सात सौ जैन मुनियों की रक्षा का भी पर्व है रक्षाबंधन

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रक्षाबंधन यानी रक्षा का संकल्प। एक धागा जिसे बहनें भाई की कलाई पर बांधती हैं। इसका अर्थ है कि भाई उसकी सुरक्षा करेगा। पर राखी का यह धागा सिर्फ बहन-भाई तक सीमित नहीं है। पिता-पुत्र, भाई-भाई, चाचा-भतीजा तक राखी बांध सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सभी स्वयंसेवक एक-दूसरे को रक्षा सूत्र बांधकर राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेते हैं। इस रूप में राखी समाज की एकता का प्रतीक बन जाती है। हिंदू धर्म में रक्षाबंधन की कई कथाएं हैं, पर जैन धर्म में यह पर्व सात सौ मुनियों की रक्षा के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। रोचक बात यह है कि वैदिक और जैन दोनों परम्पराओं में मुख्य पात्र राजा बलि और बौने ब्राह्मण वामन ही हैं, पर कथाएं अलग हैं।
कथा के अनुसार उज्जैन के राजा श्री वर्मा के दरबार में बलि, नमुचि, बृहस्पति और प्रहलाद चार मंत्री थे, जो जैन विरोधी थे। एक बार आचार्य अकम्पनाचार्य अपने सात सौ शिष्यों के साथ उज्जैन के बाहर बगीचे में ठहरे। उन्होंने ध्यान से जान लिया कि मंत्री विरोधी हैं, इसलिए शिष्यों को मौन व्रत और ध्यान का आदेश दिया।
उस समय श्रुतकीर्ति मुनि आहार के लिए नगर गए थे, इसलिए उन्हें आदेश नहीं मिला। जब राजा दर्शन को आए तो सभी मुनि ध्यान में लीन थे। उन्होंने राजा से बात नहीं की। इस पर मंत्रियों ने राजा को भड़काया, पर राजा विचलित नहीं हुए। लौटते समय मंत्रियों ने श्रुतकीर्ति मुनि को देखकर अपशब्द कहे। मुनि ने उन्हें शास्त्रार्थ के लिए ललकारा और चारों मंत्री हार गए। अपमान से उन्होंने बैर बांध लिया। रात में वे तलवार लेकर मुनियों को मारने पहुंचे। जैसे ही तलवार उठाई, वनरक्षक देवता ने उन्हें कील दिया और वे मूर्ति बन गए। सुबह राजा को पता चला तो उन्होंने दंड देना चाहा, पर मुनियों ने क्षमा करने को कहा। राजा ने उन्हें गधे पर बैठाकर, मुंह काला कर नगर में घुमाया और देश निकाला दे दिया।
देश निकाला के बाद चारों मंत्री हस्तिनापुर पहुंचे। वहां के राजा पद्मराय जैन धर्म के अनुयायी थे। उनके छोटे भाई विष्णु कुमार संन्यास लेकर मुनि विष्णु कुमार बन चुके थे। चारों ने चतुराई से राजा को प्रसन्न कर मंत्री पद ले लिया और उनके शत्रु राजा सिंहबल को बंदी बना लिया। प्रसन्न होकर राजा ने बलि से वरदान मांगने को कहा, पर बलि ने कहा बाद में मांगेगा। कुछ समय बाद आचार्य अकम्पनाचार्य सात सौ मुनियों के साथ हस्तिनापुर के वन में आए। बलि घबरा गया कि कहीं उज्जैन की घटना राजा को पता न चल जाए। उसने राजा से अपना वचन याद दिलाकर सात दिन के लिए पूरा राज्य मांग लिया। राजा बनते ही उसने षड्यंत्र रचा। वन में ठहरे मुनियों के चारों ओर कांटेदार लकड़ियां लगाकर आग लगा दी और मुनियों की बलि के लिए ‘नरमेध’ यज्ञ शुरू किया। धुएं से मुनियों पर घोर उपसर्ग हुआ। मुनियों ने संकल्प लिया कि उपसर्ग टलने पर ही आहार लेंगे।
उसी समय मिथिलापुर के वन में आचार्य सारचंद ने आकाश में श्रवण तारे को कांपते देखा। अवधि ज्ञान से उन्होंने जाना कि मुनियों पर उपसर्ग हो रहा है। उन्होंने आकाशगामी पुष्पदंत मुनि को धारिणी सुभूषण पर्वत पर तप कर रहे मुनि विष्णु कुमार के पास भेजा। विष्णु कुमार को विक्रिया ऋद्धि प्राप्त थी, यानी शरीर को छोटा-बड़ा करने की शक्ति। पुष्पदंत ने सारा वृत्तांत सुनाया। विष्णु कुमार को अपनी सिद्धि का पता नहीं था। उन्होंने भुजा फैलाई जो समुद्र तक पहुंच गई। वे तुरंत हस्तिनापुर आए। सारी बात जानकर वे पांच अंगुल के बौने ब्राह्मण का वेष बनाकर वहां पहुंचे जहां बलि दान दे रहा था। बलि ने कहा- मांगिए क्या चाहिए। ब्राह्मण बोले- मुझे केवल तीन पग धरती दीजिए। बलि ने संकल्प ले लिया।
तब मुनि ने विराट रूप धारण किया। पहला पग सुमेरु पर्वत पर रखा, दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर। तीसरे के लिए जगह नहीं बची तो बलि से बोले- तीसरा पग कहां रखूं? बलि बोला- मेरी पीठ पर रख लीजिए। मुनि ने तीसरा पग पीठ पर रखा। बलि कांपने लगा, देवताओं के आसन डोलने लगे। सभी देव वहां आ गए और क्षमा मांगने लगे। मुनि ने कहा- पहले यज्ञ बंद करो और सात सौ मुनियों की रक्षा करो। बलि ने यज्ञ समाप्त किया, क्षमा मांगी और इंद्र ने वर्षा कर आग बुझा दी। यज्ञ के धुएं से मुनियों के गले की नसें फट गई थीं। श्रावकों ने आकर उनकी सेवा की, उनके नेत्र-मुख धोए। गले की पीड़ा के कारण वे कठोर आहार नहीं ले सकते थे, इसलिए उनके लिए नरम आहार के रूप में दूध-पाक और सिंवैयां बनाई गईं। तभी से रक्षाबंधन पर सिवैयां, घेवर और फेनी बनाने की परंपरा शुरू हुई।
उसी दिन सभी मुनियों ने मुनि विष्णु कुमार को रक्षा सूत्र बांधा। वह दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा था। श्रावकों ने एक-दूसरे को कलावा बांधकर परस्पर रक्षा का संकल्प लिया। तभी से इसे सलूनो या रक्षाबंधन कहा जाने लगा। आचार्य ने दया को धर्म का मूल बताकर मंत्रियों को क्षमा कर दिया, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर लिया।

 

(इंजी.अतिवीर जैन ‘पराग’-विभूति फीचर्स)

*(विभूति फीचर्स)*

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