नरोत्तम का गढ़, मोहन की प्रतिष्ठा: 3 अगस्त को दतिया से उठेगा किस सियासी तूफ़ान का पर्दा?
दतिया मध्य प्रदेश का ऐसा शहर है जिसकी पहचान राजनीति से नहीं बल्कि आस्था से होती है। मां पीतांबरा पीठ के कारण यह नगर देशभर में प्रसिद्ध है। वर्षों से यह मान्यता रही है कि यहां आने वाला श्रद्धालु शक्ति और सिद्धि की कामना लेकर आता है। देश के अनेक राजनेता, उद्योगपति, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियां समय-समय पर मां पीतांबरा के दर्शन के लिए पहुंचती रही हैं। इन दिनों यही दतिया विधानसभा उपचुनाव के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस उपचुनाव ने प्रदेश की राजनीति को नई दिशा देने वाला माहौल तैयार कर दिया है। चुनावी परिणाम से अधिक चर्चा इस बात की है कि यह मुकाबला मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के राजनीतिक नेतृत्व की परीक्षा बन गया है। यहां पर 30 जुलाई को मतदान हुआ और अब मतगणना 3 अगस्त को होना है।
दतिया विधानसभा सीट लंबे समय तक भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की पहचान रही है। संगठन में उनकी स्वीकार्यता, प्रशासनिक अनुभव और क्षेत्र में मजबूत जनाधार ने उन्हें भाजपा के प्रभावशाली नेताओं की पहली पंक्ति में स्थापित किया। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में उनकी पराजय ने प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव पैदा किया। उसी चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर कई नाम चर्चा में आए थे। नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल के साथ नरोत्तम मिश्रा का नाम भी राजनीतिक गलियारों में सम्मान के साथ लिया जाता था। यदि वे चुनाव जीत जाते तो मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं में उनका उल्लेख और अधिक मजबूती से होता। उस वक़्त परिस्थितियां बदलीं और पार्टी नेतृत्व ने डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंप दी।
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया। कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में स्थान मिला। नरेंद्र सिंह तोमर को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। इस व्यवस्था ने भाजपा के भीतर संतुलन का संदेश दिया। दतिया उपचुनाव ने इस संतुलन को फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पार्टी ने इस बार नरोत्तम मिश्रा को उम्मीदवार नहीं बनाया और आशुतोष तिवारी पर विश्वास जताया। इस निर्णय के साथ चुनाव का पूरा दायित्व मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर आ गया। स्वाभाविक रूप से इस चुनाव का परिणाम मुख्यमंत्री की राजनीतिक क्षमता के आकलन का आधार भी बनेगा।
दतिया में भाजपा के चुनाव अभियान की सक्रियता सामान्य उपचुनाव जैसी दिखाई नहीं दी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह तथा क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल लगातार क्षेत्र में डटे रहे। संगठन का लगभग पूरा तंत्र चुनाव संचालन में जुटाया गया। मुख्यमंत्री स्वयं भी लगातार सभाएं, रोड शो और जनसंपर्क कर रहते रहे। वे अलग अलग समाज की बैठकों में भी गए। इस स्तर की सक्रियता यह संकेत देती है कि भाजपा इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर आगे बढ़ रही है। चुनाव प्रचार की रणनीति से स्पष्ट है कि पार्टी कोई जोखिम लेने के पक्ष में नहीं है।
डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनावों का रिकॉर्ड भी इस चुनाव को महत्वपूर्ण बनाता है। पहला उपचुनाव अमरवाड़ा में हुआ। यह उपचुनाव कांग्रेस विधायक कमलेश शाह के भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के कारण हुआ। कमलेश शाह ने उपचुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ा। उस चुनाव में भाजपा को सफलता मिली। इसे मुख्यमंत्री मोहन यादव की पहली बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना गया। इस जीत का प्रभाव छिंदवाड़ा की राजनीति पर भी दिखाई दिया, जहां लंबे समय से कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का प्रभाव माना जाता रहा है।
इसके बाद परिस्थितियां बदलीं। लोकसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान के सांसद बनने के बाद बुधनी विधानसभा सीट रिक्त हुई। इसी अवधि में कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत भाजपा में शामिल हुए, उन्हें मोहन यादव मंत्रिमंडल में वन मंत्री भी बनाया गया । रावत के पाला बदलने से विजयपुर सीट पर उपचुनाव की स्थिति बनी। नवंबर 2024 में दोनों सीटों पर मतदान हुआ। परिणामों ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। बुधनी जैसी मजबूत भाजपा सीट पर जीत का अंतर अपेक्षा से काफी कम रहा। वर्ष 2023 में जिस सीट पर शिवराज सिंह चौहान एक लाख से अधिक मतों के अंतर से विजयी हुए थे, उसी सीट पर भाजपा उम्मीदवार रमाकांत भार्गव मात्र तेरह हजार मतों के अंतर से जीत दर्ज कर सके। विजयपुर में भाजपा उम्मीदवार और रामनिवास रावत मंत्री रहते पराजित हो गए। इन दोनों परिणामों ने यह संदेश दिया कि उपचुनावों में सत्ताधारी दल की मजबूत रहने वाली स्थिति कमजोर पड़ गई।
इन्हीं घटनाओं का प्रभाव आगे भी दिखाई दिया। कांग्रेस से निर्वाचित बीना विधायक निर्मला सप्रे ने लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री के मंच को साझा किया था। राजनीतिक चर्चाओं में उनके भाजपा में शामिल होने की संभावना व्यक्त की गई। विजयपुर के अनुभव के बाद ऐसी संभावनाएं आगे नहीं बढ़ सकीं। इस उदाहरण ने भी यह स्पष्ट किया कि उपचुनावों की राजनीति अनेक बार सामान्य राजनीतिक गणित से अलग दिशा में चलती है।
अब दतिया मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यकाल का चौथा बड़ा उपचुनाव है। इसी कारण राजनीतिक पर्यवेक्षक इस चुनाव को सामान्य निर्वाचन की दृष्टि से नहीं देख रहे। इस चुनाव में मुख्यमंत्री के नेतृत्व, संगठन की क्षमता और सरकार की लोकप्रियता तीनों का परीक्षण एक साथ हो रहा है। यदि भाजपा विजय प्राप्त करती है तो मुख्यमंत्री के नेतृत्व को नई मजबूती मिलेगी। दूसरी स्थिति में विपक्ष को सरकार पर राजनीतिक आक्रमण का अवसर प्राप्त होगा। यही कारण है कि दतिया का चुनाव प्रदेश की सीमाओं से बाहर भी चर्चा का विषय बन गया है।
कांग्रेस भी इस चुनाव को पूरी गंभीरता से लड़ा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार तथा पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे। कांग्रेस ने इस चुनाव को सरकार के विरुद्ध जनमत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। दूसरी ओर भाजपा ने विकास कार्यों, संगठन की ताकत और मुख्यमंत्री की सक्रियता को प्रमुख आधार बनाकर मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश की। दोनों दलों के बीच सीधे मुकाबले ने इस चुनाव को और रोचक बना दिया।
यहां पर मतदान 71 प्रतिशत हुआ, एसआईआर के बाद मतदान का यह प्रतिशत बहुत अच्छा नहीं माना जा सकता, मतलब लगभग 29 प्रतिशत लोगों ने वोट डालने से परहेज किया।
दतिया का सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप भी इस चुनाव को विशेष बनाता है। यहां स्थानीय समीकरण, परंपरागत राजनीतिक संबंध, जातीय संतुलन, संगठन की सक्रियता तथा उम्मीदवार की व्यक्तिगत स्वीकार्यता सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उपचुनावों में मतदान प्रतिशत, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय असंतोष अनेक बार परिणामों की दिशा बदल देते हैं। यही कारण है कि भाजपा ने चुनाव अभियान में कोई कमी नहीं छोड़ी है।
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि भाजपा ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है। नरोत्तम मिश्रा जैसे वरिष्ठ नेता को टिकट न देकर पार्टी ने नए चेहरे को नेतृत्व का अवसर देने का निर्णय लिया। अब इस निर्णय की सफलता अथवा असफलता का मूल्यांकन भी दतिया के परिणाम से ही होगा। आशुतोष तिवारी की जीत संगठन के निर्णय पर मुहर माने जाने की संभावना रखती है। दूसरी स्थिति में टिकट चयन को लेकर नए राजनीतिक प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
पीतांबरा माई की नगरी में हो रहा यह उपचुनाव इसलिए भी विशेष है क्योंकि यहां आस्था और राजनीति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। चुनाव प्रचार के बीच लगभग सभी प्रमुख नेता मां पीतांबरा के दरबार में मत्था टेकते दिखाई दिए। चुनावी रणनीति और धार्मिक आस्था का यह मेल दतिया की विशेष पहचान रहा है। इस बार भी वही परंपरा कायम है।
दतिया का उपचुनाव अब केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व, भाजपा संगठन की चुनावी क्षमता तथा विपक्ष की राजनीतिक चुनौती का व्यापक परीक्षण बन चुका है। चुनाव परिणाम जिस पक्ष में जाएगा, उसके राजनीतिक प्रभाव दूर तक महसूस किए जाएंगे। यही कारण है कि पूरे प्रदेश की निगाहें इस समय पीतांबरा माई के धाम दतिया पर टिकी हुई हैं, जहां मतदाताओं का निर्णय आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
*(विनायक फीचर्स)*
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