नाग पंचमी विशेष रहस्यमयी नागलोक की वह पावन गुफा जहाँ नागकन्याओं के सम्मुख प्रकट हुआ शिव का तेजोमय स्वरूप: जानिए गोपीश्वर महादेव का विस्मृत महातीर्थ

ख़बर शेयर करें

देवभूमि उत्तराखण्ड केवल अपनी नैसर्गिक सुरम्यता के लिए ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व में अपनी गूढ़ आध्यात्मिक चेतना के लिए विख्यात है। यहाँ के गिरि-शिखरों और सघन वनों में विचरण करते हुए जिस अलौकिक अनुभूति का साक्षात्कार होता है, वह अंतर्मन को एक असीम शांति से भर देता है। पर्यटन के साथ-साथ तीर्थाटन की दृष्टि से भी यह धरा युगों-युगों से पुण्यदायिनी रही है। विकास की दृष्टि से शासन-प्रशासन का सहयोग कब और कैसे धरातल पर उतरेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है, परंतु यह नितांत सत्य है कि यदि उपेक्षा और गुमनामी के अंधकार में छिपे ऐसे प्राचीन देवस्थान प्रकाश में लाए जाएं, तो वे श्रद्धा, संस्कृति और आस्था के विराट केंद्र बन सकते हैं। ऐसा ही एक परम पावन और अद्भुत महिमामयी क्षेत्र है गोपीश्वर महादेव, जिसका महात्म्य माँ भद्रकाली की पावन गाथा के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
जनपद बागेश्वर के अंतर्गत कांडा क्षेत्र में प्रतिष्ठित गोपीश्वर महादेव का मंदिर सनातन काल से पूजनीय रहा है। स्थानीय श्रद्धालुओं के हृदय में इस विग्रह के प्रति अटूट विश्वास विद्यमान है। स्कंद पुराण के केदारखण्ड में इस पावन धाम की महिमा का गुणगान करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि देवाधिदेव गोपीश्वर के केवल स्मरण और दर्शन मात्र से मनुष्यों के समस्त पाप विलीन हो जाते हैं:
पातका विप्रलीयन्ते गोपीश।दर्शनात् किमु भो विप्रा : पूजनात् कथयाम्यहम्(59)केदारखण्ड़ अध्याय80)
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, इसी तपोभूमि पर गोपियों ने आशुतोष भगवान शंकर की घोर तपस्या करके उत्तम परम गति प्राप्त की थी। गोपियों की इस पावन साधना के कारण ही यह तीर्थ गोपीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस क्षेत्र से प्रवाहित होने वाली पुण्यसलिला भद्रा नदी और माँ भद्रकाली का सान्निध्य इस स्थान की गरिमा को अनंत गुना बढ़ा देता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि भद्रा नदी के पावन जल में स्नान कर माँ भद्रकाली का दर्शन करने के उपरांत, उनके बाईं ओर विराजित गोपीश्वर महादेव का जो साधक श्रद्धापूर्वक पूजन करता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। इसी तीर्थ के चरण पखारती हुई सरस्वती नदी भी आगे चलकर भद्रा में विलीन हो जाती है:
यस्य वामे महादेवो गोपीश:पूज्यते द्विजाः ।निमज्य मुनिशादूर्ला भद्रातोये प्रयन्नतः।।,,,,,पूज्य गोपेश्वरं देवं प्रयाति परमं पदम्।
महर्षि वेदव्यास जी ने गोपीश्वर की महिमा का बखान करते हुए बताया है कि यहाँ भगवान शिव की अर्चना करने से साधक के पितरों तथा मातृ-कुल के पूर्वजों द्वारा जाने-अनजाने किए गए समस्त पाप प्रभावहीन होकर नष्ट हो जाते हैं। शिव साधना के लिए यह भू-भाग धरा पर सर्वश्रेष्ठ और शिवलोक का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना गया है। हिमालय की सुरम्य गोद में बसा यह अंचल पूर्वकाल में गोपीवन नाम से विख्यात था। नागगिरी पर्वत की उपत्यकाओं में बसे इस मंदिर में भगवान शिव साक्षात जाग्रत रूप में विद्यमान हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु यहाँ अपने भाव-पुष्प अर्पित करता है, वह संसार के समस्त भयों से मुक्त होकर आनंद और परम पद को प्राप्त करता है। इस दुर्लभ धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ वर्णसंकर दोष का पूर्ण निवारण हो जाता है। पुराण यहाँ तक कहते हैं कि पापी मनुष्यों के पाप केवल गोपीश्वर मंडल की सीमा में प्रवेश करने से पहले तक ही ठहरते हैं, सीमा में आते ही पूर्वजों तक के पाप धुल जाते हैं। यहाँ महादेव की अर्चना करने से संपूर्ण पृथ्वी की इक्कीस बार परिक्रमा करने के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
गोपीश्वर नाथ की इस अलौकिक महिमा के रहस्य को उजागर करते हुए स्कंद पुराण में महर्षि व्यास बताते हैं कि सतयुग के प्रारंभ में जब ब्रह्मा जी ने संपूर्ण पृथ्वी को विभिन्न लोकों और क्षेत्रों में विभक्त किया तथा देवता, दानव, गंधर्व, अप्सरा, विद्याधर और पशु-पक्षियों के लिए स्थान नियत किए, तब नागों के निवास के लिए हिमालय की इस शांत उपत्यका को चुना गया, जिसे नागपुर क्षेत्र कहा गया।
इसी नागपुर क्षेत्र में नाग समुदाय ने परम आदर के साथ माता कामधेनु की अनन्य सेवा की। नागों की निष्काम सेवा से प्रसन्न होकर सुरभि कामधेनु ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। नागों ने बड़ी विनम्रता से निवेदन किया कि उन्हें अपने गो-कुल के समान ही असंख्य गायें प्रदान की जाएं। कामधेनु के वरदान से प्राप्त उन अगणित गायों के चरने के लिए नागों ने इस पावन गोपीवन का निर्माण किया। इन गायों की सेवा, रक्षा और चराने का दायित्व नागराज मूलनारायण की कन्या सहित अन्य नागकन्याओं को सौंपा गया।
ये नागकन्याएं गोपीवन में गोचारण के साथ-साथ निरंतर भगवान शिव के ध्यान और जप में लीन रहती थीं। एक दिन भोलेनाथ की अलौकिक लीला से उन्हें पर्वत की तलहटी में एक अत्यंत रहस्यमयी गुफा के दर्शन हुए, जिसके सम्मुख पावन सरस्वती गंगा प्रवाहित हो रही थी। वर्तमान में यह गुफा सानिउडियार के नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ प्राचीन काल में महर्षि शांडिल्य ने कठोर तपस्या कर महादेव को संतुष्ट किया था। गुफा के कौतुक और शिवभक्ति से प्रेरित होकर नागकन्याओं ने उसमें प्रवेश करने का प्रयास किया, किंतु वे आगे न बढ़ सकीं।
निराश होकर नागकन्याओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि यदि उनकी भक्ति सच्ची और निष्कलंक है, तो वे इस गुफा को पार कर प्रभु के दर्शन पाएं। प्रभु का नाम लेकर वे गुफा के पार तो पहुंच गईं, परंतु बाहर आते ही उनकी दृष्टि से सारी गायें ओझल हो चुकी थीं। व्याकुल होकर गायों की खोज में वे घने वनों में भटकने लगीं। भटकते-भटकते जब वे एक दूसरे सघन गोचर वन में पहुँचीं, तो वहाँ हरी-भरी दूब के बीच उन्हें अपनी गायें चरती हुई दिखाई दीं।
तभी उन गायों के झुंड के मध्य नागकन्याओं ने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने उनकी सुध-बुध हर ली। गायों के बीचों-बीच भगवान शिव का एक अत्यंत तेजोमय, ज्योतिर्मय अलौकिक लिंग विग्रह प्रतिष्ठित था, जिसकी दिव्य आभा से संपूर्ण चराचर जगत आलोकित हो रहा था। उस ज्योतिर्लिंग के तेज के समक्ष आकाश में चमकते मध्याह्न सूर्य का प्रकाश भी फीका प्रतीत हो रहा था।
साक्षात शिव के इस तेजोमय स्वरूप को देखकर वे नागकन्याएं, जो गोपियों के रूप में विख्यात थीं, भाव-विभोर होकर प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो गईं और उन्होंने हाथ जोड़कर देवाधिदेव की यह अमर स्तुति गान की:
नमो हरायामितभूषणाय चितासमिदभस्मविलेपनाय।बृषध्वजाय सुवृषप्रभाय शिवाय शान्ताय नमो नमस्ते।।नमो विरूपाय कलाधराय षडर्धनेत्राय परावराय।ऋषिस्तुतायापरिसेविताय नमो नमस्ते बृषवाहनाय।।
अर्थात् अगणित दिव्य आभूषणों से सुशोभित, चिता-भस्म को अंगराग के रूप में धारण करने वाले, धर्म रूपी वृषभ की ध्वजा वाले, मयूर-सी कांति वाले परम शांत स्वरूप शिव को हम बारंबार प्रणाम करते हैं। विलक्षण रूपधारी, चंद्रकला को मस्तक पर सजाने वाले, त्रिनेत्रधारी, परात्पर, महर्षियों द्वारा वंदित और वृषभ की सवारी करने वाले कल्याणकारी शंकर को हमारा कोटि-कोटि नमन है।
नागकन्याओं की इस अनन्य और निष्कपट स्तुति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए, मनोवांछित वरदान प्रदान किया और अंतर्ध्यान हो गए। प्रभु के वरदान के प्रभाव से वे गोपियां अपनी गायों सहित शिव-तेज में समाहित होकर परम गति को प्राप्त हुईं। तभी से यह पावन धरा संसार में गोपीश्वर के नाम से अमर हो गई।
वर्तमान में जनपद बागेश्वर के कांडा तहसील से कुछ ही दूरी पर स्थित ग्राम सिमकौना के इस पावन स्थल को स्थानीय जन मणगोपेश्वर के नाम से भी पुकारते हैं। यहाँ रावल कुल के पुरोहित परंपरागत रूप से मंदिर की पूजा-अर्चना संपन्न कराते हैं।
उत्तराखण्ड राज्य में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन की असीम संभावनाएं विद्यमान हैं। स्थानीय लोक-कलाओं, पौराणिक आख्यानों और सांस्कृतिक धरोहरों के संवर्धन में ऐसे तीर्थ स्थलों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। यह संपूर्ण क्षेत्र ऋषि-मुनियों की तपोस्थली और प्रतापी ग्राम देवताओं का जागृत वास स्थल रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि गुमनामी के अंधकार में सिमटे ऐसे दिव्य, ऐतिहासिक और प्राकृतिक धामों को प्रकाश में लाया जाए, जिससे देश-दुनिया के साधक और श्रद्धालु इस आध्यात्मिक ऊर्जा का लाभ उठाकर अपनी चेतना को समृद्ध कर सकें।
@ रमाकान्त पन्त

ADVERTISEMENTS
यह भी पढ़ें 👉  शेर नाले की दहाड़ पर लगा विराम: जानिए मुख्यमंत्री धामी ने चोरगलिया की जनता को क्या दिया खास तोहफा?
Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad