क्या काल भी हार जाता है इन तीन अक्षरों के आगे? गरुड़ पुराण के पन्नों से सामने आया मृत्यु को झुकाने वाला सबसे बड़ा गुप्त रहस्य!

ख़बर शेयर करें

 

क्या काल भी हार जाता है इन तीन अक्षरों के आगे? गरुड़ पुराण के पन्नों से सामने आया मृत्यु को झुकाने वाला सबसे बड़ा गुप्त रहस्य!

@ रमाकान्त पन्त

प्राचीन धर्मग्रंथों के गर्भ में क्या सचमुच कोई ऐसा अचूक सूत्र छिपा है, जो इंसान को अकाल मृत्यु के मुख से खींच लाने और असाध्य रोगों को परास्त करने की क्षमता रखता है? संक्षिप्त गरुड़ पुराण के आचार काण्ड (अध्याय १८) के दुर्लभ पन्नों से एक ऐसा ही विस्मयकारी और अलौकिक विधान सामने आया है। यह कोई साधारण कथा नहीं, बल्कि स्वयं पक्षीराज गरुड़ द्वारा महर्षि कश्यप को बताया गया वह परम गोपनीय ज्ञान है, जिसे सूतजी ने नैमिषारण्य में ऋषियों के समक्ष प्रकट किया था।

इस रहस्य की धुरी केवल तीन अक्षरों से मिलकर बना एक महामंत्र है—‘ॐ जुं सः’। इसे शास्त्रों में ‘अमृतेश महामंत्र’ की संज्ञा दी गई है। विधान के अनुसार, पहले ओंकार ‘ॐ’, फिर ‘जुं’ (हुं) और अंत में विसर्ग युक्त ‘सः’ का शुद्ध उच्चारण मनुष्य के जीवन से घोर दरिद्रता और मृत्यु के भय को समूल नष्ट कर देता है। इसे त्रिदेवों—शिव, विष्णु और सूर्य सहित सभी देवशक्तियों का मूल कारण माना गया है।

यह भी पढ़ें 👉  शिवांगी बिष्ट बनीं नायब तहसीलदार: आईटीसी यूनिट हेड प्रणव शर्मा ने घर पहुंचकर बढ़ाया मान, दी उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं

गरुड़ पुराण में इस तीन-अक्षरी मंत्र के प्रभाव के जो परिणाम दर्ज हैं, वे किसी को भी स्तब्ध कर सकते हैं:

  • मात्र १०० बार इस मंत्र का जप करने से चारों वेदों के स्वाध्याय, बड़े-बड़े यज्ञों के अनुष्ठान, समस्त तीर्थों में स्नान और महादान के बराबर अक्षय पुण्य फल प्राप्त होता है।
  • तीनों संध्याओं में प्रतिदिन १०८ बार जप करने वाला साधक मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है और जीवन की भयानक से भयानक विघ्न-बाधाओं व शत्रुओं को धूल चटा देता है।
  • सबसे बड़ा रहस्य यह है कि यदि कोई साधक एक माह तक भगवती अमृतादेवी के साथ भगवान अमृतेश्वर का ध्यान करते हुए तीनों संध्याओं में कुल आठ हजार (८,०००) बार इसका अनुष्ठान कर ले, तो वह वृद्धावस्था, काल-मृत्यु और समस्त महाव्याधियों से मुक्त होकर परम शांति का वरण करता है।
यह भी पढ़ें 👉  बदरीनाथ में क्यों नहीं बजता शंख? स्कन्द पुराण के केदारखण्ड में छिपा है बद्रीनाथ महिंमा का  रहस्य; , योगमुद्रा और हिम-विज्ञान का अनूठा संगम

इस गुप्त साधना में ध्यान का स्वरूप भी उतना ही अद्भुत है। धवल श्वेत कमल पर विराजमान भगवान अमृतेश्वर के दो हाथों में वरद व अभय मुद्रा है, जबकि शेष दो हाथों में वे अमृत-कलश धारण किए हुए हैं। उनके वामांग में विराजित अमृतभाषिणी अमृतादेवी के एक हाथ में कलश और दूसरे में खिला हुआ कमल सुशोभित है।

साधना का यह मार्ग अत्यंत सधा हुआ और गूढ़ तांत्रिक षडङ्ग-पूजा से आवेष्टित है। इसमें ‘फट्’ मंत्र से हस्त-ताड़न, ‘हुं’ कवच से देह-शोधन, प्राणायाम तथा हृदयकमल में स्थित आत्मदेव के पूजन का नियम है। इसके उपरांत वेदी पर आधारशक्ति, मातृकाओं, नंदी, गंगा तथा देहली भाग पर महाकाल व यमुना की पूजा के साथ ‘ॐ अमृतेश्वर भैरवाय नमः’ और ‘ॐ जुं हं सः सूर्याय नमः’ जैसे प्रचंड मंत्रों का आह्वान किया जाता है।

यह भी पढ़ें 👉  "पं. तिवारी जी ने बसाया, मुख्यमंत्री धामी संवारेंगे": बिन्दुखत्ता के राजस्व दर्जे पर बोले भाजपा नेता तरुण पंत

यह संपूर्ण विधान केवल मृत्यु-भय को ही नहीं मिटाता, बल्कि साधक को इस संसार के समस्त सुख-ऐश्वर्य (भुक्ति) भोगने के बाद अंत में परम मोक्ष (मुक्ति) की ओर अग्रसर करता है। गरुड़ पुराण का यह अध्याय बताता है कि जब श्रद्धा और सही विधि का संगम होता है, तो विधि का लिखा विधान भी इन तीन अक्षरों के आगे नतमस्तक हो जाता है।

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad