मां अवंतिका के पूजन और शिप्रा तट पर अनुष्ठान से पितरों को प्राप्त होती है परम विश्रांति
उज्जैन (धर्म डेस्क): सप्त मोक्षदायिनी नगरियों में विशिष्ट स्थान रखने वाली अवंतिका (वर्तमान उज्जैन) में पितृ उद्धार की सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरी आस्था के साथ जीवंत है। धर्मग्रंथों और लोकमान्यता के अनुसार, देवाधिदेव महाकाल की इस पावन नगरी में अधिष्ठात्री शक्ति मां अवंतिका के पूजन और वंदन से पितरों को न केवल तृप्ति मिलती है, बल्कि वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर परम विश्रांति (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।
स्कंद पुराण का प्रमाण: अवंतिका खंड में वर्णित महात्म्य
सनातन परंपरा में गया, प्रयाग और बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल की तरह ही अवंतिका तीर्थ को पितृ तर्पण के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। ‘स्कंद पुराण’ के अवंतिका खंड में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति अवंतिका क्षेत्र में आकर भगवती की आराधना करता है और अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म संपन्न करता है, उसके 21 कुलों के पितृ देवलोक को गमन करते हैं।
ज्योतिषाचार्यों और तीर्थ पुरोहितों के अनुसार:
- शैव और शाक्त की युति: उज्जैन में जहां भगवान महाकालेश्वर संहार और काल के अधिपति हैं, वहीं मां अवंतिका (शक्ति) कृपा, पोषण और मुक्ति का साक्षात स्वरूप हैं।
- अधोगति से मुक्ति: किसी आकस्मिक कारण या अकाल मृत्यु से पीड़ित आत्माओं को भी मां अवंतिका की अनुकंपा और शिप्रा के स्पर्श से शांति प्राप्त होती है।
सिद्धवट और शिप्रा तट का अलौकिक संयोग
उज्जैन में प्रवाहित पुण्यसलिला शिप्रा के तट पर स्थित सिद्धवट को पितृ मुक्ति का मुख्य केंद्र माना जाता है। प्रयाग के अक्षयवट और गया के गयावट की तरह अवंतिका का सिद्धवट भी अमर वटवृक्ष माना गया है।
तपोधनी भूमि पर स्थित इस तीर्थ में मां भगवती का ध्यान कर पितरों के निमित्त निम्न कर्म किए जाते हैं:
- दूध की धार से अभिषेक: सिद्धवट की जड़ों में पितरों की शांति के लिए दूध अर्पित किया जाता है, जिसे ‘क्षीराभिषेक’ कहते हैं।
- पिंडदान और जलांजलि: मां अवंतिका को साक्षी मानकर दिए गए तिल, जौ और चावल के पिंड सीधे पूर्वजों को तृप्त करते हैं।
- कालसर्प और पितृदोष निवारण: कुंडली में स्थित गंभीर पितृदोषों की निवृत्ति हेतु मां अवंतिका के दरबार में दीपक प्रज्वलित कर प्रार्थना की जाती है।
त्रेतायुग से जुड़ी परंपरा: प्रभु श्रीराम ने भी किया था तर्पण
स्थानीय आख्यानों के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने भी वनवास काल के दौरान अपने पिता महाराज दशरथ के निमित्त अवंतिका तीर्थ में शिप्रा के पावन तट (रामघाट) पर तर्पण किया था। उन्होंने यहां कुल की देवी और भूमि की अधिष्ठात्री मां अवंतिका की विशेष अर्चना कर पितृ ऋण से मुक्ति की प्रार्थना की थी।
पूजन विधि और भाव का महत्व
तीर्थ पुरोहित बताते हैं कि अवंतिका क्षेत्र में केवल कर्मकांड ही पर्याप्त नहीं, बल्कि शुद्ध अंतःकरण और मातृशक्ति के प्रति समर्पण आवश्यक है।
“जब कोई जातक मां अवंतिका के चरणों में शीश नवाकर प्रार्थना करता है कि ‘हे जगदंबा! मेरे ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वज आपके वात्सल्य की छाया में विश्राम पाएं’, तो भगवती की कृपा से पितरों को वैकुंठ धाम में परम विश्रांति सुलभ हो जाती है।”
यही कारण है कि पितृपक्ष, सोमवती अमावस्या और सर्वपितृ अमावस्या जैसे विशेष पर्वों पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अवंतिका नगरी में पहुंचकर मां अवंतिका की आराधना और अपने पितरों का श्राद्ध कर्म संपन्न करते हैं।
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