हल्द्वानी। जीवन यदि निष्ठा, श्रम और अटूट प्रभु-भक्ति की नींव पर गढ़ा जाए, तो वह पूरे समाज के लिए एक आलोक बन जाता है। राजेंद्र नगर, हल्द्वानी के अत्यंत सौम्य और आत्मीय व्यक्तित्व के धनी श्री राम जी लाल गुप्ता का जीवन कुछ ऐसा ही पावन प्रवाह है—जहाँ संघर्ष की तपती धूप भी है और प्रभु चरणों में अगाध समर्पण की शीतल छांव भी। मानवीय मूल्यों, सरलता और आत्मीयता की वे एक जीती-जागती मिसाल हैं।
वर्ष 1960 में उत्तर प्रदेश के जनपद एटा अंतर्गत ग्राम जमालपुर की सोंधी माटी में जन्मे राम जी लाल जी का जीवन-सफ़र संघर्षों की भट्टी में तपकर कुंदन बना है। अपनी जड़ों से निकलकर लगभग चार दशक पूर्व वे हल्द्वानी आए। बीते 40 वर्षों में यह शहर केवल उनका निवास स्थान नहीं रहा, बल्कि उनकी अनवरत साधना की कर्मभूमि बन गया। इस धरा ने उनके पसीने की हर बूँद, उनके अडिग धैर्य और जीवन के थपेड़ों के बीच भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ने के संकल्प को देखा है। शून्य से सृजन तक का उनका यह सफ़र उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं।
राम जी लाल जी के व्यक्तित्व में जो सहज विनम्रता और धर्म के प्रति अनुराग दिखता है, वह उनके पूज्य माता-पिता के दिए अनमोल संस्कारों का ही प्रतिफल है। उनकी पूजनीया माता स्वर्गीय श्रीमती धनवन्ती देवी और पूज्य पिता स्वर्गीय मेवा राम गुप्ता की स्मृतियाँ आज भी उनके अंतर्मन को भावुक कर देती हैं। उनके माता-पिता सादगी, त्याग और ईश्वर-परायणता की साक्षात मूरत थे। आज भले ही वे इस नश्वर संसार में भौतिक रूप से उपस्थित न हों, परंतु उनके द्वारा दिए गए सत्कर्मों और सत्यनिष्ठा के संस्कार राम जी लाल जी की हर सांस और कर्म में जीवित हैं। माता-पिता का स्मरण करते ही उनकी आँखें कृतज्ञता और करुणा से नम हो उठती हैं।
श्री राम जी लाल गुप्ता का हृदय संकटमोचन श्री बालाजी महाराज की अनन्य भक्ति से परिपूर्ण है। धार्मिक आयोजनों और सेवा कार्यों में उनका उत्साह देखते ही बनता है। जब वे तन्मय होकर प्रभु के मधुर भजनों का गान करते हैं, तो वातावरण में एक दिव्य रस घुल जाता है। उनके कंठ से फूटने वाले भजनों में केवल सुर और लय नहीं होती, बल्कि आत्मा का परमात्मा से सीधा और भावुक संवाद होता है, जो हर सुनने वाले के मन को छू लेता है।
उनका दृढ़ विश्वास है कि संसार की सारी चकाचौंध और भौतिक साधन क्षणभंगुर हैं, शाश्वत और परम सुख केवल और केवल ईश्वर के श्रीचरणों में ही समाहित है। यही आध्यात्मिक दृष्टि आज उनके पूरे परिवार की धड़कन बन चुकी है। उनके आँगन में कदम रखते ही संस्कारों की शुचिता, परस्पर आदर और भक्ति की भीनी-भीनी सुगंध स्वतः अनुभव होती है।
आध्यात्मिक पुस्तक ‘जय माँ बगलामुखी’ सप्रेम भेंट: उनकी इसी आध्यात्मिक निष्ठा और प्रेरक जीवन-यात्रा के प्रति श्रद्धाभाव प्रकट करते हुए उन्हें पावन पुस्तक ‘जय माँ बगलामुखी’ भेंट की गई। माँ पीताम्बरा बगलामुखी की कृपा और साधना-महिमा को समेटे इस पावन ग्रंथ को पाकर वे भाव-विभोर हो उठे और इसे माँ भगवती का परम प्रसाद मानते हुए शीश नवाया। इस दौरान सभी ने उनके स्वस्थ, सुदीर्घ और आनंदमय जीवन की मंगलकामना की।
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