नवरात्री विशेष: हिमालय की रहस्यमयी वादियों में छुपा देवभूमि का वह चमत्कारी धाम, जहाँ शीश नवाए बिना अधूरी मानी जाती है महाकाली की साधना!

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स्कंद पुराण में वर्णित पिथौरागढ़ का इकलौता अम्बिका शक्तिपीठ; जहाँ नतमस्तक होते हैं सहस्रफणी शेषनाग, जानिए सदियों से आस्था का केंद्र रहे इस अलौकिक दरबार का रहस्य…

देवभूमि उत्तराखंड की पावन कंदराएं अनादि काल से रहस्यों, तपस्या और दैवीय शक्तियों का जीवंत केंद्र रही हैं। इसी पावन धरा पर, जनपद पिथौरागढ़ की सुप्रसिद्ध गंगोलीहाट तहसील से महज 7 किलोमीटर दूर सुरम्य और शांत पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में स्थित है—कोठेरा गाँव। इसी गाँव में विराजमान है आदिशक्ति माँ अम्बिका देवी का पौराणिक दरबार, जो समूचे उत्तराखंड में अम्बिका माता का एकमात्र सिद्ध मंदिर माना जाता है।

नवरात्री के पावन अवसर पर जहाँ चारों ओर शक्ति की उपासना और भक्ति का प्रवाह बहता है, वहीं मानसखंड की गोद में बसा यह अलौकिक धाम एक ऐसा अनूठा रहस्य समेटे हुए है, जिसे जाने बिना माँ काली की पूजा-अर्चना भी पूर्ण नहीं मानी जाती।

महाकाली और माँ अम्बिका का दिव्य संबंध: पुराणों का गूढ़ विधान

शैल पर्वत वासिनी माँ हाट कालिका का नाम आते ही श्रद्धालु श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं, किंतु पुराणों में वर्णित एक गोपनीय विधान के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। स्कंद पुराण के मानसखंड के अनुसार, गंगोलीहाट स्थित माँ हाट कालिका के दर्शन व पूजन का सम्पूर्ण फल और अभीष्ट सिद्धियाँ तभी प्राप्त होती हैं, जब साधक कोठेरा स्थित माँ अम्बिका देवी के चरणों में शीश नवाता है।

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महर्षि वेदव्यास जी ने मानसखंड में स्पष्ट उल्लेख किया है कि शैल पर्वत के उत्तम प्रदेश पर जो कालिका विराजमान हैं, यह वही पराशक्ति हैं जिन्होंने ‘कौशिकी’ रूप धारण कर ‘चंड-मुंड’ का संहार किया और ‘रक्तबीज’ का रुधिर-पान कर देवताओं को अभयदान दिया था। जब शुंभ-निशुंभ के अत्याचारों से त्रस्त होकर देवता पराजित हो गए, तब इसी शैल पर्वत पर आकर उन्होंने जगदम्बा की करुण स्तुति की थी।

देवताओं के आर्तनाद से द्रवित होकर महाकाली ने जिन कल्याणकारी रूपों में अवतार लिया, उनमें से माँ अम्बिका का प्राकट्य भक्तों के उद्धार और अभय का परम केंद्र बना।

जहाँ शिव और शक्ति एकाकार हैं: अष्टभुजा रूप और पिण्डी स्वरूप

माँ अम्बिका को केवल दुर्गा का एक रूप नहीं, अपितु अखिल ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री, आदिशक्ति, महामाया और जगज्जननी के रूप में पूजा जाता है। ललिताम्बिका, अम्बा, भवानी और आद्या शक्ति के नाम से पूजित माँ के इस दरबार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ शिव और शक्ति दोनों की सम्मिलित ऊर्जा विद्यमान है।

  • अलौकिक निराकार ऊर्जा: मंदिर के गर्भगृह में माँ दिव्य ‘पिण्डी स्वरूप’ में विराजित हैं, जो सृष्टि की आदि-ऊर्जा और अनादि सत्ता का प्रतीक है।
  • भव्य साकार दर्शन: माँ का साकार विग्रह अत्यंत मनोहारी और तेजस्वी है। देवी यहाँ आठ भुजाओं (अष्टभुजा) वाली महिषासुरमर्दिनी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनके कर-कमलों में त्रिशूल, पट्टिश, पाश, मुद्गर और शक्ति जैसे नाना प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं।
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माँ का यह स्वरूप जहाँ दुष्टों, आसुरी प्रवृत्तियों और नकारात्मक शक्तियों के लिए काल के समान प्रलयंकारी है, वहीं अपने शरणागत भक्तों के लिए वात्सल्य और ममता से परिपूर्ण परम वरदायिनी है।

सहस्रफणी शेषनाग भी झुकाते हैं मस्तक

पौराणिक आख्यानों में वर्णन आता है कि माँ अम्बिका का तेज और आभामंडल इतना प्रचंड और पावन है कि पाताल के अधिपति भगवान शेषनाग भी अपने असंख्य फनों को विनीत भाव से झुकाकर देवी की वंदना करते हैं।

महर्षि वेदव्यास जी ने स्कंद पुराण (मानसखंड) में इस सिद्धपीठ की महिमा का गुणगान करते हुए कहा है:

ततोऽम्बिकां महादेवीं शैलोद्देशनिवासिनीम्। सेवितां देवराजेन चन्द्रबिम्बनिभाननाम्॥ सम्पूज्य विधिवद् विप्रा गन्धपुष्पाक्षतैः शुभैः। मानवोऽभीप्सितान् कामानवाप्नोति न संशयः॥

सरल भावार्थ:

शैल पर्वत के पावन अंचल में निवास करने वाली, देवराज इंद्र द्वारा पूजित तथा पूर्ण चंद्रमा के समान शीतल एवं दीप्तिमान मुखमंडल वाली माँ अम्बिका महादेवी का जो मनुष्य विधि-विधान से गंध, पुष्प और अक्षत से पूजन करता है, वह संसार में अपने समस्त अभीष्ट मनोरथों, सुख-समृद्धि और सिद्धियों को निःसंदेह प्राप्त कर लेता है।

ऐसी मान्यता है कि यहाँ जो भी प्राणी सच्चे मन से देवी का ध्यान कर लेता है, उसके समस्त बालग्रह, कालसर्प दोष या क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव शांत हो जाते हैं। शारीरिक-मानसिक व्याधियाँ, कलह और कलि-कल्मष क्षण भर में मिट जाते हैं।

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असीम आस्था का केंद्र, किंतु विकास की बाट जोहता तीर्थ

प्रकृति के सुरम्य आंचल में स्थित इस जागृत मंदिर का अलौकिक आभामण्डल यहाँ आने वाले हर श्रद्धालु को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। मन को अगाध शांति प्रदान करने वाला यह स्थल जितना आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध है, दुर्भाग्यवश भौतिक दृष्टि से उतना ही उपेक्षित रहा है।

पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय और गंगोलीहाट से अत्यंत समीप होने के बावजूद, पक्की सड़क और सुगम मार्ग निर्माण के अभाव में यह पावन पौराणिक तीर्थ आज भी व्यापक पहचान से दूर गुमनामी के साये में अपनी सुध लिए जाने की प्रतीक्षा कर रहा है। यदि इस पावन धाम को सुगम सड़क मार्ग से जोड़कर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो यह न केवल उत्तराखंड के मानसखंड मंदिर माला मिशन का एक प्रमुख गौरव बन सकता है, बल्कि देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था, साधना और मोक्ष का एक प्रमुख द्वार सिद्ध होगा।

आलेख / प्रस्तुति: रमाकान्त पन्त

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