देवभूमि उत्तराखंड के जनपद बागेश्वर में काण्डा के समीप बेरीनाग मार्ग पर स्थित धपोला सेरा और कमस्यार घाटी का संपूर्ण क्षेत्र प्रकृति की एक ऐसी सम्मोहक चित्रशाला है, जिसे देखकर कोई भी पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाए। हरी-भरी ढलानों पर बिछे सीढ़ीदार खेत (सेरे), हुनुम के सघन और सुरम्य जंगलों की छाँव तथा कुळूर नदी के तट पर बहती मंद-शीतल समीर इस समूचे भूभाग को असीम शांति प्रदान करती है। भद्रावती नदी की कलकल करती धारा जब इस घाटी को सींचती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं किसी दिव्य उत्सव की तैयारी में लगी हो।
परंतु, धपोला सेरा और काण्डा का यह आकर्षण केवल आँखों को लुभाने वाले प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। इस शांत और पावन धरा के आँचल में युगों-युगों पुराना एक ऐसा रहस्यमयी इतिहास समाया हुआ है, जिसका वर्णन स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में मिलता है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र का संबंध नागलोक, नागकन्याओं और गुप्त साधना-स्थलों से रहा है।
स्कन्दपुराण के एकासीवें अध्याय में ऋषियों ने जब महर्षि व्यास से इस पावन भूमि की सीमा और इसके गुप्त तीर्थों के विषय में पूछा, तो व्यास जी ने गोपीवन और नागपुर के गूढ़ रहस्यों का अनावरण किया। महर्षि व्यास कहते हैं:
गोपीवनप्रमाणं च शृण्वन्तु मुनिसत्तमाः।
लिङ्गानां चापि माहात्म्यं मयैतत् समुदाहृतम्॥
व्यास जी बताते हैं कि इस पवित्र नागपुर पर्वत पर फेनिल नामक नागराज का पूजन करने से मनुष्य के जीवन में धन-धान्य और समृद्धि की वृद्धि होती है। इस नागपुर क्षेत्र से लेकर भद्रपुर तक का संपूर्ण विस्तार गोपीवन नाम से विख्यात है, जहाँ देव, गंधर्व और नागगण निवास करते हैं। भद्रावती के दाहिने पार्श्व में स्थित भद्रपुर की स्थापना कालीय नाग के पुत्र भद्रनाग ने अपने निवास के लिए की थी, जहाँ आज भी भद्रनाग की पूजा करने वाले व्यक्ति को जीवन में कभी भी सर्प-भय का सामना नहीं करना पड़ता।
काण्डा से लगभग दो मील दूर कमस्यार क्षेत्र में बेरीनाग मार्ग के समीप सान्योड्घार नामक स्थान पर पाषाणों की ओट में एक अत्यंत प्राचीन और गूढ़ गुफा स्थित है। लगभग 500 गज लंबी इस अंधकारमयी गुफा की दीवारों पर प्राचीन काल के अद्भुत चित्र, मनुष्यों और सर्पों की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। इस कंदरा के भीतर ऊपर से नीचे जाने वाले संकरे मार्ग पर एक दिव्य शिवलिङ्ग और शक्तिपीठ विद्यमान हैं। पुराणों में इसे भद्रावती कंदरा कहा गया है, जहाँ नागकन्याएँ और नागराज स्वयं भगवती भद्रावती की आराधना करते हैं:
भद्रावती नामा कन्दरायां माहेश्वरी।
पूज्यते नागकन्याभिर्नागैश्चान्यैस्तथैव च॥
इस पावन तीर्थ का माहात्म्य बताते हुए शास्त्र कहते हैं कि जो भी मनुष्य सुभद्रा और भद्रावती नदी के पवित्र जल में डुबकी लगाकर माँ भद्रावती देवी का पूजन करता है, वह संसार के समस्त बंधनों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है:
सुभद्रासरितस्तोये निमज्ज्य मुनिसत्तमाः।
देवीं भद्रावतीं पूज्य नरो याति परां गतिम्॥
इस पावन भूमि की महिमा यहीं समाप्त नहीं होती। भद्रावती नदी के तट पर गोपीश्वर महादेव के पादतल से गुप्त रूप से प्रवाहित होने वाली सरस्वती नदी का संगम होता है। इस संगम तट पर रुद्रतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, नागतीर्थ और कनखल जैसे परम सिद्ध क्षेत्र स्थित हैं। मान्यता है कि ब्रह्मतीर्थ में स्नान करके पितरों का तर्पण करने से व्यक्ति की इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है और कनखल तीर्थ में तिल-मात्र सुवर्ण का दान करने से सीधे शिवलोक की प्राप्ति होती है।
आगे चलकर यह भद्रावती नदी पावन सरयू नदी में मिल जाती है, जहाँ भद्रेश महादेव का पूजन करने से मनुष्य सब प्रकार के पापों से मुक्त होकर त्रिदेवों की कृपा प्राप्त करता है।
आज भी जब कोई यात्री काण्डा और धपोला सेरा की सुरम्य उपत्यका में पहुँचता है, तो भद्रावती नदी का सुरीला कलकल गान, हुनुम के घने जंगलों की शीतल बयार और सान्योड्घार कंदरा का रहस्यमयी वातावरण उसे एक अलौकिक अनुभूति से सराबोर कर देता है। यह स्थान केवल प्रकृति प्रेमियों के लिए एक मनोरम स्वर्ग नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक साधकों के लिए एक ऐसा गुप्त जागृत धाम है, जहाँ आस्था और सौंदर्य मिलकर इतिहास के पन्नों को जीवंत कर देते हैं।
विशेष रिपोर्ट: रमाकान्त पन्त
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