सृष्टि के सबसे बड़े महामिलन का वो ओझल सच: कामदेव का अंत, देवाधिदेव का अनोखा परिणय और केदारमण्डल में छिपे ‘नामांकित शिवलिंग’ का गूढ़ रहस्य

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सृष्टि के सबसे बड़े महामिलन का वो ओझल सच: कामदेव का अंत, देवाधिदेव का अनोखा परिणय और केदारमण्डल में छिपे ‘नामांकित शिवलिंग’ का गूढ़ रहस्य

स्कन्द पुराण के मानसखंड के पवित्र और प्राचीन पृष्ठों में सृष्टि के एक ऐसे गूढ़ और रहस्यमयी घटनाक्रम का वर्णन मिलता है, जिसने चराचर जगत की नियति को हमेशा के लिए बदल दिया। यह गाथा केवल एक अलौकिक विवाह की नहीं है, बल्कि यह कहानी है एक दैवीय गुप्त संकल्प, घोर तपस्या और विधाता द्वारा रचे गए उस चक्र की जिसे समझना देवताओं के लिए भी कौतूहल का विषय रहा है।
इस महारहस्य की शुरुआत राजा जनमेजय की तीव्र जिज्ञासा से होती है, जब वे सूत जी से पूछते हैं कि माता सती ने अपने पूर्व देह का त्याग कर पुनः हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म क्यों लिया और घोर समाधि में लीन रहने वाले महादेव ने उन्हें दोबारा कैसे पहचाना? सूत जी इस रहस्य को खोलते हुए बताते हैं कि देवी सती के विरह के बाद, पर्वतराज हिमालय और माता मेनका ने देवों के तेज से युक्त संतान प्राप्ति के लिए सदियों तक कठिन तप किया था। फलस्वरूप, माता मेनका के गर्भ से एक अलौकिक दिव्य कन्या ने जन्म लिया। जब वह कन्या वन में जाकर अत्यंत कठोर तप करने लगी, तो उसकी माता ने व्याकुल होकर उसे रोका और कहा— ‘उ मा’ (पुत्री, ऐसा कठिन तप मत करो)। माता के मुख से निकले यही शब्द उस कन्या का नाम ‘उमा’ बना गए, जिन्हें आगे चलकर संसार ने गौरी, कालिका, दुर्गा और महादुर्गा के नाम से पुकारा।
इसी दौरान सृष्टि के दूसरे छोर पर एक भयानक संकट मँडरा रहा था। तारकासुर नाम के शक्तिशाली असुर ने चारों ओर तबाही मचा रखी थी और देवताओं को युद्ध में परास्त कर दिया था। तब पराजित देवगण ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे। विधाता ने देवताओं के सामने एक बड़ा रहस्य प्रकट किया कि तारकासुर का वध केवल भगवान शिव और पार्वती के संयोग से उत्पन्न पुत्र ही कर सकता है। परंतु महादेव तो संसार से विरक्त होकर गहरी समाधि में लीन थे। शिव की समाधि को भंग करने के लिए देवताओं ने कामदेव को माध्यम बनाया। कामदेव ने जैसे ही समाधिलीन शिव पर अपना प्रभाव डाला, योगेश्वर शिव ने क्रोध में अपनी तीसरी आंख खोल दी और कामदेव क्षण भर में जलकर भस्म हो गए। लेकिन देवताओं की करुण पुकार और सृष्टि कल्याण के रहस्य को जानकर, महाकाल ने अंततः अपनी समाधि का त्याग किया और आदिपुरुष के रूप में आदिमाया गौरी को अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने की सहमति दे दी।
महादेव की सहमति मिलते ही सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा स्वयं शिव के दूत बनकर हिमवान के भव्य महल पहुंचे। पर्वतराज हिमालय ने विधाता का अद्भुत स्वागत किया और उनके चरण धोकर स्वयं को धन्य माना। तब ब्रह्मा जी ने राजा हिमालय के सामने एक दिव्य सत्य उजागर किया। उन्होंने कहा कि हे गिरिराज, तुम्हारी यह पुत्री कोई साधारण कन्या नहीं है, बल्कि यह साक्षात माता सती का पुनर्जन्म है। इस त्रिलोकी में महादेव के अतिरिक्त इनके योग्य कोई दूसरा पुरुष नहीं है, इसलिए बिना किसी संशय के अपनी पुत्री का हाथ त्रिशूलधारी शिव को सौंप दो। ब्रह्मा जी के मुख से यह रहस्य सुनकर हिमालय का हृदय आनंद से सराबोर हो गया और उन्होंने सहर्ष इस विवाह के लिए अपनी स्वीकृति दे दी।
विवाह की अनुमति मिलते ही स्वयं भगवान शिव ने देव-शिल्पी विश्वकर्मा को स्मरण किया। उन्होंने विश्वकर्मा को आदेश दिया कि विवाह के लिए भव्य मंडप, दिव्य यज्ञपात्र और अलौकिक आभूषण तैयार किए जाएं। विवाह निर्विघ्न संपन्न हो, इसलिए शिव की आज्ञा से सबसे पहले भगवान गणेश की दिव्य प्रतिमा का निर्माण कर उनका विधि-विधान से पूजन किया गया। इसके बाद महाकाल का वह अद्भुत श्रृंगार हुआ जो आज तक किसी दूल्हे का नहीं हुआ था। अंगों पर पवित्र भस्म रमाए, मस्तक पर बालचंद्र सजाए, गले में सांपों की माला और मुंडमाला धारण कर, शिव अपने वाहन नंदी पर सवार हुए। उनके साथ उनके अद्भुत गण, ब्रह्मा जी, इंद्र और समस्त कोटि देवी-देवता इस अनोखी बारात का हिस्सा बनकर हिमालय के द्वार की ओर प्रस्थान कर गए। गोमती नदी के पावन तट पर इस अलौकिक बारात का आगमन हुआ। पर्वतराज हिमालय ने स्वयं आगे बढ़कर दूल्हा बने महादेव का स्वागत किया और उन्हें अर्घ्य देकर आदर सहित भीतर लाए। इसके बाद, माता पार्वती को दिव्य वस्त्रों और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित किया गया।
पर्वतराज हिमालय के आंगन में जब महादेव ने रत्नकंकणों से सुशोभित माता पार्वती का पाणिग्रहण किया, तो वह केवल दो सत्ताओं का मिलन नहीं था, बल्कि प्रकृति और पुरुष का महासंगम था। लोक-पितामह ब्रह्मा ने स्वयं अपने हाथों से विवाह के मंगल स्तंभों की स्थापना की थी। ऋषियों और वेदमूर्तियों ने जब गुप्त मंत्रों का उच्चारण शुरू किया, तो दसों दिशाएं कांप उठीं। स्वर्ग से दिव्य दुन्दुभियां बजने लगीं और आकाश से ऐसी पुष्पवृष्टि हुई जिसकी सुगंध आज भी हिमालय की वादियों में महसूस की जा सकती है। गंधर्वों के मृदंग की थाप और अप्सराओं के अलौकिक नृत्य के बीच पूरा ब्रह्मांड गौरी-शंकर के जयनाद से गूंज उठा।
विवाह की रस्में पूरी होते ही उत्सव का कोलाहल एक गहरे सन्नाटे और सर्वोच्च भक्ति में बदल गया। पर्वतराज हिमालय महादेव के सम्मुख आए और अत्यंत भावुक होकर प्रार्थना करने लगे कि हे देवदेवेश! मुझे पवित्र करें और मेरे जन्म-जन्मांतर के पापों का शमन करें। तब महादेव ने मुस्कुराते हुए उन्हें वरदान दिया कि मेरी कृपा से तुम इस संसार में सदैव पूजनीय रहोगे। इसके बाद, ब्रह्मा जी अपने ऋषियों के साथ ब्रह्मलोक लौट गए और राजा हिमाचल अपने पुत्र मैनाक के साथ भारी मन से अपनी नगरी वापस चले गए।
अब कथा में प्रवेश होता है उस सबसे बड़े रहस्य का, जो आम जनमानस से आज भी छुपा हुआ है। विदाई के बाद, जब विवाह मंडप सूना हो गया, तब महादेव ने माता पार्वती और नन्दीश्वर के साथ मिलकर वहां एक गुप्त ‘नामांकित शिवलिंग’ की स्थापना की। यह शिवलिंग आदि-दम्पति के उस पावन मिलन का अंतिम और सर्वोच्च साक्षी था। इस दिव्य लिंग को वहीं स्थापित कर महादेव, माता पार्वती और अपने गणों के साथ अचानक अंतर्ध्यान हो गए और सीधे रहस्यमयी ‘केदारमण्डल’ की ओर महाप्रयाण कर गए। वह नामांकित शिवलिंग आज भी हिमालय की किसी गुप्त कंदरा में छिपा हुआ है, जिसकी खोज केवल सिद्ध योगी ही कर सकते हैं।
केदारमण्डल पहुंचकर महादेव देवताओं के दुखों को हरने वाले और उनकी पूजा स्वीकार करने वाले परमेश्वर के रूप में स्थापित हुए। गरुड़ी और गोमती नदी के उस पावन संगम पर, जहां दुर्लभ और जादुई दिव्य औषधियां स्वतः ही धरती फाड़कर प्रकट होने लगी थीं, महादेव ‘वैद्यनाथ’ के रूप में विराजमान हुए। वहां ऋषियों ने वेदों के गुप्त सूक्तों से शिव और पार्वती के इस दिव्य स्वरूप की आराधना की। स्कन्द पुराण का यह पावन प्रसंग इसी रहस्यमयी सत्य के साथ संपन्न होता है कि जो कोई भी इस पवित्र, गोपनीय और अलौकिक शिव-पार्वती विवाह प्रसंग का श्रद्धापूर्वक संकीर्तन करता है या इसे सुनता है, उसे देवगणों के समान पूज्य स्थान मिलता है और अंततः वह महादेव के परम धाम, यानी शिवलोक को प्राप्त करता है।