हसामपुर की पहाड़ी पर द्वापर युगीन रहस्य: पांडवों के दिव्यास्त्रों, स्वयं-प्रकट तीन पिण्डियों और नागवंश से जुड़े उस अलौकिक धाम का सच क्या है?
विशेष रपट: रमाकांत पन्त
शैल शक्ति ब्यूरो / हसामपुर (सीकर)। दिल्ली से कोटपूतली होकर मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित राजस्थान के सीकर जनपद अंतर्गत हसामपुर गांव की विहंगम पहाड़ी केवल एक भौगोलिक चोटी नहीं, बल्कि सनातन इतिहास, तंत्र और परा-आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा केंद्र है जिसकी जड़ें सीधे द्वापर युग से जुड़ी हैं। यहाँ स्थित माँ मनसा देवी का प्राचीन दरबार श्रद्धालुओं के लिए एक ऐसा जाग्रत धाम है, जहाँ कदम रखते ही जन्म-जन्मांतर के संताप, व्याधियां और मानसिक विकार स्वतः विलीन हो जाते हैं।


वर्तमान में शारदीय/वासंतिक नवरात्र के पावन अवसर पर समूची पहाड़ी पर ‘शतचंडी महायज्ञ’ के वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहे हैं और देश के कोने-कोने से पहुंचे श्रद्धालु इस अलौकिक तपोभूमि की दिव्यता के साक्षी बन रहे हैं।
द्वापर कालीन अज्ञातवास, दिव्यास्त्र और 10वीं सदी का स्वर्णिम इतिहास
हसामपुर स्थित मनसा माता मंदिर का इतिहास जितना पौराणिक है, उतना ही ऐतिहासिक साक्ष्यों से समृद्ध भी:
- पांडवों की तपस्थली: जनश्रुतियों के अनुसार महाभारत काल में अज्ञातवास पूर्ण होने के बाद पांडवों ने इसी पहाड़ी पर शक्ति स्वरूपा मनसा देवी की घोर आराधना की थी। माँ के आशीर्वाद से ही उनकी आगे की यात्रा निष्कंटक हुई और उन्हें कई दुर्लभ दिव्यास्त्र प्राप्त हुए।
- अग्रवाल समाज की कुलदेवी व नागफनी चुनरी: सूर्यवंशी महाराजा अग्रसेन का विवाह नागवंश में होने के कारण माता मनसा को अग्रवाल समाज की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। नागपंचमी पर यहाँ विराट पूजा-अर्चना होती है और वैवाहिक मांगलिक अवसरों पर माता के दरबार में पारंपरिक ‘नागफनी की चुनरी’ ओढ़ाने की दुर्लभ परंपरा आज भी पूरी आस्था से निभाई जाती है।
- तंवरावाटी का ऐतिहासिक आख्यान: 10वीं व 11वीं शताब्दी के तंवरावाटी इतिहास में भी इस सिद्ध पीठ का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। जनश्रुतियों के अनुसार हसामपुर के प्रतापी राजा योगी मित्तल ने इस भव्य मंदिर का निर्माण व जीर्णोद्धार कराया था।
पाँच में से तीन स्वयंभू पिण्डियों का तिलिस्म: त्रिदेवियों का साकार विग्रह
गर्भगृह में प्रतिष्ठित पाँच पिण्डियों में से तीन पिण्डियां पूर्णतः प्राकृतिक (स्वयंभू) हैं। यह दृश्यमान जगत में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती—तीनों महाशक्तियों के एकाकार रूप का साक्षात्कार कराती हैं।
आचार्य रमेश शर्मा, पंडित संजय मिश्रा, देवेंद्र शास्त्री, मुकुल शास्त्री, मोहित शास्त्री और मिथिलेश भारद्वाज के अनुसार, ‘देवी भागवत’ और ‘विष्णु पुराण’ में माता को शिव-पार्वती की मानस-पुत्री, नागभगिनी, विषहर और महर्षि कश्यप के मन से उत्पन्न ‘मनसा’ कहा गया है।
“यहाँ मन्नत नहीं, आत्मा का रूपांतरण होता है” — महंत केशव भारद्वाज
मंदिर के मुख्य महंत केशव भारद्वाज ने धाम की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा:
“हसामपुर की यह पावन पहाड़ी मात्र एक तीर्थ नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष जाग्रत शक्तिपीठ है। यहाँ जो भी भक्त सच्चे हृदय से अपनी व्यथा लेकर आता है, माँ मनसा उसके काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय रूपी विकारों का हरण कर उसे ज्ञान व परम शांति का अमृत प्रदान करती हैं। नवजात शिशुओं के जडूला (मुंडन) और नवदंपतियों के गठजोड़े की जात लगाने दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की हर मनोकामना यह वैष्णवी दरबार पूर्ण करता है। चल रहे शतचंडी महायज्ञ की पूर्णाहुति पर नवमी को विशाल भंडारे में समूचा अंचल माँ के महाप्रसाद का साक्षी बनेगा।”
पहाड़ी पर गूंजती है कन्हैया की वंशी: कृष्ण जन्माष्टमी का भी रहता है अनूठा उल्लास
मनसा माता के इस वैष्णवी दरबार की एक और अनूठी विशेषता यहाँ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव है।
हर वर्ष भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को इस पहाड़ी पीठ पर ब्रज जैसा उल्लास बिखर जाता है। मध्य रात्रि 12 बजे शंखनाद के बीच बालकृष्ण के विग्रह का पंचामृत महाभिषेक किया जाता है। स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत सजीव झांकियां और देर रात तक चलने वाली भजन संध्या पहाड़ी के वातावरण को कृष्णमय बना देती हैं, जहाँ सैकड़ों श्रद्धालु पारंपरिक धनिया-पंजीरी और पंचामृत का महाप्रसाद पाकर स्वयं को धन्य मानते हैं।
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