कैलाश मानस क्षेत्र का वह विस्मयकारी रहस्य जिसने एक खूंखार राक्षस को दे दी महामुक्ति
@ रमाकान्त पन्त @
धारचूला/अनंत आकाश को छूती कैलाश की धवल चोटियां साक्षात प्रकृति और आध्यात्मिकता के अनुपम सौंदर्य का शिखर हैं। यहाँ की पावन फिजाओं में भगवान शिव की अलौकिक उपस्थिति का जीवंत आभास होता है, जो हर अशांत मन को तत्क्षण परम शांति की गोद में सुला देता है। मानसरोवर के निर्मल जल में चमकता कैलाश का दिव्य प्रतिबिंब ऐसा प्रतीत होता है मानो धरा पर साक्षात देवलोक उतर आया हो। इस अलौकिक धाम की महिमा सर्वथा शब्दों से परे है, जिसके दर्शन मात्र से आत्मा के सारे संताप विलीन हो जाते हैं। युगों-युगों से साधकों को आकर्षित करने वाला यह पावन क्षेत्र संपूर्ण ब्रह्मांड की दिव्य चेतना और महामुक्ति का साक्षात केंद्र है।
स्कन्द पुराण के अंतर्गत मानसखण्ड के तेरहवें अध्याय में भगवान दत्तात्रेय ने राजा केतुमान के पतन, उसके भयानक राक्षस स्वरूप में परिवर्तन और अंततः कैलाश मानसरोवर क्षेत्र की दिव्य महिमा से उसकी परम मुक्ति की एक अद्भुत और प्रेरणादायी कथा का वर्णन किया है। आइए इस पावन वृत्तांत को सुव्यवस्थित रूप में समझते हैं।
जब वासना और अधर्म में डूबा एक गौरवशाली राजवंश
सत्ययुग के आरंभ में मिथिला के जनकवंश में राजा केतुमान नाम का एक अत्यंत बुद्धिमान परंतु कुमार्गी राजा हुआ। वह अपनी प्रजा का रक्षक बनने के बजाय भिल्लों और चोरों की कुसंगति में पड़ गया। उसने न केवल वेदमार्ग और यज्ञ-यागादि का परित्याग किया, बल्कि रात के अंधेरे में डाकुओं के साथ मिलकर अपने ही राज्य के ब्राह्मणों और नागरिकों की धन-संपत्ति तथा स्त्रियों का हरण करना शुरू कर दिया।
मानव जीवन की दुर्लभता और कैलाश मानस क्षेत्र के दिव्य महत्व को रेखांकित करते हुए ग्रंथ में कहा गया है:
दुर्लभं मानुषे लोके मानुष्यं नृपसत्तम्।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये मानसाख्यस्य दर्शनम्॥
पाप की पराकाष्ठा: जब राजा बना खूंखार ब्रह्मराक्षस
राजा केतुमान के पापों का घड़ा तब पूरी तरह भर गया, जब उसने एक रूप-यौवन से संपन्न और पातिव्रत धर्म में लीन एक परम पवित्र ब्राह्मणी का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। जब उस ब्राह्मणी के पति ने दीनतापूर्वक रोते हुए अपनी पत्नी को छोड़ने की गुहार लगाई, तो उस क्रूर राजा ने क्रोध में आकर अपनी तलवार से उस त्रिपुंडधारी ब्राह्मण का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस जघन्य ब्रह्महत्या और अधर्म के कारण, राजा अपनी मृत्यु के पश्चात अगले जन्म में मलय पर्वत पर एक भयानक ब्रह्मराक्षस के रूप में उत्पन्न हुआ।
आतंक का साम्राज्य और एक दिव्य ध्वनि से हृदय परिवर्तन
मलय पर्वत पर वह पापी राक्षस घंटाकर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसका स्वरूप इतना विकराल और हिंसक था कि वह मनुष्यों, घोड़ों, हाथियों और वन्य जीवों का बेरहमी से संहार करने लगा, जिससे वह पूरा क्षेत्र पूरी तरह निर्जन हो गया। कई सदियों के घोर अंधकार के बाद, अचानक एक दिन उसने वन में एक परम तपस्वी ऋषि को उनकी पत्नी के साथ कैलाश मानसरोवर की परम कल्याणकारी और शुभप्रद कथा का गान करते हुए सुना। उस दिव्य और पवित्र वाणी को सुनते ही राक्षस के भीतर की समस्त क्रूरता और हिंसक प्रवृत्ति तत्क्षण शांत हो गई।
पश्चाताप के आंसू और ऋषि के चरणों में गुहार
ऋषि के मुख से भगवान शिव के प्रिय और पवित्र कैलाश मानस-क्षेत्र की महिमा सुनकर राक्षस का हृदय पश्चाताप से कांप उठा। वह जोर-जोर से रोते हुए ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और अपने संचित महापापों से मुक्ति का मार्ग पूछने लगा। उसने अत्यंत व्याकुल होकर ऋषि से प्रश्न किया:
पापात्मनां महत्पापं शाम्येत् केन वै ऋषे।
संसारसागरं केन तीर्यंते कथयस्व माम्॥
अर्थात, हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझ जैसे घोर पापी के महापापों का शमन भला कैसे संभव है? मैं इस दुस्तर संसार-सागर से कैसे पार पा सकता हूँ, कृपया मुझे राह दिखाएं।
कैलाश मानस-क्षेत्र: महापापों के समूल नाश का एकमात्र परम धाम
राक्षस की सच्ची व्याकुलता और पश्चाताप को देखकर परम दयालु ऋषि का हृदय द्रवित हो उठा। ऋषि ने उसे सांत्वना देते हुए स्पष्ट किया कि यद्यपि पृथ्वी पर ब्रह्महत्या और मित्रवध जैसे पापों का निवारण अत्यंत कठिन है, परंतु यदि कोई प्राणी सच्चे मन से शिव-लिंग युक्त दिव्य कैलाश मानस-क्षेत्र का स्मरण, कीर्तन या दर्शन करता है, तो उसके युगों-युगों के भयंकर पाप भी तत्क्षण भस्म हो जाते हैं।
इस परम पावन अध्याय के समापन में स्पष्ट किया गया है कि संसार के समस्त तीर्थ, दान, काशी का वास और यहाँ तक कि राजसूय यज्ञ भी तभी तक श्रेष्ठता की गर्जना करते हैं, जब तक कि मनुष्य को परम पावन कैलाश मानस-क्षेत्र का स्मरण या दर्शन प्राप्त नहीं हो जाता। इस प्रकार, एक घोर पापी और हिंसक ब्रह्मराक्षस भी कैलाश मानसरोवर की अद्भुत महिमा के श्रवण मात्र से परम पवित्र होकर सदा के लिए मुक्त हो गया।
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