महाप्रलय के चक्रव्यूह में छिपा कलिकाल का परम गोपनीय मोक्ष-द्वार: जहां बर्फ के सीने में खौलता है ‘अग्निकुंड’ और साक्षात भगवती महालक्ष्मी बनाती हैं महाप्रसाद!

ख़बर शेयर करें

 

हिमालय के उत्तुंग हिमशिखरों और नीरव उपत्यकाओं के मध्य एक ऐसा दिव्य भूभाग स्थित है, जिसकी सत्ता तीनों लोकों के भौतिक नियमों को चुनौती देती है। स्कन्दपुराण के पावन ‘केदारखण्ड’ के पृष्ठ जब खुलते हैं, तो एक ऐसा आध्यात्मिक रहस्य उजागर होता है जो मानव चेतना को स्तब्ध कर देता है। यह कोई साधारण तीर्थ नहीं, बल्कि साक्षात भू-वैकुंठ है। सृष्टि के संहारक और योगिराज भगवान देवाधिदेव महादेव ने सर्वप्रथम इस परम गोपनीय क्षेत्र की महिमा जगतजननी माता पार्वती को सुनाई थी। कालांतर में इसी दिव्य ज्ञान-गंगा को ब्रह्मपुत्र महर्षि वशिष्ठ ने अपनी तपस्विनी अर्धांगिनी माता अरुन्धती के समक्ष प्रकट किया।

पंचकेदार की कथा के उपरांत अरुंधति की अनंत ब्रह्म-पिपासा

कथा का शुभारंभ उस क्षण से होता है जब पंचकेदार के महात्म्य का श्रवण करने के पश्चात माता अरुन्धती के हृदय में बदरीवन को जानने की तीव्र उत्कंठा जागृत होती है। जब आत्मा परब्रह्म के रस में निमग्न होती है, तब अन्न-जल की समस्त सांसारिक आवश्यकताएं तिरोहित हो जाती हैं। माता अरुन्धती हाथ जोड़कर महर्षि वशिष्ठ से निवेदन करती हैं:

स्कन्दपुराण (केदारखण्ड — अध्याय ५७, श्लोक २):

पिबन्त्यास्त्वन्मुखाम्भोजात्तृप्तिर्नास्ति कथामृतम् । न मां क्षुधा न मां तृष्णा बाधते भगवन्मुने ॥ (भावार्थ: हे भगवन्! आपके मुखकमल से झरते इस अलौकिक कथामृत का निरंतर पान करते हुए भी मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। इस रसपान के सम्मुख मुझे न भूख सता रही है और न ही कोई सांसारिक तृष्णा या प्यास व्याकुल कर रही है।)

माता अरुन्धती कहती हैं—”हे तपोनिधे! मैं धन्य और कृतपुण्य हूँ कि मुझे आप जैसे पति मिले। तीनों लोकों में मेरे समान कोई देवी या मानुषी नहीं है। कृपा कर मुझे बताइए कि भगवान शिव ने माता पार्वती को जिस बदरीवन का महात्म्य सुनाया था, उसका विस्तार कितना है? वहाँ तपस्या करने का क्या फल है? और किन-किन पुण्यात्माओं ने उस क्षेत्र में तप किया है?”

देवाधिदेव शिव का पार्वती को उपदेश: कण्वाश्रम से नन्दगिरि तक का विस्तार

महर्षि वशिष्ठ ने क्षणभर भगवान महेश्वर का ध्यान कर अपनी भार्या को बताया कि देवाधिदेव महादेव ने पार्वती जी से क्या कहा था:

स्कन्दपुराण (केदारखण्ड — अध्याय ५७, श्लोक ९):

बदरीवनमाहात्म्यं कथयामास पार्वतीम् । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पुण्यं पापविनाशनम् ॥ (भावार्थ: भगवान शिव ने माता पार्वती को जो पापनाशक और परम पुण्यप्रद बदरीवन माहात्म्य सुनाया था, वही रहस्य मैं तुम्हें सावधान होकर सुनाता हूँ।)

महर्षि वशिष्ठ विस्तार से बताते हैं कि कण्वाश्रम से आरंभ होकर नन्दगिरि पर्वत तक फैला यह दिव्य बदरी-मण्डल तीन योजन चौड़ा और बारह योजन लंबा है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र भुक्ति (सांसारिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला है। इसी क्षेत्र में महर्षि कण्व ने तपस्या कर भगवान रमापति (विष्णु) को प्रसन्न किया था। यहाँ नन्दप्रयाग में स्नान करके श्रीहरि की पूजा करने से घोर पापी भी दुःखरहित परम पद को प्राप्त कर लेते हैं।

यह भी पढ़ें 👉  गौला के मुहाने पर सांसों का पहरा: 'शैल शक्ति' के खुलासे के बाद जागा तंत्र, दिनभर चले हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच शुरू हुआ डायवर्जन

चार दिव्य आयामों में प्रतिष्ठित बदरी-मण्डल

यह पावन भूमि केवल आंखों से दिखने वाला भूगोल नहीं है, बल्कि यह चार स्तरों (आयामों) में विद्यमान है:

  • स्थूल रूप: जो सामान्य मानवों और यात्रियों को बर्फ, शिला, नदियों और पर्वत-शिखरों के रूप में दिखाई देता है।
  • सूक्ष्म रूप: जहां सिद्ध, ऋषि और योगीजन दिव्य देह से निरंतर तपस्या में लीन रहते हैं।
  • सूक्ष्मतम रूप: जहां ब्रह्मा, रुद्र, गंधर्व, अप्सराएं, किन्नर, यक्ष और प्रमथगण श्रीहरि के संकीर्तन में निमग्न रहते हैं।
  • शुद्ध रूप: जो साक्षात परब्रह्म परमात्मा श्रीनारायण का नित्य, परम ज्योतिर्मय वैकुंठ धाम है।

यह पापी और अधर्मियों के लिए अत्यंत अगम्य है। जो मनुष्य इस घोर कलिकाल में मात्र अपने मन में यह संकल्प भी दोहराता है कि “मैं विशाला बदरी जाऊंगा”, वह मृत्यु के उपरांत सीधे मोक्ष का अधिकारी बन जाता है। यहाँ निवास करने वाले पुण्यात्मा साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि ‘विष्णुरूपधारी’ (साक्षात विष्णु स्वरूप) हो जाते हैं।

शीतल तुषार में खौलता ‘वह्नितीर्थ’ और भगवती महालक्ष्मी की रसोई

बदरिकाश्रम का सबसे बड़ा विस्मय वह है जो भौतिक विज्ञान के सारे तर्कों को पीछे छोड़ देता है। चारों ओर हाड़ कंपा देने वाली बर्फ के बीच साक्षात अग्निदेव ‘वह्नितीर्थ’ (तप्तकुंड) के रूप में गरम जल की दिव्य धारा बनकर अनवरत प्रवाहित होते हैं, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

किंतु इससे भी बड़ा रहस्य यहाँ अर्पित होने वाले नैवेद्य (महाप्रसाद) का है, जिसकी रचना किसी नश्वर मानवीय हाथों से नहीं होती:

स्कन्दपुराण (केदारखण्ड — अध्याय ५७, श्लोक २५-२६):

लक्ष्मीः पचति नैवेद्यं भुङ्क्ते नारायणः स्वयम् । येन भुक्तं तु नैवेद्यं श्रीविष्णोः परमात्मनः । सैव लोके परब्रह्मस्वरूपो नात्र संशयः ॥ (भावार्थ: इस परम धाम में स्वयं जगज्जननी भगवती महालक्ष्मी नैवेद्य तैयार करती हैं और देवाधिदेव श्रीनारायण स्वयं उसे भोग लगाते हैं। इस दिव्य महाप्रसाद को जो भी मनुष्य ग्रहण करता है, वह इस नश्वर संसार में साक्षात परब्रह्म का रूप धारण कर लेता है; इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।)

यहाँ छुआछूत और सांसारिक भेद-भाव का कोई दोष नहीं लगता। इस महाप्रसाद का अनादर करने वाला व्यक्ति चाण्डाल से भी अधम और समस्त धर्मों से बहिष्कृत माना जाता है, जबकि इसे आदरपूर्वक पाने वाला पापी से पापी जीव भी भवबंधन से मुक्त हो जाता है।

यह भी पढ़ें 👉  13 सितंबर को आस्था मॉल में क्या होने जा रहा है खास? नन्हे चेहरों के पीछे छिपे 'अनोखे अवतार' से चौंक जाएगा पूरा रामनगर!

समस्त महातीर्थों की तुलना और अनंत पुण्य का विधान

घोर कलिकाल में लोभ, मोह और वासना से घिरी मानव जाति के लिए बदरिकाश्रम ही वह अक्षय प्रकाशस्तंभ है जिसकी समता तीनों लोकों का कोई तीर्थ नहीं कर सकता:

स्कन्दपुराण (केदारखण्ड — अध्याय ५७, श्लोक ३४-३५):

न काशी न तथा काञ्ची मथुरा न गया तथा । प्रयागश्च तथाऽयोध्या नावन्ती कुरुजाङ्गलम् ॥ अन्यान्यपि च तीर्थानि यथासौ कलिनाशिनी । बदरीतरुणा या वै मण्डिता पुण्यगास्थली ॥ (भावार्थ: काशी, कांची, मथुरा, गया, प्रयागराज, अयोध्या, अवंतिका (उज्जैन) और कुरुक्षेत्र सहित संसार का कोई भी तीर्थ उस कलिनाशिनी बदरी के समान नहीं है, जो पुण्यदायिनी बदरी-वृक्षों से सुशोभित यह पावन स्थली है।)

  • अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति: बदरीनाथ धाम में यदि कोई मनुष्य उड़द के दाने बराबर (माषमात्र) भी सोना अथवा चांदी दान करता है, तो वह सहस्रों जन्मों तक कभी दरिद्रता का मुख नहीं देखता।
  • पितरों का परम उद्धार: इस क्षेत्र में पितरों के उद्देश्य से दिया गया मात्र एक बूंद जल भी पितरों को समस्त बंधनों से छुड़ाकर सीधे वैकुंठ लोक में प्रतिष्ठित कर देता है।
  • पृथ्वी दान का फल: जो मनुष्य केवल मन से भी बदरीनाथ की प्रतिमा का ध्यान करता है, उसे संपूर्ण पृथ्वी के दान और कठोर तप का फल अनायास ही मिल जाता है।

काल की अंतिम चेतावनी: देह शिथिल होने से पूर्व बदरी-गमन

स्कन्दपुराण केवल महिमा का गान नहीं करता, बल्कि मानव को आयु के निरंतर घटते पलों के प्रति झकझोरते हुए सचेत करता है। महर्षि वशिष्ठ जीवन के सबसे अनिवार्य कर्तव्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं:

स्कन्दपुराण (केदारखण्ड — अध्याय ५७, श्लोक ३९-४०):

यावत्प्राणाः शरीरेऽस्मिन् यावदिन्द्रियशुद्धता । गात्राणि यावच्छैथिल्यं नाप्नुवन्ति महात्मभिः । बदरीगमने तावद्विलम्बो न विधेयकः ॥ चरणानां च साफल्यं कुर्याद्बदरिकागमात् । नेत्रयोश्चैव साफल्यं कुर्याद्विष्णोश्च दर्शनात् ॥ (भावार्थ: जब तक इस नश्वर शरीर में प्राण शेष हैं, जब तक समस्त इंद्रियां सक्षम व शुद्ध हैं, और जब तक वृद्धावस्था से अंग शिथिल होकर झुक नहीं जाते, तब तक विवेकशील मनुष्यों को बदरीनाथ की यात्रा में तनिक भी विलंब नहीं करना चाहिए। चरणों की सार्थकता बदरिकाश्रम के मार्ग पर चलने में है और नेत्रों की अंतिम सार्थकता साक्षात भगवान विष्णु के दर्शन करने में है।)

नन्दप्रयाग का दिव्य यज्ञ और देवताओं का प्रत्यक्ष सशरीर आगमन

यह भी पढ़ें 👉  थिएटर के अंधेरे में दिखा वह अलौकिक रूप... जब अचानक भाव-विभोर हो उठे सांसद, क्या था पर्दे का रहस्य?

कथा के अगले चरण में महर्षि वशिष्ठ नन्दप्रयाग के उस ऐतिहासिक और अलौकिक यज्ञ का रहस्योद्घाटन करते हैं, जहाँ सत्यनिष्ठ राजा नन्द ने विपुल अन्न और दक्षिणा से युक्त महायज्ञ संपन्न किया था। राजा नन्द की अनन्य भक्ति और निष्ठा के वशीभूत होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित समस्त देवगण अदृश्य न रहकर, सशरीर प्रत्यक्ष रूप (मूर्तिमन्तो महात्मानो) धारण करके अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करने भूतल पर उतर आए थे।

गंधमादन पर्वत, कुबेर शिला और नर-नारायण के आश्रम से सुशोभित यह संपूर्ण क्षेत्र तप, त्याग और ईश्वर के साक्षात्कार का वह महातीर्थ है, जहां कदम रखते ही मनुष्य का प्रारब्ध बदल जाता है और जीवात्मा संसार के समस्त बंधनों को काटकर परम पद में विलीन हो जाती है।

बंद कपाट: बर्फ के नीचे का रहस्य
नवंबर आते ही जब इंसान घाटी छोड़कर लौट जाते हैं, तब बद्रीनाथ के कपाट भारी तालों में जकड़ दिए जाते हैं।
शून्य से नीचे गिरते तापमान और बर्फीले तूफानों के बीच, गर्भगृह में सिर्फ एक घृत दीपक जलता छोड़ दिया जाता है।
पूरी दुनिया मानती है कि अगले छह महीनों तक यह पवित्र धाम बर्फ की सफेद चादर तले पूरी तरह वीरान है।
मगर बंद दरवाजों के उस पार, कड़कड़ाती ठंड में देवर्षि नारद की वीणा और अदृश्य देवगणों के मंत्र गूंजने लगते हैं।
इंसानों की गैरमौजूदगी में हर पहर स्वर्ग के देवता स्वयं भगवान नारायण की गुप्त आराधना करते हैं।
जब छह महीने बाद ग्रीष्मकाल में पहली बार वे भारी-भरकम कपाट खोले जाते हैं, तो भीतर का नजारा सबको स्तब्ध कर देता है।
महीनों से बंद पड़े उस एकांत में वह अखंड ज्योति बिना बुझे ठीक उसी तरह प्रज्वलित मिलती है।
गर्भगृह में तैरती ताजे पुष्पों की सुगंध गवाही देती है कि इस सन्नाटे में कोई अलौकिक शक्ति निरंतर मौजूद थी।

 

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad