चीखती रात और खामोश तबाही: क्या अगली सुबह का सूरज देख पाएगा यह आशियाना?
बिन्दुखत्ता। रात का गहरा सन्नाटा और उस सन्नाटे को चीरती हुई गौला नदी की डरावनी गर्जना—बिन्दुखत्ता के तटवर्ती इलाकों में जिंदगी और तबाही के बीच अब सिर्फ चंद कदमों का फासला रह गया है। हर गुजरती लहर के साथ किनारे की जमीन दरक रही है और उसी के साथ ढह रहे हैं उन बेबस परिवारों के सपने, जिन्होंने पाई-पाई जोड़कर नदी के किनारे अपनी छोटी सी दुनिया बसाई थी।
दहशत के साये में रतजगा इन्द्रानगर सहित तटवर्ती इलाकों में अब कोई सोता नहीं। बूढ़ी आंखें खौफ से अंधेरे को घूरती हैं और माताएं अपने मासूमों को सीने से चिपकाए पूरी रात इस दहशत में काट देती हैं कि न जाने कब उफनता पानी उनकी चौखट लांघ जाए। ग्रामीण हाथों में टार्च थामे रात भर नदी के किनारे पहरा देने को मजबूर हैं। भविष्य की अनिश्चितता और बेघर होने के डर ने सैकड़ों परिवारों का चैन पूरी तरह छीन लिया है।
तिनके की तरह बहे सुरक्षा बांध गौला के प्रचंड वेग को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए तमाम चेकडैम पानी के विकराल थपेड़ों के आगे ताश के पत्तों की तरह ढहकर बह गए हैं। नदी का बहाव रोकने के सारे सुरक्षा इंतजाम पलक झपकते ही धारा में विलीन हो चुके हैं, जिससे पानी का सीधा प्रहार अब बस्तियों की तरफ हो रहा है।
जलमग्न हुआ किसानों का पसीना सैकड़ों एकड़ उपजाऊ और लहलहाती कृषि भूमि देखते ही देखते नदी के मटमैले पानी में समा चुकी है। जिस खेत से साल भर का निवाला निकलना था, वहां अब केवल विनाशकारी लहरें तैर रही हैं। रोजी-रोटी का मुख्य जरिया छिन जाने से ग्रामीणों के सामने भरण-पोषण का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
अस्तित्व की जंग लड़ता इन्द्रानगर सबसे दर्दनाक और नाजुक हालात इन्द्रानगर के हैं, जहां नदी का कटान रिहायशी मकानों की नींव तक पहुंच चुका है। बेबस लोग अपनी आंखों के सामने अपनी जिंदगी भर की पूंजी को दरकते देखने पर विवश हैं। छलकते आंसुओं और कंपकंपाते होठों के साथ तटवर्ती निवासी बस यही प्रार्थना कर रहे हैं कि गौला का यह रौद्र रूप शांत हो और उनका अस्तित्व मिटने से बच जाए।
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