विशेष आध्यात्मिक समाचार
महाभारत विजय का वह ‘अदृश्य रहस्य’… जहां अमृत कलश में स्पंदित है साक्षात पराशक्ति!
सतयुग की स्वयंभू ज्वाला, पांडवों की साधना-स्थली, महाकालेश्वर का स्वयंभू शिवलिंग और अष्टकोणीय गर्भगृह का वह अलौकिक धाम—जिसने मुगलों से लेकर सिद्ध संतों तक को नतमस्तक किया
नई दिल्ली / विशेष आध्यात्मिक संवाददाता:
देश की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी अंचल में स्थित एक ऐसा चमत्कारी एवं जागृत सिद्धपीठ, जिसका इतिहास किसी एक युग का नहीं बल्कि सतयुग से लेकर महाभारत और आधुनिक काल तक के गूढ़ रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए है। यह पावन धाम है—मां कालकाजी का सिद्धपीठ (मनोकामना सिद्ध पीठ)। इस पावन तीर्थ में जहां आदिशक्ति भगवती कालिका अमृत कलश के स्वरूप में भक्तों के संकट हरती हैं, वहीं देवाधिदेव महाकालेश्वर का स्वयंभू शिवलिंग भी अगाध श्रद्धा एवं भक्ति का प्रमुख केंद्र है। शिव और शक्ति के इस पावन मिलन स्थल पर आने वाला कोई भी साधक कभी रिक्त हाथ नहीं लौटता।
धार्मिक मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के भीषण महासमर में उतरने से पूर्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में पांडवों ने विजयश्री प्राप्त करने के लिए इसी पावन धरा पर मां भगवती कालिका और देवाधिदेव महादेव की घोर तपस्या की थी। आज भी इस मंदिर के अष्टकोणीय गर्भगृह में प्रवेश करते ही एक असीम ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अनुभूति होती है, जहां मां किसी साधारण प्रतिमा के रूप में नहीं, बल्कि ‘अमृत के पवित्र कलश’ के स्वरूप में संगमरमर की छतरी और रजत पत्रों के मध्य साक्षात विराजित हैं।
सांसद प्रतिनिधि लक्ष्मण खाती एवं वरिष्ठ समाजसेवी वीरेंद्र कोरंगा ने किए दर्शन; सांसद अजय भट्ट को करवाए सजीव दर्शन
इस अलौकिक सिद्धपीठ की महिमा का अनुभव करने के बाद नैनीताल-उधम सिंह नगर लोकसभा क्षेत्र के सांसद श्री अजय भट्ट के प्रतिनिधि लक्ष्मण खाती एवं बिंदुखत्ता के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता वीरेंद्र कोरंगा मां कालकाजी और भगवान महाकालेश्वर के पावन दरबार पहुंचे।
मंदिर की दिव्यता और अलौकिक आभा का अत्यंत भावपूर्ण व सुंदर शब्दों में वर्णन करते हुए उन्होंने कहा:
“आज इस अनादि सिद्धपीठ में आदिशक्ति मां कालिका और देवाधिदेव महाकालेश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन पाकर हमारा जीवन धन्य हो गया है। यहां के वातावरण में एक अनूठी सकारात्मक ऊर्जा और मां की असीम कृपा का वास है, जो प्रत्येक भक्त के संताप को क्षण भर में हर लेती है।”
इस पावन अवसर पर सांसद प्रतिनिधि श्री लक्ष्मण खाती ने दूरभाष के माध्यम से सांसद श्री अजय भट्ट को मंदिर के सजीव (प्रत्यक्ष) दर्शन करवाए। प्रत्यक्ष दर्शन कर सांसद अजय भट्ट भावविभोर हो उठे। उन्होंने मां कालिका और महादेव के श्रीचरणों में श्रद्धा एवं आराधना के पुष्प अर्पित किए तथा देश व प्रदेश के समस्त श्रद्धालुओं के कल्याण, सुख-समृद्धि एवं आरोग्यता की मंगलकामना करते हुए हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित कीं।
कालिका पुराण की दृष्टि में मां कालिका का अलौकिक स्वरूप
कालिका पुराण में मां काली की महिमा का गुणगान करते हुए उन्हें संपूर्ण चराचर जगत की मूल चेतना, पराशक्ति और महामाया कहा गया है:
कालिका पुराण के अनुसार, जब शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे महादैत्यों के संताप से तीनों लोक त्राहि-त्राहि कर रहे थे, तब देवताओं की करुण पुकार पर मां पार्वती के ललाट (भृकुटि) से एक प्रचंड संहारक तेज प्रकट हुआ, जो साक्षात ‘महाकाली’ कहलाईं। मां काली केवल दुष्टों की संहारक नहीं, अपितु अपने शरणागत भक्तों के लिए परम ममतामयी, अज्ञान-विनाशिनी और मोक्ष-प्रदायिनी जगदम्बा हैं।
मां काली के दो अत्यंत कल्याणकारी एवं सिद्ध मंत्र
मां भगवती की नित्य कृपा और सुरक्षा चक्र प्राप्त करने हेतु दो महामंत्र:
- महाकाली बीज व कृपा मंत्र:
॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥ (भावार्थ: समस्त दुखों और नकारात्मक ऊर्जा का नाश कर अभय प्रदान करने वाली मां कालिका को मेरा कोटि-कोटि नमन।)
- सर्वकल्याणकारी व विजय प्रदायक स्तुति मंत्र:
॥ ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥ (भावार्थ: जो विजय देने वाली ‘जयन्ती’, भक्तों का मंगल करने वाली ‘मंगला’, संहारक ‘काली’, कल्याणमयी ‘भद्रकाली’, कपाल धारण करने वाली ‘कपालिनी’, क्षमा और पोषण करने वाली जगदम्बा हैं, उन भगवती शिवा को बारंबार प्रणाम है।)
मंदिर का ऐतिहासिक सफर एवं वास्तुकला
- सतयुग की स्वयंभू पिंडी व महाकालेश्वर शिवलिंग: मंदिर में मां कालका की पिंडी स्वयंभू (स्वयं प्रकट) मानी जाती है। इसके साथ ही परिसर में स्थित महाकालेश्वर का स्वयंभू शिवलिंग भी भक्तों के लिए भक्ति व साधना का परम पावन केंद्र है।
- महाभारत कालीन विजय-पीठ: मान्यता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों ने विजय प्राप्ति हेतु इसी स्थान पर मां काली व भगवान शिव की आराधना की थी।
- संत बालक नाथ और मुगलों का समर्पण: वर्तमान मंदिर की स्थापना सिद्ध संत बाबा बालक नाथ जी ने की थी। उनके आध्यात्मिक तपोबल से प्रभावित होकर मुगल शासक अकबर शाह (वर्ष १८०६ से १८३७) के काल में तथा अठारहवीं शताब्दी (वर्ष १७६४) के बाद अकबर द्वितीय के कोषाध्यक्ष राजा केदारनाथ ने मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया।
- अनोखी अष्टकोणीय वास्तुकला: बीसवीं सदी में भक्तों के सहयोग से निर्मित वर्तमान मंदिर आठ कोनों वाली अनूठी अष्टकोणीय संरचना है। इसे लाल बलुआ पत्थर, श्वेत संगमरमर और काले झांवा पत्थरों से संवारा गया है, जहां काला रंग साक्षात मां काली की असीम ब्रह्मांडीय ऊर्जा को दर्शाता है।
मुंडन संस्कार का पावन स्थल व सुगम यात्रा मार्ग
- शिशुओं का सुरक्षा कवच (मुंडन संस्कार): मां कालकाजी मंदिर पूरे देश में नवजात शिशुओं के मुंडन संस्कार (केश अर्पण) के लिए विख्यात है। मान्यता है कि मां के चरणों में जन्म के बाल अर्पित करने से बालक सभी प्रकार की अनिष्ट शक्तियों और कुदृष्टि से सुरक्षित रहता है। यह सुविधा प्रतिदिन प्रातः काल ०६:०० बजे से रात्रि १०:०० बजे तक उपलब्ध रहती है।
- पहुंचने का मार्ग: दक्षिण दिल्ली में नेहरू प्लेस व्यावसायिक क्षेत्र के सामने स्थित इस सिद्धपीठ तक दिल्ली रेल सेवा के ‘कालकाजी मंदिर’ केंद्र, बस अड्डे तथा ओखला रेल स्थानक से अत्यंत सुगमता पूर्वक पहुंचा जा सकता है।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥ जय मां कालकाजी ॥
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