आखिर कौन सी दिव्य और अदृश्य ऊर्जा छिपी है लालकुआँ के इस मंदिर में, जिसने जयपुर के बड़े संत को भी मंत्रमुग्ध कर दिया
जयपुर के विख्यात संत को लालकुआँ की किस दिव्य अनुभूति ने किया मंत्रमुग्ध, जानिए मंदिर परिसर में उपजे उस आध्यात्मिक प्रवाह की पूरी कहानी
लालकुआँ। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा हमेशा से ही अलौकिक आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रही है। इसी कड़ी में जयपुर के प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्र दादू दयाल आश्रम खिजोरिया से आए विख्यात संत पण्डित रामू लाल शर्मा अपनी विशेष आध्यात्मिक यात्रा के तहत लालकुआँ स्थित प्रसिद्ध अवंतिका मंदिर पहुंचे। उनके आगमन की सूचना से पूरे क्षेत्र में एक सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का संचार हो गया। महाराज जी के साथ उनके 12 सदस्यीय शिष्यों का एक विशेष दल भी इस पावन यात्रा में शामिल रहा। मंदिर प्रांगण में पहुंचते ही संत समाज का भव्य स्वागत किया गया, जिसके बाद उन्होंने माँ अवंतिका की अलौकिक सांयकालीन आरती में पूरे विधि-विधान से भाग लिया। आरती के समय पूरा वातावरण शंखध्वनि और मां के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।
इस अलौकिक संध्या के अवसर पर अपने अनुभवों को साझा करते हुए पूज्य महाराज जी ने कहा कि इस पावन धाम में कदम रखते ही एक अलग प्रकार की विशेष ऊर्जा शक्ति का आभास होता है। उन्होंने इस स्थान को बेहद जागृत और आत्मिक शांति प्रदान करने वाला बताया। जैसे ही स्थानीय क्षेत्रवासियों को महाराज जी के शुभागमन की जानकारी मिलने लगी, वैसे ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन करने और उनका मंगलमयी आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए खिंचे चले आए।
इस आध्यात्मिक समागम के दौरान राधे राधे सेवा समिति के अध्यक्ष संजीव शर्मा ने महाराज जी के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त की। उन्होंने संत पण्डित रामू लाल शर्मा जी के शांत स्वभाव, सहजता और उनके उच्च कोटि के चुंबकीय व्यक्तित्व की खुलकर प्रशंसा की। संजीव शर्मा ने कहा कि महाराज जी का सानिध्य मात्र मिल जाना ही किसी सौभाग्य से कम नहीं है। उनकी वाणी में जो सौम्यता और आंखों में जो करुणा है, वह किसी भी अशांत मन को पल भर में परम शांति का अहसास करा सकती है। उनका पूरा जीवन सादगी, सदाचार और सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार को समर्पित है, जो आज के समाज और युवा पीढ़ी के लिए एक महान प्रेरणा स्तंभ है।
इस आध्यात्मिक मिलन को और अधिक स्मरणीय और ऐतिहासिक बनाते हुए आचार्य चन्द्र शेखर जोशी, मंदिर समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण खाती, संजीव शर्मा, रौनक कनवाल और पूरन जीना आदि प्रबुद्ध जनों ने महाराज जी का आदर-सत्कार किया। इस विशेष अवसर पर उन्होंने महाराज जी को हाल ही में प्रकाशित हुई अत्यंत शोधपरक पुस्तक “आदि शक्ति माँ अवंतिका” भेंट स्वरूप प्रदान की। इस पुस्तक को पाकर महाराज जी ने अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की। उपस्थित समिति के पदाधिकारियों ने महाराज जी को अवगत कराया कि यह पुस्तक केवल एक रचना नहीं है, बल्कि इस प्राचीन क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना, मां अवंतिका की अनंत महिमा और स्थानीय पौराणिक इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज है, जिसे बड़ी निष्ठा के साथ संकलित किया गया है ताकि क्षेत्र की गौरवगाथा जन-जन तक पहुंच सके।
इस पावन अवसर पर महाराज जी के साथ जयपुर से पधारे उनके प्रमुख शिष्य प्रहलाद जी, छोटू राम जी, सीताराम जी, कृष्ण जी, मोहन जी और विकास जी आदि भी मुख्य रूप से मौजूद रहे। सभी शिष्यों ने मंदिर की अलौकिक महिमा, वहाँ की दिव्य व्यवस्था और देवभूमि की इस पावन स्थली के अनुपम सौंदर्य का बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण शब्दों में बखान किया। उन्होंने कहा कि यहाँ आकर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति और परमात्मा दोनों एक ही स्थान पर एकाकार हो गए हैं। अंत में सभी भक्तों ने मां का पावन प्रसाद ग्रहण किया और महाराज जी से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त किया।
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