रहस्यमयी नागलोक का जीवित प्रमाण: क्या श्रीकृष्ण के आदेश पर हिमालय की इन चोटियों में बसे थे नागराज? जानिए ‘बेणी नाग’ की अनकही गाथा

ख़बर शेयर करें

विशेष संवाददाता, पिथौरागढ़।
उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ की सुरम्य वादियों में स्थित बेरीनाग (बेणी नाग) केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने भीतर सदियों पुराना आध्यात्मिक रहस्य समेटे होने के कारण भी कौतूहल का विषय बना हुआ है। पुराणों में जिस रहस्यमयी भूभाग को ‘नागपुर’ अथवा ‘नागपर्वत’ के नाम से संबोधित किया गया है, वह आज भी नाग संस्कृति और आस्था का जीवंत केंद्र है। यहाँ की पहाड़ियों में आज भी यह गूंज सुनाई देती है कि इन शिखरों पर नाग वंश के धर्मात्मा राजाओं का वास रहा है, जिन्हें आज देवस्वरूप मानकर पूजा जाता है।
नाग देवताओं की स्तुति और सर्पभय से मुक्ति के लिए शास्त्रों में वर्णित यह श्लोक यहाँ की परंपरा में गहराई से रचा-बसा है:
> अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
> शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥
> एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
> सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः। तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥
> (अर्थ: अनन्त, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, कम्बल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक और कालिया—इन नौ महाबली नागों का स्मरण करने वाले मनुष्य को कभी विष या सर्प का भय नहीं रहता और वह सर्वत्र विजयी होता है।)
>
श्रीकृष्ण, कालियानाग और नागपुर का पौराणिक संबंध
जनश्रुतियों और लोकगाथाओं के अनुसार, जब योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना के पावन जल को विषमुक्त करने के लिए कालिया नाग का मानमर्दन किया था, तब पराजित होने के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर कालिया नाग व अन्य नाग समुदाय ने इसी नागपुर (वर्तमान बेरीनाग क्षेत्र) की शांत एवं दुर्गम पर्वतमालाओं को अपना निवास स्थान बनाया। बेरीनाग के आसपास की विभिन्न पहाड़ियों के शिखर आज भी अलग-अलग नाग देवताओं के नाम से सुशोभित हैं, जिनकी आपस में एक गहरी आध्यात्मिक और पौराणिक कड़ी जुड़ी हुई है।
भगवान शिव की अनन्य भक्ति और वरदानी स्वरूप
बेरीनाग का यह पावन भूभाग प्राचीन काल से ही उच्चकोटि के ऋषि-मुनियों की तपस्या स्थली रहा है। मान्यता है कि नाग वंश के प्रतापी राजा भगवान आशुतोष शिव के परम उपासक थे। उनकी घोर शिव भक्ति के प्रताप से ही उन्हें देवताओं के समान पूजनीय और वरदायी होने का वरदान प्राप्त हुआ।
शिव और नागों के इस अटूट संबंध को शिव स्तुति में भी प्रमुखता दी गई है:
> नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
> नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥
> (अर्थ: जिनके कंठ का हार स्वयं नागराज हैं, जो त्रिनेत्रधारी हैं, भस्म जिनका अंगराग है—उन नित्य, शुद्ध और कल्याणकारी महेश्वर शिव को नमस्कार है।)
>
बेणी नाग मंदिर: अतुल ऐश्वर्य और सर्पभय से मुक्ति का धाम
क्षेत्र की सर्वोच्च चोटी पर विराजमान ‘बेणी नाग’ (बेरीनाग) को इस संपूर्ण नगर का अधिष्ठाता देव माना जाता है। जनविश्वास है कि बेणी नाग के दर्शन और विधि-विधान से पूजन करने पर जातक को अतुल ऐश्वर्य, यश और समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा उसके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। इसके अतिरिक्त, यहाँ सच्चे मन से की गई पूजा मनुष्य को जीवन भर के लिए सर्पभय से मुक्त कर देती है। यही कारण है कि वर्ष भर देश-विदेश से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर इस दरबार में शीश नवाने आते हैं।
प्रकृति और देवत्व का अद्भुत संगम
हिमालय की गोद में बसे बेरीनाग की सौंदर्यशाली पर्वतमालाओं से नंदा देवी, त्रिशूल और पंचाचूली जैसी बर्फीली चोटियों के साक्षात दर्शन होते हैं। प्रातःकाल की स्वर्णिम किरणें और संध्या की मनमोहक लालिमा के समय जब हिमालय का विहंगम दृश्य उभरता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं इस नागभूमि की दिव्यता को नमन कर रही हो। नाग मंदिरों के स्वर्णिम इतिहास और देवभूमि के नैसर्गिक सौंदर्य का यह अद्भुत सम्मोहन हर आगंतुक को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

ADVERTISEMENTS
यह भी पढ़ें 👉  नाग पंचमी विशेष: देवदार के अभिशप्त वनों के बीच छुपा है कौन सा रहस्य? जहाँ नागराज स्वयं करते हैं भगवान श्री हरि की पहरेदारी, जानिए डोल के अलौकिक विष्णु धाम की अनसुलझी गाथा
Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad