और उनके स्तनों से अमृतमयी दुग्ध की अविरल धारा भगवान ‘वृषभेश’ के मस्तक पर निरंतर बरस रही थी। उसी धारा से निर्मित था एक हाथ चौड़ा और एक हाथ लंबा दिव्य ‘पातालोदक’ कुण्ड।

शेषनाग के निर्देशानुसार, अयोध्या नरेश ऋतुपर्ण ने सर्वप्रथम देवताओं और ऋषियों को तृप्त किया, फिर तिल, जौ और कुश हाथ में लेकर कामधेनु के उस पातालोदक से अपने पितरों का पिंडदान किया। उस गुप्त विधि से तर्पण होते ही एक अभूतपूर्व चमत्कार घटा—राजा ऋतुपर्ण के एक सौ एक कुलों (101 पीढ़ियों) के समस्त पूर्वज यम-यातनाओं के बंधन काटकर तत्काल सायुज्य मुक्ति को प्राप्त हो गए!

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राजा ने कृतज्ञता से भरकर कहा कि हे नागराज! आपके और इस गुप्त ब्रह्मकपाल के दर्शन मात्र से मेरे पितृगण करोड़ों कुलों सहित वैकुण्ठ धाम में प्रतिष्ठित हो गए हैं।

संतान के मात्र स्मरण से परलोक में नाच उठते हैं पूर्वज

स्कन्दपुराण की यह कथा एक और संवेदनशील और मार्मिक पहलू को उजागर करती है। सामान्यतः मनुष्य यह मानता है कि जब तक वह तीर्थों पर जाकर भारी कर्मकांड न करे, पितर तृप्त नहीं होते; किंतु पाताल भुवनेश्वर के संबंध में यह नियम बदल जाता है।

शास्त्रों का कथन है कि यदि भूलोक पर किसी कुल का कोई भी वंशज केवल शुद्ध हृदय से इस गुप्त तीर्थ और यहाँ विराजित महादेव का स्मरण या कीर्तन भी कर लेता है, तो उसके पूर्वज परलोक में परमानंद से झूम उठते हैं:

भुवनेशस्थले जातं स्ववंशं पश्य वै द्विजाः। क्रीडन्ति निलयं शम्भोः कैलासं प्राप्नुमो वयम्॥

(अर्थात: जब पितृगण यह देखते हैं कि उनके कुल में जन्मे किसी वंशज ने पाताल भुवनेश्वर के प्रति किंचित मात्र भी श्रद्धा रखी है या उसका भावपूर्वक नामोच्चार किया है, तो वे परलोक में आनंदमग्न होकर क्रीड़ा करने लगते हैं और आश्वस्त हो जाते हैं कि अब हमें निश्चय ही भगवान शिव का परम धाम ‘कैलास’ प्राप्त हो जाएगा!)

अष्टमी की महा-पितृयात्रा: जब यमराज स्वयं आते हैं पाताल के द्वार

पाताल भुवनेश्वर का यह कल्प-वृतांत यह भी सिद्ध करता है कि यहाँ पितृ-मुक्ति केवल एक दिन का पर्व नहीं, अपितु एक अखंड व्यवस्था है। शेषनाग के अनुसार, वर्ष की प्रत्येक तिथि पर अलग-अलग शक्तियां यहाँ आकर अपने पूर्वजों का तारण करती हैं:

  • प्रतिपदा तिथि: जाती-पुष्पों से पूजन करने पर पिता पक्ष के 100 कुल और मातामह (नाना) पक्ष के 100 कुल सीधे स्वर्गलोक को प्रस्थान करते हैं।
  • अष्टमी तिथि का महा-कौतुक: पितृ पक्ष के संदर्भ में अष्टमी तिथि का महत्व पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, जब स्वयं मृत्यु के स्वामी यमराज अपने समस्त पितृगणों को साथ लेकर पाताल भुवनेश्वर के द्वार पर उपस्थित होते हैं। इस दिन यहाँ के ब्रह्मकपाल में जो तर्पण किया जाता है, वह अकेले ही दो करोड़ कुलों (कुलकोटिद्वय) को भवसागर से पार उतार देता है!
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रहस्य की परिणति

जब तक पाताल भुवनेश्वर के इन गुप्त तीर्थों में देवाधिदेव महादेव की पूजा नहीं होती, तब तक देवगण ‘स्वाहा’ और पितृगण संतानों द्वारा अर्पित ‘स्वधा’ को पूर्ण तृप्ति के साथ ग्रहण नहीं करते।

राजा ऋतुपर्ण की यह गाथा इस अटल सत्य को स्थापित करती है कि बाह्य जगत में ‘गया’ की प्रतिष्ठा भले ही सर्वविदित हो, किंतु धरती के अतल गर्भ में सुरक्षित पाताल भुवनेश्वर का ‘कपालमोचन ब्रह्मकपाल’ वह सर्वोच्च गुप्त महातीर्थ है, जहाँ श्रद्धा का एक कण भी पितरों की कोटि-कोटि पीढ़ियों को यममार्ग से छुड़ाकर शिव-सायुज्य के परम पद पर आसीन कर देता है।

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