श्राद्ध के सन्नाटे में कच्ची दीवारों पर किसका पहरा? तर्पण के उन 16 दिनों में गोबर, माटी और बेटियों के उस तिलिस्म का सच!
विशेष सांस्कृतिक रपट: @ रमाकान्त पन्त @
भाद्रपद की पूर्णिमा ढलते ही जब समूचा परिवेश पितरों के तर्पण की गहरी, मौन गंभीरता में डूब जाता है और शास्त्रों के अनुसार हर मांगलिक व उत्सवधर्मी कार्य पर रोक लग जाती है, ठीक उसी पहर आँगनों की कच्ची दीवारों पर एक गुप्त हलचल आकार लेने लगती है। शाम के धुंधलके में जब परिंदे अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं, कच्चे आँगनों से ताजे गोबर की सौंधी महक, गेंदे के चटख रंगों और लोकगीतों की धीमी, रहस्यमयी गूंज उठने लगती है।
चारों तरफ पूर्वजों के स्मरण का वैराग्य और उसी चौखट पर कुंआरी कन्याओं द्वारा रचा जाता यह रूप-रंग! आखिर क्या रहस्य है कि जिस पक्ष में हर मांगलिक उत्सव वर्जित है, उसी पखवाड़े में बेटियां दीवारों पर एक अनदेखे संसार की नींव रखती हैं? यह केवल एक लोककला नहीं, बल्कि पीढ़ियों के सीने में दबी स्मृतियों, जीवन-मृत्यु के गूढ़ दर्शन और बेटियों की जीवंत चेतना का वह गुप्त दस्तावेज़ है, जिसे सदियों से लोक में ‘संजा’ कहा गया है।
तर्पण के सन्नाटे में यह सृजन क्यों? पितृपक्ष का सबसे बड़ा दार्शनिक विरोधाभास
सबसे गहरा सवाल यही है कि संजा के लिए पितृपक्ष के 16 दिन ही क्यों चुने गए? सनातन लोक-मानस का यह चुनाव कोई संयोग नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के संतुलन का सबसे बड़ा रहस्य है:
- अतीत और भविष्य का सेतु: पितृपक्ष जहां हमारे ‘अतीत’ यानी पूर्वजों को समर्पित है, वहीं घर की कुंआरी कन्याएं कुल का ‘भविष्य’ होती हैं। जब घर के बुजुर्ग जल और तर्पण से अपनी जड़ों (पितरों) को सींच रहे होते हैं, ठीक उसी समय घर की बेटियां दीवार पर आकृतियां उकेरकर कुल की आने वाली शाखाओं और जीवन की निरंतरता का स्वागत करती हैं।
- समानांतर आगमन की लोक-मान्यता: लोककथाओं में माना गया है कि जिस तरह 16 दिनों के लिए पितर अपनी संतानों के पास आते हैं, ठीक उसी तरह ‘संजा बाई’ (पार्वती का लोक-स्वरूप) भी वर्ष में एक बार इन्हीं 16 दिनों के लिए ससुराल से अपने मायके आती हैं। बेटियां उन्हें अपनी सहेली और बड़ी बहन मानकर उनका आदर-सत्कार करती हैं।
- सन्नाटे के बीच जीवन का स्पंदन: पितृपक्ष का माहौल आमतौर पर गंभीर और शांत रहता है। बेटियों का यह गायन, गोबर-माटी का लेपन और फूलों का खिलना उस भारी सन्नाटे के बीच जीवन की धड़कन बनकर गूंजता है, जो यह याद दिलाता है कि पूर्वजों के विदा होने के बाद भी जीवन का उल्लास थमा नहीं है।
आँगनों की गुप्त संहिता: 16 दिनों में खुलने वाली पहेली
संजा की शुरुआत किसी अबूझ पहेली की तरह होती है। पहले दिन दीवार पर गोबर की एक सीधी लकीर और आसन रूपी ‘पाटला’ उभरता है। बाहर से देखने वाले के लिए यह महज एक आकृति हो सकती है, लेकिन लोक के जानकारों के लिए यह एक अलौकिक यात्रा का प्रस्थान बिंदु है।
हर ढलती शाम के साथ दीवार पर एक नया तिलिस्म जुड़ता जाता है—
- कभी रहस्यमयी चौपड़ के चार कोने,
- कभी नक्षत्रों की तरह चमकते सितारे और अष्टदल कमल,
- तो कभी मौन खड़े हाथी-घोड़ों का लश्कर।
यह किसी तांत्रिक रेखाचित्र से कम नहीं दिखता, जिसे सिर्फ घर की कुंआरी बेटियां ही पढ़ और समझ सकती हैं। वे किसी पोथी को नहीं बांचतीं, बल्कि उनके कंठ से फूटने वाले धीमी लय के लोकगीत उस अंधियारे में किसी प्राचीन मंत्र की तरह गूंजते हैं। इन गीतों में केवल देवी की स्तुति नहीं होती; इसमें मायके के छूटने की आशंका, ससुराल की अनजानी देहरी का खौफ और एक स्त्री के अंतर्मन का वह रहस्य छिपा होता है, जिसे समाज की निगाहें कभी पढ़ नहीं पाईं।
स्मृतियों का कोलाज और बेटियों का अनाम सृजन
संजा वास्तव में बेटियों की उस अंतर्मुखी दुनिया का आईना है, जहाँ वे अपने सपनों को माटी और गोबर के सहारे दीवार पर उकेरती हैं। दिनभर बाड़ों और खेतों से चुनकर लाए गए गेंदे, कनेर और गुलदाउदी के फूल इस बात के गवाह बनते हैं कि बेटियां प्रकृति से अपना दर्द बाँटना जानती हैं।
जिस दौर में बेटियों को खुलकर बोलने की बंदिशें थीं, उस दौर में संजा उनकी अभिव्यक्ति की सबसे मजबूत ढाल बनी। दीवार पर बनती हर आकृति में उनकी अपनी स्मृतियां धड़कती हैं—दादी-नानी से सुनी लोरियां, माँ के आँचल की छाँव और भाई के साथ बिताए वे बेफिक्र दिन, जो विवाह के मंडप तक पहुँचते ही इतिहास बन जाने वाले हैं। संजा उसी अनिश्चित भविष्य के खिलाफ बेटियों का एक मासूम, लेकिन सशक्त कलात्मक विद्रोह है।
‘किला-कोट’ की वह आखिरी रात और रहस्यमयी विसर्जन
इस पूरे 16 दिनी तिलिस्म की पराकाष्ठा होती है सर्वपितृ अमावस्या की घोर अंधियारी रात को। उस रात दीवारों पर उभरता है एक अकल्पनीय साम्राज्य—‘किला-कोट’।
चारों तरफ बुर्ज, मजबूत परकोटे, सुरक्षा में खड़े दरबान और केंद्र में पालकी पर बैठी ‘संजा बाई’। चकाचौंध करने वाली चमकीली पन्नियों और सिंदूर के छींटों के बीच यह किला दीवार पर ऐसे चमकता है मानो अंधेरे को चीरकर कोई प्राचीन रियासत बाहर आ गई हो।
लेकिन रहस्य यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि यहाँ से गहराता है। जिस किले को रचने में बेटियों ने अपनी 16 रातों की साधना और कल्पना झोंक दी, भोर का उजाला फूटते ही उसे किसी साक्ष्य की तरह समेट लिया जाता है। अमावस्या के ठीक अगले दिन उसे दीवार से ससम्मान उतारकर बहते जल या पवित्र वृक्ष की जड़ों में विसर्जित कर दिया जाता है।
यह दृश्य आधुनिक समझ को चौंका देता है—इतने श्रम और सौंदर्य का क्षणभर में त्याग! दरअसल, यह उसी शाश्वत सत्य की मूक गवाही है, जो पितृपक्ष हमें सिखाता है: संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। जिस तरह पितर विदा होते हैं, और जिस तरह एक दिन बेटियों को भी अपना आँगन छोड़कर विदा होना पड़ता है, संजा भी उसी वैराग्य और विदाई का लोक-प्रतीक बनकर जल में समा जाती है।
कंक्रीट की दीवारों के बीच माटी की अंतिम पुकार
आज जब मिट्टी के घर तेजी से ढह रहे हैं और पुट्टी-पेंट से पुती पक्की दीवारें इंसानी संवेदनाओं को सोख रही हैं, तब यह सवाल और विकराल हो जाता है—क्या संजा की यह धड़कन हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी?
संजा केवल गोबर-माटी का लेप नहीं, बल्कि हमारे लोक-जीवन की वह रूह है जो याद दिलाती है कि सबसे गहरे दार्शनिक सच पोथियों में नहीं, बल्कि आँगनों की माटी, बेटियों की उँगलियों और श्राद्ध के सन्नाटे में खिलने वाले गेंदे के फूलों में सांस लेते हैं।
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