आंगन, स्मृतियां और बेटियों का सृजन: मिट्टी-गोबर की दीवारों पर आज भी धड़कती है लोकपर्व ‘संजा’ की रूह

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आंगन, स्मृतियां और बेटियों का सृजन: मिट्टी-गोबर की दीवारों पर आज भी धड़कती है लोकपर्व ‘संजा’ की रूह

 

(डॉ. दीपक गोस्वामी-विभूति फीचर्स)

भाद्रपद की पूर्णिमा ढलती है और आश्विन का पितृपक्ष आरम्भ होता है, तब उत्तर और मध्य भारत के अनेक अंचलों में एक लोकदेवी बेटी बनकर लौटती है। कहीं वह संजा, कहीं सांझी, कहीं संजया, कहीं झांझी, कहीं सइया, तो कहीं भुलाबाई या गुलाबाई कहलाती है। नाम अलग हैं, पर लोकपरम्पराओं में संध्या, कन्या, सृजन और सामूहिक स्मृति का गहरा संबंध दिखाई देता है।
संजा का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि वह दिन और रात के बीच की उस बेला से जुड़ी है, जिसे हम संध्या कहते हैं। प्रकाश विदा ले रहा होता है और अंधकार धीरे-धीरे उतर रहा होता है। इसी संक्रमण को लोक ने केवल समय नहीं रहने दिया, उसे रूप, रंग, गीत और संस्कार दे दिया। इसलिए संजा की दुनिया सुबह के शोर में नहीं, गोधूलि की शांति में खिलती है।
पितृपक्ष में इसका होना भी सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत अर्थपूर्ण है। एक ओर परिवार पितरों का स्मरण करता है, दूसरी ओर किशोरियां प्रतिदिन दीवार पर आकृतियां बनाकर जीवन को समझने का अभ्यास करती हैं। मृत्यु और स्मृति के बीच सृजन का यह उत्सव लोकजीवन की अद्भुत संतुलन-बुद्धि को सामने रखता है।
कई क्षेत्रों में संजा से जुड़ी परम्परा लगभग सोलह दिनों तक चलती है। अलग-अलग क्षेत्रों में आकृतियों और क्रम में भिन्नता मिलती है, इसलिए इसे एक ही निश्चित विधि में बांधना उचित नहीं होगा। फिर भी पाचे, बिजौरा, घेवर, चौपड़, कुंवारे, छबड़ी, सातिया, अठफूल, डोकरा-डोकरी, मोर-मोरनी और किला-कोट जैसी आकृतियां इस लोककला की समृद्ध कल्पना को दर्शाती हैं। आरम्भिक आकृतियों से लेकर वृद्ध दम्पती और अंततः किला-कोट तक पहुंचना मानो जीवन के अलग-अलग पड़ावों को दृश्य रूप में समझना है।
यहीं संजा केवल सजावट नहीं रह जाती। वह लड़कियों का अनौपचारिक लोक-विद्यालय बन जाती है।जहाँ हाथ मिट्टी और गोबर से आकृति बनाते हैं, आंखें अनुपात और सौंदर्य पहचानती हैं, और मन परिवार, समाज तथा जीवन के रिश्तों को समझता है। यह किसी पाठ्यपुस्तक का पाठ नहीं था, फिर भी इसमें सीखने की पूरी प्रक्रिया छिपी थी।
इस लोककला की सामग्री भी अपने समय की जीवन-दृष्टि कहती है। गोबर से लीपी दीवार, मिट्टी, स्थानीय फूल, पत्तियां और प्राकृतिक रंग,इन सबका उपयोग आसपास उपलब्ध वस्तुओं से होता था। गोबर का पारंपरिक लेपन स्वच्छता और कीट-नियंत्रण से भी जुड़ा रहा है, हालांकि इसे आधुनिक अर्थों में हर परिस्थिति का वैज्ञानिक कीटाणुनाशक मानना उचित नहीं होगा। असली बात यह है कि लोकजीवन ने प्रकृति से उपलब्ध सामग्री को कचरे में बदलने के बजाय सृजन में बदलना सीखा था।
संजा के श्रृंगार में गेंदा, गुलबास, गुड़हल और अन्य स्थानीय फूलों का प्रयोग अनेक क्षेत्रों में मिलता है। बाजार से खरीदी वस्तुओं पर निर्भर हुए बिना आसपास की प्रकृति से सौंदर्य रचना,आज की भाषा में कहें तो यह स्थानीय संसाधनों पर आधारित, कम अपशिष्ट वाली कला थी।
कौआ भी संजा की लोककल्पना का महत्वपूर्ण पात्र है। अनेक परम्पराओं में किला-कोट के साथ कौए का चित्र बनाया जाता है और प्रातः उसे हटा दिया जाता है। इससे जुड़ी लोककथाएं अलग-अलग रूपों में सुनाई जाती हैं। कथा चाहे जो हो, इसमें लोक ने प्रकृति, संबंध और मर्यादा को एक साथ जोड़ दिया। कौआ यहां केवल पक्षी नहीं, कथा का जीवंत पात्र बन जाता है। बुंदेलखंड और आसपास के अंचलों में मामुलिया जैसी परम्पराएं भी मिलती हैं, जिसमें कांटेदार टहनी को सजाकर एक पात्र का रूप दिया जाता है। कहीं उसे भाई के रूप में देखा जाता है। हरियाणा और अन्य क्षेत्रों में भी संजा से जुड़े अलग-अलग पात्र और स्थानीय कथाएं मिलती हैं।

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*संजा के गीत*

ये गीत केवल पूजा के गीत नहीं थे। वे स्त्रियों और किशोरियों की सामूहिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी थे। मायके की याद, भाई की प्रतीक्षा, ससुराल का अनुभव, भोजन, रिश्ते, शिकायत, हास्य और मन की पीड़ा,बहुत कुछ गीतों में उतर आता था। जो बात सीधे कहना कठिन होती, वह लोकगीत में सहज हो जाती थी।
इस अर्थ में संजा की शाम एक तरह का सामुदायिक संवाद थी। दस-पन्द्रह लड़कियां साथ बैठतीं, दीप जलता, गीत उठता और एक का दुख दूसरी का भी दुख बन जाता। दादी सुनती, नानी सुधारती, मां सिखाती और बेटी याद करती। किसी पुस्तकालय की आवश्यकता नहीं, स्मृति ही पुस्तक और पीढ़ियां उसकी पाठशाला।
लेकिन समय बदल गया,कच्चे घरों की जगह पक्के मकान आए। बड़े आंगनों की जगह छोटे कमरों और अपार्टमेंटों ने ले ली। गोबर से लीपने वाली दीवारें कम हुईं। सहेलियों के सामूहिक जमावड़े की जगह मोबाइल की निजी स्क्रीन ने ले ली। पहले गीत कंठस्थ होते थे, अब बहुत-सी लोकपरम्पराएं डिजिटल सामग्री में खोजी जाती हैं। पहले हाथ से आकृति बनती थी, अब बाजार में तैयार चित्र उपलब्ध हैं।
संजा के सामने सबसे बड़ी चुनौती आधुनिकता नहीं, विस्मृति है। आधुनिक जीवन में कन्या के विवाह और भविष्य को लेकर उसकी अपनी आकांक्षाएं पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसलिए संजा को केवल सुयोग्य वर की कामना तक सीमित करके देखना आज की पीढ़ी को उससे दूर कर सकता है। इसके मूल में छिपे सृजन, सामूहिकता, प्रकृति-संबंध और संस्कार के भाव को नए अर्थ देने की आवश्यकता है।
इसे बचाने के लिए हमें अतीत की हूबहू नकल करने की आवश्यकता नहीं। गोबर की दीवार उपलब्ध न हो तो मिट्टी के पटिए पर बनाइए। मिट्टी न मिले तो कागज पर बनाइए लेकिन अपने हाथ से बनाइए। गीत मोबाइल से चलाने के बजाय मिलकर गाइए। विद्यालयों में इसे लोककला के रूप में सिखाइए। मोहल्लों में संजा कार्यशालाएं आयोजित कीजिए। घर की दादी और नानी अपनी पोतियों को केवल गीत का शब्द नहीं, उसके पीछे छिपी कहानी भी सुनाएं,क्योंकि लोकसंस्कृति संग्रहालय में बंद रखने की वस्तु नहीं, बहती हुई नदी है। नदी का घाट बदल सकता है, नाम बदल सकता है, किनारे बदल सकते हैं लेकिन जल तभी जीवित रहता है जब वह बहता रहे।
संजा, सांझी, झांझी, भुलाबाई, गुलाबाई ये उसी लोकनदी के अलग-अलग घाट हैं। इनके नाम भले बदलें, पर इनके भीतर छिपा भाव एक ही है,साथ बैठना, मिलकर रचना, प्रकृति से जुड़ना, गीत में मन कहना और आने वाली पीढ़ी को अपनी स्मृति सौंपना। गोबर की उस छोटी-सी दीवार पर बनी आकृति इसलिए इतनी बड़ी है कि उसमें एक पूरे समाज की स्मृति समाई हुई है।
संजा को बचाना केवल एक लोकपर्व को बचाना नहीं है, यह उस आंगन को बचाना है जहाँ पीढ़ियां एक-दूसरे से मिलती थीं। यही लोकधर्म की जीवित धड़कन है। यही हमारी सामाजिक पूंजी है। और शायद बाजार के बढ़ते अकेलेपन के बीच यही वह छोटी-सी सांझ है, जो हमें फिर से मनुष्य होने का अर्थ याद दिला सकती है। *(विभूति फीचर्स)*

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