गरुड़ पुराण का अनसुलझा रहस्य: मृत्यु के ग्रंथ में क्यों छिपा था भगवती ‘त्रिपुरा सुन्दरी’ की इस गुप्त साधना का विधान?

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गरुड़ पुराण का अनसुलझा रहस्य: मृत्यु के ग्रंथ में क्यों छिपा था भगवती ‘त्रिपुरा सुन्दरी’ की इस गुप्त साधना का विधान? अष्ट भैरव, सदाशिव का ‘महाप्रेत आसन’ और एक लाख मंत्रों का वह चमत्कारी चक्र, जो साधक को दिलाता है दुर्लभ सिद्धियां

— विशेष रिपोर्ट: रमाकान्त पन्त

धर्म एवं संस्कृति डेस्क। सनातन परंपरा में ‘गरुड़ पुराण’ का नाम आते ही सामान्य जनमानस के जेहन में परलोक गमन, यम यातनाओं और श्राद्ध-तर्पण की विभीषिकाएं कौंधने लगती हैं। पीढ़ियों से इसे केवल मृत्यु उपरांत पढ़ा जाने वाला ग्रंथ मानकर घरों में सहजता से रखने से भी बचा जाता रहा। किंतु क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि जिस ग्रंथ को मृत्यु का प्रतीक माना गया, उसी के गर्भ में जीवन की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली पराशक्ति भगवती ‘त्रिपुरा सुन्दरी’ की परम गोपनीय और रहस्यमयी साधना का विधान आखिर क्यों और कैसे दर्ज है?

गरुड़ पुराण के ‘आचार काण्ड’ (अध्याय २४ से २६) के पन्नों से बाहर आया यह गुप्त अंश न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि तांत्रिक और वैदिक जगत के कई अबूझ रहस्यों से पर्दा भी उठाता है।

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सूत जी का वह गोपनीय संवाद, जो अब तक ओझल रहा

प्राचीन आख्यानों के अनुसार, नैमिषारण्य में जब शौनकादि ऋषियों ने परम सिद्धि का मार्ग पूछा, तब महर्षि सूत जी ने एक ऐसे विधान का रहस्योद्घाटन किया जो केवल चुने हुए साधकों तक ही सीमित था। सूत जी के अनुसार, विघ्नहर्ता गणेश और सर्व-अभीष्ट प्रदायिनी भगवती त्रिपुरा सुन्दरी की यह संयुक्त उपासना सामान्य पूजा-पद्धति से सर्वथा भिन्न और अत्यंत शक्तिशाली है।

इस रहस्यमयी प्रक्रिया की शुरुआत साधक की अपनी देह को दिव्य कवच में बांधने से होती है। भगवान गणेश के विशिष्ट बीजमंत्रों— ‘ॐ गां हृदयाय नमः’ से लेकर ‘ॐ गः अस्त्राय फट्’ तक के षडंग न्यास से शरीर की ऊर्जा को केंद्रित किया जाता है, जिसके बाद गुरु और जगदंबा की पादुकाओं का वंदन कर साधना के अभेद्य द्वार खोले जाते हैं।

सदाशिव का ‘महाप्रेत आसन’ और नौ प्रचंड शक्तियों का पहरा

ग्रंथ के इस हिस्से में वर्णित साधना किसी रहस्य-रोमांच से कम नहीं है। साधक को साधारण स्थान पर नहीं, बल्कि चेतना के उच्चतम और रहस्यमयी तल का प्रतीक माने जाने वाले ‘ॐ सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः’ का उच्चारण करते हुए ध्यान साधना में प्रवृत्त होना पड़ता है।

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इसके तुरंत बाद ‘ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि’ मंत्र के साथ नौ ऐसी उग्र और रक्षक शक्तियों की चौकसी तैयार होती है, जिनके नाम मात्र से नकारात्मक शक्तियां थर्रा उठती हैं— रुद्रचण्डा, प्रचण्डदुर्गा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, चण्डिका और साक्षात दुर्गा। वज्र और खड्ग जैसी गुप्त तांत्रिक मुद्राओं का प्रदर्शन करते हुए अग्निकोण में आहुतियां और अर्चन समर्पित किए जाते हैं।

अष्ट भैरवों की घेराबंदी और एक लाख मंत्रों का महासंकल्प

इस साधना का सबसे रोमांचक पहलू तब सामने आता है, जब पूजा-पटल पर आठ प्रमुख मातृकाओं (ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और चण्डिका) के साथ-साथ काल और दिशाओं के रक्षक ‘अष्ट भैरवों’ का आवाहन किया जाता है।

असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार भैरव की उपस्थिति साधक के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा चक्र खींच देती है, जिसे भेद पाना असंभव माना जाता है। साथ ही कामदेव, रति, प्रीति, बटुक और क्षेत्रपाल की पूजा से संपूर्ण वातावरण अलौकिक स्पंदन से भर उठता है।

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विधान के अंतिम चरण में साधक पद्मगर्भ-मण्डल अथवा त्रिकोणपीठ पर श्वेतवर्णा, अक्षमाला और पुस्तकधारिणी ज्ञान की देवी सरस्वती का ध्यान धरता है। इसके बाद गूंजता है महामंत्र—

‘ॐ ऐं क्लीं सौं त्रिपुरायै नमः’

पुराण की स्पष्ट घोषणा है कि इस दिव्य त्रिपुर-मंत्र का जब एक लाख की संख्या में विधिवत जप और दशांश हवन पूर्ण होता है, तब भगवती त्रिपुरा सुन्दरी साधक के समस्त मनोरथ सिद्ध कर उसे साक्षात सिद्धिदात्री के रूप में दर्शन देती हैं।

एक नया दृष्टिकोण: मृत्यु का ग्रंथ या सिद्धि का महाविज्ञान?

गरुड़ पुराण का यह पृष्ठ न केवल इस महापुराण के प्रति सदियों से बनी एकांगी धारणा को तोड़ता है, बल्कि यह भी प्रमाणित करता है कि यह अमर ग्रंथ केवल ‘देह के अंत’ का विवरण नहीं है, बल्कि जीवन रहते भगवती ‘त्रिपुरा सुन्दरी’ की असीम कृपा से प्रकृति की परा-शक्तियों को वश में करने का एक गूढ़ विज्ञान भी है।

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