गरुड़ पुराण: पितृ तृप्ति और सुख-समृद्धि का आधार है श्राद्ध; जानिए शुभ अवसर, नियम और फल
— रमाकान्त पन्त
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ ऋण से मुक्ति और पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए श्राद्ध कर्म को सर्वपाप-विनाशी और अत्यंत मंगलकारी माना गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार, श्राद्ध केवल एक अनुष्ठान नहीं बल्कि श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है। इसके लिए अमावस्या, अष्टका, कृष्ण पक्ष, पुत्र जन्म (वृद्धि काल), उत्तरायण, दक्षिणायन, मकर व विषुवत् संक्रांति, सूर्य-चंद्र ग्रहण और गजच्छाया योग जैसे अवसरों को सर्वाधिक उपयुक्त बताया गया है। इसके अलावा, जब भी व्यक्ति के पास श्राद्ध योग्य सामग्री, उत्तम भाव और योग्य ब्राह्मण की उपलब्धता हो, तब श्राद्ध किया जा सकता है।
योग्य ब्राह्मणों की पात्रता और चयन शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म में ब्राह्मण की योग्यता का विशेष महत्व है। वेदों के मर्मज्ञ, युवा अथवा मध्यम वयस्क, सदाचारी, तपस्वी, मातृ-पितृभक्त और ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण को भोजन कराने और दान देने से अक्षय फल मिलता है। इस अवसर पर भानजा, दौहित्र (नाती) और निष्ठावान शिष्य को भी श्रेष्ठ माना गया है। इसके विपरीत महारोगी, आचारभ्रष्ट, अंगहीन और संस्कारहीन व्यक्तियों को श्राद्ध कर्म से दूर रखने का निर्देश दिया गया है।
संक्षिप्त एवं प्रामाणिक विधि विधान श्राद्ध की परंपरा के अनुसार ब्राह्मणों को एक दिन पूर्व ही संयम बरतने के साथ सादर निमंत्रित किया जाना चाहिए। श्राद्ध के दिन पूर्वाह्न काल में ब्राह्मणों को आसन देकर विधिवत पाद्य-अर्घ्य प्रदान किया जाता है। देव कार्य में जौ और पितृ कार्य में तिलों का प्रयोग अनिवार्य होता है। अग्नि में आहुति (अग्नौकरण) देने के बाद शेष हविष्य को पितरों के लिए चांदी या अन्य पवित्र पात्रों में परोसने का विधान है। भोजन के समय मौन रहकर गायत्री मंत्र और पुरुषसूक्त का जप किया जाता है। ब्राह्मणों की पूर्ण तृप्ति के बाद भूमि पर तिल सहित शेषान्न रखकर पिण्डदान, दक्षिणा और ‘स्वधा’ वाचन किया जाता है। अंत में पितरों से कुल की वृद्धि, विद्या, धन और अटूट श्रद्धा की प्रार्थना कर उन्हें विदा किया जाता है।
श्राद्ध की महिमा और प्राप्त होने वाले फल गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि हविष्यान्न से किया गया श्राद्ध पितरों को एक माह और खीर (पायस) से किया गया श्राद्ध पूरे एक वर्ष तक तृप्ति प्रदान करता है। विधिवत श्राद्ध संपन्न करने वाले व्यक्ति को जीवन में आरोग्य, दीर्घायु, यश, वाणिज्य में लाभ, उत्तम संतति और समस्त भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। पितरों की प्रसन्नता से मनुष्य के सभी संकट दूर होते हैं, वर्तमान जीवन में शक्ति व प्रतिष्ठा मिलती है और मृत्यु के उपरांत स्वर्ग तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
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