देवभूमि का वो गुप्त और विस्मयकारी रहस्य, जहां मंदिर बनाने की कोशिश करते ही जाग उठते हैं हजारों नाग!
नैनीताल/उत्तराखंड की पावन धरा को देवभूमि कहा जाता है। यहाँ का कण-कण किसी न किसी दैवीय शक्ति की गवाही देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी देवभूमि के आंचल में एक ऐसा गुप्त और विस्मयकारी स्थान भी है, जहाँ स्वयं देवताओं के गुरु यानी देवगुरु बृहस्पति साक्षात रूप में विराजमान हैं? यह कोई साधारण मंदिर नहीं है, बल्कि समूचे ब्रह्मांड में अपने तरह का एकमात्र ऐसा दुर्लभ और चमत्कारी धाम है, जिसके रहस्य आज भी विज्ञान और इंसानी सोच से परे हैं।
नैनीताल जनपद के ओखलकांडा विकासखंड में लगभग आठ हजार फीट की ऊंचाई पर बसा यह दरबार वादियों की गोद में छिपा हुआ है। इस अलौकिक धाम को देवगुरु बृहस्पति मंदिर के नाम से जाना जाता है।
काठगोदाम से करीब 93 किलोमीटर दूर, चीड़, देवदार और बांज के घने जंगलों के बीच स्थित इस स्थान पर पहुंचते ही आत्मा को एक असीम शांति और दिव्य ऊर्जा का अहसास होता है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि इस दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता।
इस मंदिर की सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि यहाँ देवगुरु किसी भव्य गर्भगृह या सोने-चांदी की छत के नीचे नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं। इतिहास में कई बार समृद्ध भक्तों और राजाओं ने यहाँ भव्य मंदिर निर्माण की योजना बनाई, लेकिन हर बार देवगुरु की इच्छा के आगे इंसानी प्रयास बौने साबित हुए। कहा जाता है कि वर्षों पहले मंदिर के एक परम पूजनीय पुजारी स्वर्गीय केशव दत्त जी ने इस स्थान पर मंदिर को भव्य रूप देने के लिए कुछ ही दूरी पर पत्थरों की खुदाई शुरू करवाई थी। लेकिन जैसे ही पहला कुदाल चला, वहाँ हर पत्थर के नीचे से जहरीले सांपों का झुंड निकलने लगा। देखते ही देखते वे पत्थर इतने भारी हो गए कि उन्हें उठा पाना किसी के बस में नहीं रहा। तब से स्थानीय लोग समझ गए कि देवगुरु को प्रकृति की गोद में, खुले आसमान के नीचे रहना ही पसंद है।
हिमालय की इस चोटी पर स्थित देवालय में महिलाओं के प्रवेश और उनकी पूजा पर पूरी तरह से पाबंदी है। इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और मार्मिक पौराणिक कथा प्रचलित है। सतयुग के दौरान इस मंदिर की पूजा-अर्चन का दायित्व एक महिला पुजारी के हाथों में था। एक बार मौसम बहुत खराब हो गया और भयंकर आंधी-तूफान आने लगा। घबराहट और जल्दबाजी में उस महिला पुजारी ने देवगुरु को भोग लगाने के लिए बेहद खौलती हुई गर्म खीर सीधे उनकी पिंडी पर अर्पित कर दी। गर्म खीर गिरते ही वह दिव्य पिंडी फट गई। इस भूल से कुपित होकर देवगुरु ने उसी क्षण से स्त्रियों को अपने दर्शन और पूजन के अधिकार से वंचित कर दिया। तब से आज तक इस मंदिर की कमान केवल पुरुष पुजारियों के हाथ में है और महिलाएं दूर से ही देवगुरु को नमन करती हैं।
इस घटना के कई वर्षों बाद, देवगुरु ने अपने एक अनन्य भक्त पुजारी को स्वप्न में दर्शन दिए। उन्होंने आदेश दिया कि तुम तुरंत बाबा आशुतोष की नगरी हरिद्वार जाओ, वहाँ गंगा जी में स्नान कर भगवान शिव को प्रणाम करो और फिर काले रंग का कंबल ओढ़कर चुपचाप इस घने जंगल में चले आओ, ताकि तुम्हें कोई पहचान न सके। पुजारी ने ठीक वैसा ही किया। जब वे हरिद्वार से लौटकर ओखलकांडा के उस विहियावान जंगल में पहुंचे, तो देवगुरु की कृपा से उन्हें एक चमत्कारी अलौकिक पिंडी के दर्शन हुए। वह पिंडी स्वयं चलकर पुजारी के कंधे पर विराजमान हो गई और हवा में एक गूंजती हुई दिव्य वाणी सुनाई दी कि वर्षों पूर्व मेरी जो पिंडी फट गई थी, यह मेरी वही शक्ति रूपी पिंडी है। इसे यहीं स्थापित कर विधि-विधान से पूजन करो, तुम्हारा और इस संसार का कल्याण होगा।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में जब देवराज इंद्र ब्रह्महत्या के घोर पाप से घिर गए थे, तब वे अपने प्राण बचाने और पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग छोड़कर इसी क्षेत्र की गुप्त गुफाओं में आकर छिप गए थे। राजा के बिना स्वर्ग में हाहाकार मच गया। तब देवताओं के अनुरोध पर देवगुरु बृहस्पति ने पृथ्वी लोक पर आकर इंद्र को खोज निकाला और उन्हें अभयदान देकर वापस भेजा। इसके बाद इस स्थान की असीम सुंदरता को देखकर देवगुरु यहीं ध्यानमग्न हो गए। आज भी इस स्थान पर कई आधुनिक और पौराणिक संतों जैसे हैड़ाखान महाराज, सोमवारी बाबा और बर्फानी बाबा ने तपस्या की है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि कोई शांत मन से रात के समय यहाँ देवगुरु का ध्यान करे, तो पहाड़ियों से दिव्य संगीत और मंत्रों की गूंज साफ सुनाई देती है।
सनातन परंपरा में देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, बुद्धि, विवेक, भाग्य और धर्म का कारक माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवग्रहों में बृहस्पति सबसे बड़े और सबसे शुभ ग्रह यानी जुपिटर हैं। जिनकी कुंडली में गुरु बलवान होते हैं, उन्हें जीवन में उच्च पद, मान-सम्मान, धन और उत्तम संतान सुख प्राप्त होता है। विवाह में आ रही रुकावटों को दूर करने और शिक्षा के क्षेत्र में अपार सफलता के लिए भी देवगुरु की आराधना अचूक मानी जाती है। गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहनकर, पीली वस्तुओं का दान करने से गुरु ग्रह शांत होते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि अंगिरा और सुरूपा के पुत्र देवगुरु बृहस्पति के हाथों में धनुष-बाण और सोने का परशु शोभा पाता है। उन्होंने प्रभास तीर्थ में भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें देवताओं के गुरु का सर्वोच्च पद प्रदान किया था।
यदि आप भी जीवन में सुख, समृद्धि और ज्ञान चाहते हैं, तो देवगुरु के सरल और प्रभावशाली मंत्रों जैसे – ॐ ऐं श्रीं बृहस्पतये नमः, ॐ गुं गुरवे नमः, ॐ बृं बृहस्पतये नमः और ॐ क्लीं बृहस्पतये नमः का जाप कर सकते हैं। यह अद्भुत स्थान जितना अलौकिक है, यहाँ पहुंचने का मार्ग उतना ही साहसिक है। धानाचूली से ओखलकांडा और करायल होते हुए एक लंबा पैदल मार्ग तय करके यहाँ पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा ओखलकांडा से करायल-देवली होकर भी पैदल मार्ग से देवगुरु के दर्शन किए जा सकते हैं। हालांकि पर्यटन और सरकारी उपेक्षा के कारण यह मार्ग थोड़ा कठिन है, लेकिन प्रकृति प्रेमियों और अध्यात्म की खोज करने वालों के लिए यह सफर किसी वरदान से कम नहीं है।
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