सृष्टि के इतिहास में एक ऐसा भू-भाग भी है, जहाँ पहुँचते ही यमराज के कठोर दंड-विधान शिथिल पड़ जाते हैं। एक ऐसा रहस्यमय परिक्षेत्र, जहाँ न अकाल मृत्यु के शिकार भटके हुए प्रेतों की चीत्कार टिकती है और न ही नरक के द्वार खुलते हैं। प्रश्न उठता है कि मगध अंचल (प्राचीन कीकट देश) में फैले मात्र पाँच कोस के दायरे में ऐसा क्या गूढ़ रहस्य छिपा है, जिसने इसे संपूर्ण त्रैलोक्य का सबसे बड़ा मुक्ति-द्वार बना दिया?
गरुड़ पुराण के पृष्ठों में दर्ज यह प्रसंग किसी अलौकिक विस्मय से कम नहीं है। यह गाथा है एक अजेय असुर की हिला देने वाली तपस्या, देवताओं के संत्रास, एक शाप और अंततः उस अमर वरदान की, जो युगों से मृत आत्माओं का एकमात्र सहारा बना हुआ है।
जब काँप उठी अमरावती: गयासुर की तपस्या और श्रीहरि का चक्रव्यूह
प्राचीन काल में ‘गय’ नामक परम बलशाली असुर ने ऐसी दारुण तपस्या की, जिससे समस्त देवलोक संतप्त हो उठा। देवताओं के संकट निवारण हेतु भगवान श्रीहरि ने एक गुप्त लीला रची। जब गयासुर शिवजी की अर्चना हेतु क्षीरसागर से कमल लाकर कीकट देश में विश्राम करने लगा, तब श्रीहरि ने अपनी गदा के प्रहार से उसका महादेह धराशायी कर दिया।
किंतु यह अंत नहीं, एक दिव्य मर्यादा की स्थापना थी। स्वयं भगवान विष्णु मोक्षदाता ‘गदाधर’ के रूप में उसकी विशुद्ध देह पर स्थिर हो गए। गयासुर के विशाल शरीर पर ब्रह्मा, शिव, प्रपितामह और जनार्दन साक्षात विराजमान हुए और वचनबद्ध हुए कि यह देह साधारण भूमि नहीं, बल्कि पावन ‘पुण्यक्षेत्र’ कहलाएगी, जहाँ किया गया श्राद्ध मनुष्य को सीधे स्वर्ग और ब्रह्मलोक का अधिकारी बनाएगा।
इस मुक्ति की महत्ता को रेखांकित करते हुए गरुड़ पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है:
ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा। वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥ (अर्थात्—ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति, गया में श्राद्ध, गोशाला में मृत्यु और कुरुक्षेत्र में निवास—ये चारों ही मुक्ति प्रदान करने वाले चार सर्वोपरि साधन हैं।)
लोभ का दंश और पत्थरों में सिमटी अमृतमयी नदी
गयासुर की देह पर महायज्ञ संपन्न कराने हेतु पितामह ब्रह्मा ने पाँच कोस के परिक्षेत्र में अमृततुल्य ‘रसवती’ नदी, कूप, सरोवर और कामधेनु की सृष्टि कर उसे ऋत्विक ब्राह्मणों को दान में दे दिया। किंतु दान ग्रहण करते समय ब्राह्मणों के मन में लोभ उत्पन्न हो गया।
परिणामस्वरूप उन्हें शाप मिला कि उनकी विद्या और संचित धन केवल तीन पीढ़ियों तक ही स्थिर रहेगा और वह दिव्य रसवती नदी केवल जल व पत्थरों के रूप में प्रवाहित होगी। जब संतप्त ब्राह्मणों ने क्षमा-याचना की, तब ब्रह्माजी ने अनुग्रह करते हुए वरदान दिया कि यहाँ जिन पितरों का श्राद्ध संपन्न होगा, वे परम ब्रह्मलोक को प्राप्त करेंगे।
‘पाँच कोस’ का कण-कण तीर्थ: प्रेतशिला से अक्षयवट तक का विस्मय
गरुड़ पुराण के अनुसार, संपूर्ण भूमंडल पर ऐसा कोई अन्य स्थान नहीं है, जिसका प्रत्येक इंच स्वयं तीर्थ न हो। पाँच कोस में विस्तृत गयाक्षेत्र, एक कोस का गयाशिर और ढाई कोस में फैला मुण्डपृष्ठ—यहाँ की रज पितरों को शाश्वत तृप्ति प्रदान करती है। मान्यता है कि संसार के समस्त तीर्थ, नदियाँ और सरोवर प्रतिदिन कम से कम एक बार फल्गु तीर्थ में स्वयं स्नान करने आते हैं।
यहाँ के प्रमुख स्थानों का महात्म्य अत्यंत गूढ़ है:
- ब्रह्मयोनि तीर्थ: संयमित मन से इस तीर्थ को पार करने वाला मनुष्य पुन: गर्भ-यातना (पुनर्जन्म के दारुण चक्र) में नहीं पड़ता।
- प्रेतशिला: सर्पदंश, विष, शस्त्र अथवा बिना संस्कारों के अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए जीव भी यहाँ श्राद्ध कर्म से प्रेत-योनि के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
- अक्षयवट और गयाकूप: अक्षयवट की पावन छाया में किया गया श्राद्ध पितरों को अक्षय तृप्ति प्रदान करता है। वहीं गयाकूप में किसी भी वंशज के नाम से अर्पित एक पिण्ड उसे शाश्वत ब्रह्मगति दिला देता है।
परलोक में उत्सव: जब कुलदीपक बढ़ाता है गयाजी की ओर कदम
पितृपक्ष में गयाजी की महत्ता केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इहलोक और परलोक के मध्य जुड़ा अत्यंत भावुक सेतु है। नरक के भय से त्रस्त पूर्वज केवल इसी लालसा में पुत्र-प्राप्ति की कामना करते हैं कि कभी उनका वंशज गयाजी की भूमि पर चरण रखेगा।
गरुड़ पुराण उस मार्मिक क्षण का सजीव चित्रण करता है:
गयाप्राप्तं सुतं दृष्ट्वा पितॄणामुत्सवो भवेत्। पद्भ्यामपि जलं स्पृष्ट्वा अस्मभ्यं किल दास्यति॥ (अर्थात्—पुत्र को गया तीर्थ में पहुँचा देखकर परलोक में पितरों के बीच उत्सव मनने लगता है कि अब वह अपने पैरों से भी इस पावन तीर्थ के जल का स्पर्श करके हमें तृप्ति प्रदान करेगा।)
यहाँ तक कि त्रिलोक-प्रसिद्ध वैतरणी नदी स्वयं पितरों के उद्धार हेतु गयाक्षेत्र में अवतरित हुई है, जहाँ गोदान और पिण्डदान करने से इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।
स्वयं के लिए भी पिण्डदान का दुर्लभ विधान
इस पावन तीर्थ की सबसे विशिष्ट बात यह है कि यहाँ मनुष्य न केवल अपने पितरों, बंधु-बांधवों और मित्रों के निमित्त तर्पण कर सकता है, बल्कि जीवित रहते हुए स्वयं अपने मोक्ष के लिए भी तिल-रहित पिण्डदान भगवान जनार्दन के चरणों में समर्पित कर सकता है।
संक्षेप में कहें तो, गयाजी केवल भौगोलिक भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि मृत्यु और मोक्ष के संधि-स्थल पर खींची गई वह अलौकिक रेखा है, जहाँ श्रद्धा का एक कण भी जीवात्मा को अनंत काल के लिए भवसागर से पार उतार देता है।
विशेष आध्यात्मिक पड़ताल | रमाकान्त पन्त
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