दीपावली पर काली पूजा : परंपरा, आस्था, शक्ति-साधना और सांस्कृतिक विरासत

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कार्तिक की अमावस्या यानि दीपावली की रात जब देश के अनेक हिस्सों में मां लक्ष्मी की आराधना होती है, तब बिहार के कई क्षेत्रों में मां काली की पूजा विशेष धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ की जाती है। मंदिरों से लेकर सार्वजनिक पूजा पंडालों तक देवी के जयकारे गूंजते हैं। कहीं पारंपरिक विधि-विधान से पूजा होती है, तो कहीं भव्य प्रतिमाओं के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। पूजा के साथ मेले, सांस्कृतिक आयोजन, भजन-कीर्तन और विसर्जन की परंपराएं इस उत्सव को सामुदायिक जीवन का हिस्सा बनाती हैं। बिहार में काली पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकविश्वास, ऐतिहासिक स्मृति और सामाजिक एकजुटता की ऐसी परंपरा है, जिसकी जड़ें कई क्षेत्रों में काफी गहरी हैं।
बिहार की धार्मिक संस्कृति में मां काली का विशिष्ट स्थान है। शाक्त परंपरा में देवी को आदिशक्ति और सृष्टि की मूल ऊर्जा माना गया है। मां काली का स्वरूप जितना उग्र दिखाई देता है, उनके प्रति भक्तों की आस्था उतनी ही आत्मीय और भावनात्मक है। उनके हाथों में तलवार, गले में मुंडमाला और बाहर निकली जीभ का प्रतीकात्मक अर्थ बुराई, अहंकार और अन्याय के विनाश से जुड़ा है। भक्तों के लिए मां काली संकटों से रक्षा करने वाली, भय से मुक्ति देने वाली और अन्याय के विरुद्ध शक्ति प्रदान करने वाली देवी हैं। यही कारण है कि बिहार के गांवों और शहरों में उनके प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई देती है।
बिहार में काली पूजा की परंपरा को समझने के लिए भागलपुर का उल्लेख विशेष रूप से जरूरी है। भागलपुर में काली पूजा का इतिहास लगभग तीन सौ वर्षों पुराना बताया जाता है। यहां काली पूजा केवल किसी एक मंदिर या पूजा समिति का आयोजन नहीं है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। अलग-अलग मोहल्लों में स्थापित काली प्रतिमाओं की अपनी विशिष्ट पहचान और परंपरा है। वहवलपुरकाली, बुढ़िया काली, बमकाली, हड़बड़िया काली, मसानी काली, जुल्मी काली और नवयुगी काली जैसे नामों से देवी की आराधना की जाती है। इन नामों में स्थानीय इतिहास, लोकविश्वास और सामुदायिक स्मृतियां समाहित हैं।
भागलपुर की काली पूजा का आकर्षण प्रतिमा स्थापना तक सीमित नहीं रहता। दीपावली के अवसर पर पूरा शहर धार्मिक उत्सव के रंग में डूब जाता है। पूजा पंडालों की सजावट, रोशनी, प्रसाद वितरण और श्रद्धालुओं की आवाजाही से वातावरण उत्सवमय हो उठता है। कई स्थानों पर पारंपरिक पूजा पद्धतियों का पालन किया जाता है। प्रतिमाओं के दर्शन के लिए आसपास के गांवों और दूसरे जिलों से भी लोग पहुंचते हैं। विसर्जन के समय विभिन्न पूजा समितियों की भागीदारी इस आयोजन को सामूहिक उत्सव का स्वरूप देती है। भागलपुर की यह परंपरा बताती है कि धार्मिक आयोजन किस तरह किसी शहर की सामूहिक पहचान निर्मित करते हैं।
मिथिला की धार्मिक परंपरा में दरभंगा का श्यामा माई मंदिर विशेष महत्व रखता है। दरभंगा राज परिसर में स्थित यह मंदिर मां काली की आराधना का प्रमुख केंद्र है। इसका निर्माण महाराजा रामेश्वर सिंह ने कराया था। मंदिर की एक विशिष्ट बात यह है कि यह श्मशान भूमि से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बीच स्थापित है। शाक्त साधना में श्मशान का अपना आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। मां काली के इस स्वरूप में जीवन और मृत्यु, सृजन और संहार तथा भय और निर्भयता के दार्शनिक प्रश्न एक साथ दिखाई देते हैं। श्यामा माई के दर्शन के लिए वर्षभर श्रद्धालु आते हैं, लेकिन काली पूजा और नवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष भीड़ रहती है। मिथिला के लोकजीवन में इस मंदिर की गहरी प्रतिष्ठा है।
लखीसराय जिले के कजरा क्षेत्र की काली पूजा भी अपनी ऐतिहासिक परंपरा के लिए जानी जाती है। यहां वर्ष 1884 के आसपास काली पूजा की शुरुआत होने का उल्लेख मिलता है। इस आयोजन के साथ मेला लगाने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। समय के साथ पूजा का स्वरूप विस्तृत हुआ और यह आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए धार्मिक तथा सामाजिक मिलन का अवसर बन गया। मेले में पूजा के अलावा स्थानीय व्यापार, खानपान और सांस्कृतिक गतिविधियां भी दिखाई देती हैं। ऐसे आयोजन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी कुछ समय के लिए गति देते हैं। छोटे दुकानदारों, कारीगरों और स्थानीय कारोबारियों के लिए यह आजीविका का अवसर बनता है।
किशनगंज के बूढ़ी काली मंदिर की परंपरा भी उल्लेखनीय है। यहां वर्ष 1902 से काली पूजा होने की बात कही जाती है। मंदिर का धार्मिक महत्व आसपास के लोगों की आस्था से जुड़ा है। सीमांचल के इस क्षेत्र में बिहार और बंगाल की सांस्कृतिक निकटता भी दिखाई देती है। भाषा, खानपान, लोकाचार और धार्मिक परंपराओं में दोनों क्षेत्रों के बीच लंबे समय से आदान-प्रदान होता रहा है। काली पूजा की लोकप्रियता को भी इसी सांस्कृतिक संपर्क के व्यापक संदर्भ में समझा जा सकता है।
जमुई जिले के लछुआड़ क्षेत्र में स्थित काली मंदिर से जुड़ी तांत्रिक पूजा की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। यहां दीपावली की मध्यरात्रि में विशेष अनुष्ठान किए जाने की मान्यता है। बिहार के कई क्षेत्रों में मां काली की पूजा वैदिक और तांत्रिक, दोनों परंपराओं के अनुसार होती है। कहीं सामान्य श्रद्धालु फूल, माला, दीप और प्रसाद अर्पित करते हैं, तो कहीं विशेष धार्मिक विधान के तहत पूजा संपन्न होती है। इन विविधताओं के बावजूद सभी परंपराओं का केंद्र देवी के प्रति श्रद्धा और शक्ति की उपासना है।
बिहार में काली पूजा की परंपरा को बंगाल से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। दोनों प्रदेशों के बीच ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क काफी पुराना है। खासकर भागलपुर, पूर्णिया, किशनगंज और सीमांचल के दूसरे इलाकों का बंगाल के साथ व्यापारिक और सामाजिक संबंध रहा है। रेलवे के विस्तार, प्रशासनिक आवाजाही और रोजगार के कारण भी दोनों क्षेत्रों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ा। बंगाल से आए परिवारों ने कई स्थानों पर अपनी धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाया। इसके साथ ही स्थानीय समाज ने भी इन परंपराओं को अपने लोकजीवन के अनुरूप अपनाया। इस तरह काली पूजा बिहार में केवल किसी बाहरी प्रभाव का परिणाम नहीं रही, बल्कि स्थानीय संस्कृति के साथ मिलकर इसकी अपनी पहचान बनी।
बंगाल में दीपावली की अमावस्या को काली पूजा का विशेष महत्व है। कोलकाता का कालीघाट शक्तिपीठ और दक्षिणेश्वर काली मंदिर इस परंपरा के प्रमुख केंद्र हैं। बिहार के अनेक क्षेत्रों में भी इसी तिथि को मां काली की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा की जाती है। हालांकि पूजा की विधियों, प्रतिमाओं की बनावट और स्थानीय आयोजनों में क्षेत्रीय विविधता दिखाई देती है। कहीं पूजा के बाद मेला लगता है, कहीं रातभर धार्मिक अनुष्ठान होते हैं और कहीं विसर्जन का आयोजन विशेष आकर्षण बन जाता है। यह विविधता भारतीय धार्मिक संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण है।
काली पूजा में फूलों का भी अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। मां काली को लाल गुड़हल अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। लाल रंग शक्ति, ऊर्जा और देवी के उग्र स्वरूप से जोड़ा जाता है। हालांकि कमल सहित दूसरे फूल भी श्रद्धा के साथ अर्पित किए जाते हैं। कमल भारतीय धार्मिक परंपरा में पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल के कुछ मंदिरों में कमल के फूलों की मांग बढ़ने की चर्चा भी सामने आई है। इसके पीछे बेहतर उपलब्धता, कीमत और श्रद्धालुओं की पसंद जैसे कारण बताए गए हैं। बिहार में भी पूजा सामग्री का बाजार स्थानीय उपलब्धता और आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। लेकिन धार्मिक दृष्टि से किसी फूल का महत्व केवल उसकी कीमत या लोकप्रियता से निर्धारित नहीं होता। श्रद्धा का मूल आधार भक्त का भाव है।
काली पूजा का सामाजिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। छोटे शहरों और कस्बों में पूजा समितियां स्थानीय लोगों के सहयोग से आयोजन करती हैं। इसमें युवाओं की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई देती है। प्रतिमा निर्माण में मूर्तिकारों, पंडाल सजाने में कारीगरों, रोशनी में बिजली मिस्त्रियों और पूजा सामग्री की आपूर्ति में छोटे व्यापारियों की भूमिका होती है। इस तरह धार्मिक आयोजन अनेक लोगों को रोजगार और काम का अवसर भी देते हैं। कई जगह पूजा पंडालों के माध्यम से सामाजिक संदेश, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामुदायिक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। धार्मिक उत्सव समाज के अलग-अलग वर्गों को एक मंच पर लाने का माध्यम बन सकते हैं।
हालांकि बदलते समय में इन आयोजनों के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पूजा के नाम पर बढ़ता खर्च, ध्वनि प्रदूषण, प्लास्टिक और रासायनिक रंगों से पर्यावरण को होने वाला नुकसान तथा विसर्जन के दौरान जलस्रोतों की स्वच्छता जैसे सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। श्रद्धा और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए। मिट्टी की प्रतिमाओं, प्राकृतिक रंगों, सीमित ध्वनि विस्तार और स्वच्छ विसर्जन की व्यवस्था को प्रोत्साहित किया जा सकता है। स्थानीय प्रशासन और पूजा समितियों के बीच बेहतर समन्वय से धार्मिक परंपरा को पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है।
मां काली की आराधना का वास्तविक संदेश केवल अनुष्ठान और धार्मिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। उनका स्वरूप अन्याय, अहंकार, अत्याचार और अज्ञान के विनाश का प्रतीक है। ऐसे समय में जब समाज में असमानता, हिंसा, शोषण और कमजोर वर्गों की उपेक्षा जैसी समस्याएं मौजूद हैं, मां काली की पूजा हमें अपने सामाजिक दायित्वों की याद भी दिलाती है। शक्ति की आराधना का अर्थ कमजोर को दबाना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षा और सम्मान देना है। देवी की पूजा तभी सार्थक होगी, जब मनुष्य अपने व्यवहार में साहस, करुणा और न्याय के मूल्यों को स्थान देगा।
बिहार की काली पूजा की परंपरा इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि यह धार्मिक विश्वास को लोकजीवन से जोड़ती है। भागलपुर की ऐतिहासिक सार्वजनिक पूजा, दरभंगा का श्यामा माई मंदिर, कजरा का मेला, किशनगंज की बूढ़ी काली और जमुई की तांत्रिक परंपराएं इस सांस्कृतिक विविधता के अलग-अलग रूप हैं। इनके माध्यम से बिहार की धार्मिक चेतना, क्षेत्रीय इतिहास और सामुदायिक जीवन की तस्वीर सामने आती है।
आज जरूरत इस परंपरा को केवल उत्सव और भीड़ के रूप में देखने की नहीं, बल्कि इसके सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को समझने की है। परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब नई पीढ़ी उनसे जुड़ती है और समय के अनुरूप उनमें सकारात्मक बदलाव करती है। मां काली की पूजा में श्रद्धा के साथ पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सद्भाव और मानवीय गरिमा का संदेश भी शामिल होना चाहिए।
बिहार में काली पूजा आस्था, इतिहास और लोकसंस्कृति का ऐसा संगम है, जो पीढ़ियों से समाज को जोड़ता आया है। मां काली के चरणों में अर्पित गुड़हल हो या कमल, दीपों की रोशनी हो या सामूहिक आराधना, इन सबका वास्तविक अर्थ मनुष्य के भीतर शक्ति और विवेक का जागरण है। अमावस्या की रात मां काली की आराधना हमें यह विश्वास दिलाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, उसके विरुद्ध संघर्ष की शक्ति मनुष्य के भीतर मौजूद है। यही काली पूजा की परंपरा का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और मानवीय संदेश है।

(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)

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*(विभूति फीचर्स)*

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