— विशेष खोजपूर्ण रिपोर्ट: (@ रमाकान्त पन्त @)
टिहरी गढ़वाल (उत्तराखण्ड)। तीर्थाटन, पर्यटन और विशुद्ध आध्यात्मिकता की त्रिवेणी समेटे देवभूमि उत्तराखण्ड के बीहड़ और उत्तुंग शिखरों में ऐसे कई अतीन्द्रिय रहस्य समाए हैं, जिनके सामने आधुनिक तर्कशास्त्र भी निरुत्तर हो जाता है। जनपद टिहरी गढ़वाल की चन्द्रबदनी पट्टी में समुद्रतल से करीब आठ हजार फीट की ऊँचाई पर बादलों को चीरता हुआ खड़ा चन्द्रकूट पर्वत एक ऐसे ही अलौकिक विस्मय का जीवंत साक्षी है। यह वही पाषाणी शिखर है जहाँ सती के भस्म हो जाने के बाद सम्पूर्ण ब्रह्मांड में तांडव मचाने वाले महादेव का दारुण मोह भंग हुआ था। परंतु, इसी गर्भगृह का सबसे दहलाने वाला पहलू यह है कि यहाँ विराजित देवी की मूल मूर्ति के साक्षात् दर्शन किसी भी साधारण मनुष्य के लिए सर्वथा वर्जित हैं। सदियों पुरानी मान्यता है कि जिस किसी ने भी कौतूहलवश देवी के मूल विग्रह को अपनी खुली आँखों से देखने का दुस्साहस किया, वह तत्क्षण अपनी दृष्टि खोकर अंधा हो गया!
पाताल से ब्रह्मांड तक गूंजी थी त्रिलोकीनाथ की चीत्कार — जब विरह में सुलग उठी थी पूरी सृष्टि
पौराणिक आख्यानों और ‘स्कन्दपुराण’ के केदारखण्ड (अध्याय १४१) में वर्णित गाथा के अनुसार, जब दक्ष प्रजापति के यज्ञकुण्ड में माता सती ने योगाग्नि से अपनी देह का त्याग किया, तो महादेव का हृदय विदीर्ण हो उठा। संसार के संहारक स्वयं विरह के अथाह सागर में डूब गए। वे सती के उस चन्द्रमुखी स्वरूप का स्मरण कर विरहातुर होकर पागलों की भांति विलाप करने लगे। महादेव का यह क्रंदन इतना भयानक था कि कैलाश से लेकर पाताल तक संपूर्ण चर-अचर जगत शोक की लपटों में झुलसने लगा। जब साक्षात् जगदीश ही विरहातुर होकर रो पड़े, तो समस्त ब्रह्मांड का संतुलन डगमगा गया और स्थावर-जंगम प्राणी त्राहि-त्राहि कर उठे।
स्कन्दपुराण में स्वयं भगवान कार्तिकेय ने इस पावन चन्द्रकूट पर्वत की अलौकिक महिमा उद्घाटित करते हुए कहा है—
गङ्गायाः पूर्वभागे हि चन्द्रकूटो गिरिः स्मृतः। तस्यापि दर्शनादेव मुच्यते जन्मपातकात्॥
अर्थात् गंगा के पूर्व भाग में विख्यात यह पावन चन्द्रकूट पर्वत वह स्थल है, जिसके मात्र दर्शन करने से जीव जन्म-जन्मांतर के संचित पापों से मुक्त हो जाता है। इसी शिखर के मुख्य द्वार पर आज भी साक्षात् कालभैरव रक्षक के रूप में विराजमान होकर इस दिव्य क्षेत्र की पहरेदारी कर रहे हैं।
जब देवताओं की कांपी रूह: देवगणों ने की उस महामाया की स्तवन
सृष्टि को महाविनाश की कगार पर खड़ा देख ब्रह्मा सहित समस्त देवगण, सिद्ध, गंधर्व, यक्ष और किन्नर थर्रा उठे। महादेव के इस दारुण विलाप और विकराल शोक को शांत करने का सामर्थ्य तीनों लोकों में किसी के पास न था। तब समस्त देवगणों ने हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाकर उस मूल प्रकृति जगदम्बा की गुहार लगाई, जो संपूर्ण सृष्टि का सृजन और संहार करने वाली आद्याशक्ति हैं। देवताओं ने थरथराती वाणी से उस शक्ति की स्तुति की, जिसने स्वयं अजन्मा और अविनाशी शिव को भी मोह के पाश में बाँध रखा था—
प्रकृत्यै ते नमस्तेऽस्तु भिन्नायै पुरुषात्परम्। सृष्टिकर्त्र्यै सृष्टिहर्त्र्यै देव्यै तस्यै नमो नमः॥ अनादिनिधनो देवो यया मोहं प्रवेशितः। किमुत प्राकृता देव्यै नारायण्यै नमो नमः॥
देवताओं ने करबद्ध प्रार्थना करते हुए कहा कि जिस महामाया ने ममता-रहित परमानंद स्वरूप महादेव को मुग्ध कर दिया, जिसने योगेश्वर विष्णु को भी मोह के अधीन किया, उस मूल नारायणी के सम्मुख सामान्य मनुष्य की बिसात ही क्या है। जो मृत्यु के मुख में जाते हुए प्राणी के भीतर भी जीने की तृष्णा और ममता का संचार करती है, वही पराशक्ति अब इस चराचर जगत को इस महाशोक से उबार सकती है।
त्रिनेत्री का वह अलौकिक प्राकट्य जिसने महाकाल का मोह पलभर में हर लिया
देवताओं के आर्तनाद पर चन्द्रकूट के शिखर पर अचानक एक असीम दिव्य प्रकाश का विस्फोट हुआ। सिन्दूर की आभा से युक्त लाल अंग, ललाट पर दमकते तीन दिव्य नेत्र, एक हाथ में चषक (पानपात्र) और दूसरे हाथ में कमल थामे, करोड़ों बाल-सूर्यों के समान तेज बिखेरती चन्द्रमुखी जगदम्बा भुवनेश्वरी चन्द्रवदनी साक्षात् प्रकट हो गईं। उस जगमगाते स्वरूप को देखते ही शम्भु का सारा संताप कपूर की तरह उड़ गया—
चषकं चैकहस्तेन बिभ्रती कमलं परे। पीनस्तनस्फुरद्रत्नहारावलिविराजिताम्॥ दृष्ट्वा तां चन्द्रवदनां विश्वानन्दतनूत्तराम्। मोहं तत्याज भगवान् स्वस्थश्चैवाभवत्क्षणात्॥
देवी के उस चन्द्रमुख के दर्शन पाते ही महादेव का विरह-मोह क्षणभर में विलीन हो गया और वे पुनः अपने शांत व स्वस्थ स्वरूप में लौट आए। विरह के उस भयानक ताप से मुक्त होकर महादेव ने इसी सिद्ध पीठ को अपना नित्य निवास बना लिया और यह स्थान त्रिभुवन में सर्वश्रेष्ठ शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।
आँखों पर काली पट्टी बांधकर होता है अभिषेक: एक भयानक निषिद्ध सत्य!
माँ चन्द्रवदनी के इस सिद्धपीठ का सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाला रहस्य इसका गर्भगृह है। कुमाऊँ के चम्पावत स्थित देवीधुरा की माँ वाराही देवी की तरह ही यहाँ भी देवी की मूल पाषाण मूर्ति का खुला दर्शन करना दृष्टिहीनता मोल लेने के समान माना जाता है। गर्भगृह में विद्यमान शक्ति का तेज इतना प्रचंड है कि कोई भी मानवीय नेत्र उसे सहन नहीं कर सकते।
विशेष पूजा-अर्चना और नवरात्र के पावन अवसरों पर जब माँ को दूध से स्नान कराया जाता है, तब मुख्य पुजारी अपने दोनों नेत्रों पर कपड़े की मोटी पट्टी बाँधते हैं। पूर्णतः दृष्टिहीन अवस्था में केवल स्पर्श के सहारे देवी का दुग्धाभिषेक संपन्न किया जाता है। स्थानीय जनश्रुतियों में आज भी उन दुस्साहसी लोगों के किस्से दर्ज हैं, जिन्होंने इस अलौकिक रहस्य को चुनौती देने की भूल की और अपनी आँखों की रोशनी हमेशा के लिए गँवा बैठे। कालांतर में आठवीं शताब्दी में जब आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य यहाँ पहुँचे, तो उन्होंने इस प्रचंड तांत्रिक ऊर्जा को लोक-कल्याणकारी रूप में संतुलित करने के लिए यहाँ ‘श्री यंत्र’ की स्थापना की। तब से आज तक गर्भगृह में इसी श्रीयंत्र की प्रत्यक्ष अर्चना की जाती है।
तीन रातों का रहस्य और दुर्गम चढ़ाई: जहाँ एक दिन में फलित होती है तीन वर्षों की तपस्या
स्कन्दपुराण में स्कन्द (कार्तिकेय) स्पष्ट घोषणा करते हैं कि इस पीठ की महिमा तीनों लोकों में अतुलनीय है। जहाँ अन्य तीर्थों में तीन वर्षों तक कठोर तपस्या करने पर फल मिलता है, वहीं चन्द्रवदनी के इस पावन शिखर पर केवल एक अहोरात्र (एक दिन और रात) में वही सिद्धि हस्तगत हो जाती है—
त्रिरात्रं यो महाभाग फलमूलकृताशनः। निवसेच्च जपेद्देवीं साधयेत्सिद्धिमुत्तमाम्॥ यदत्र दीयते दानं तत्सर्वं कोटिसंख्यकम्। नास्मात्परतरं पीठं त्रैलोक्ये मुनिवन्दितम्॥
यहाँ केवल फल-मूल का आहार कर तीन रात निवास करने और देवीसूक्त का पाठ करने वाले साधक को उत्तम सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है, तथा इस पीठ पर दिया गया एक तिनके का दान भी करोड़ गुना होकर फलता है।
इस रहस्यमयी शक्तिपीठ तक पहुँचना भी किसी कठिन साधना से कम नहीं है। ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित देवप्रयाग से टिहरी की ओर करीब तीस किलोमीटर आगे बढ़ने पर एक छोटा सा कस्बा आता है—’जामणीखाल’। यहीं से संकरे और घुमावदार मोड़ों से होते हुए लगभग पौने घंटे की वाहन यात्रा के बाद जुराणा गाँव पहुँचा जाता है। जुराणा से ऊपर की ओर लगभग आधा किलोमीटर की खड़ी और साँस फुला देने वाली पैदल चढ़ाई के बाद चन्द्रकूट के उस शिखर पर पहुँचा जा सकता है, जहाँ हवाओं में भी एक अनजानी सी सिहरन और दिव्य तेज का अहसास होता है। माँ चन्द्रवदनी का यह दरबार सदियों से आस्था, विस्मय और अपार दैवीय ऊर्जा का एक ऐसा संगम बना हुआ है, जिसके आगे नतमस्तक हुए बिना कोई नहीं रह पाता।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें


