नाग पंचमी विशेष: हिमालय की उस रहस्यमयी घाटी का सच, जहाँ नागराज करते हैं माँ भद्रकाली की गुप्त आराधना… जानिए हवनतोली और शनिउडियार का दिव्य रहस्य

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शैल शक्ति ब्यूरो / राजेन्द्र पन्त ‘रमाकान्त’
बागेश्वर। देवभूमि उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल में स्थित जनपद बागेश्वर की सुरम्य कमस्यार घाटी केवल अपनी प्राकृतिक छटा के लिए ही नहीं, बल्कि सदियों पुराने ऐसे आध्यात्मिक रहस्यों के लिए भी विख्यात है जो आज भी जनमानस को विस्मय में डाल देते हैं। बासपटान-कांडा मोटर मार्ग पर स्थित यह पावन भूभाग प्राचीन काल में ‘नागभूमि’ व ‘नागपुर’ के नाम से जाना जाता था। स्कंद पुराण के मानसखण्ड में महर्षि वेदव्यास द्वारा वर्णित यह वही तपोभूमि है, जहाँ नागराजाओं, नागकन्याओं और महान ऋषियों ने मिलकर शक्तिस्वरूपा माँ भद्रकाली की अनन्य साधना कर अलौकिक सिद्धियाँ अर्जित की थीं।
ऋषियों की तपोस्थली और शनिउडियार गुफा का महात्म्य
कमस्यार घाटी स्थित ‘शनिउडियार’ की पहचान यहाँ की प्राकृतिक गुफा से है (पर्वतीय भाषा में ‘उडियार’ का अर्थ छोटी प्राकृतिक गुफा होता है)। यह पावन कंदरा कभी कश्यपवंशी महर्षि शाण्डिल्य की कठोर तपोस्थली रही। महर्षि शाण्डिल्य, जो भगवान श्री रामचंद्र जी के पूर्वज महाराज दिलीप के कुलगुरु थे, माँ भद्रकाली के अनन्य उपासक रहे। केदारखण्ड के ६४वें अध्याय में नारदकृत शिव सहस्त्रनाम में भी उनका उल्लेख मिलता है:
> शाण्डिल्यो ब्रह्मशौण्डाख्यः शारदो वैद्यजीवनः॥
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शाण्डिल्य ऋषि के अतिरिक्त यहाँ कुशंडी ऋषि और महर्षि पतंजलि सहित अनेक तपस्वियों ने माँ भद्रकाली के चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित कर दुर्लभ सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।
हवनतोली का रहस्य और पावन भद्रा नदी का प्राकट्य
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, एक बार नाग पर्वत पर निवास करने वाले महाप्रतापी नागों के मन में देवाधिदेव महादेव की प्रेरणा से साक्षात् ब्रह्मदेव के दर्शन की अभिलाषा जागी। नागप्रमुख मूलनारायण जी की अध्यक्षता में एक विराट सभा हुई, जिसमें फेनिल नाग सहित कई प्रमुख नागों ने भाग लिया।
फेनिल नाग के अनुरोध पर महर्षि आस्तीक व अन्य विप्रजनों ने माँ भद्रकाली को प्रसन्न करने के लिए महायज्ञ आरंभ किया। ऋषियों के पावन आवाहन पर यहाँ अमृतमयी ‘भद्रा नदी’ प्रकट हुई। पुराणों में मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक भद्रा नदी में स्नान करने वाला साधक सीधे ब्रह्मलोक का भागी बनता है। जिस पावन वेदी पर ऋषियों और नागों ने यह विराट आहुति दी, वही स्थान आज संसार में हवनतोली के नाम से विख्यात है।
गोपीवन, कामधेनु की सेवा और गोपीश्वर महादेव का प्राकट्य
महायज्ञ की पूर्णता के उपरांत नाग समुदाय ने नागपुर क्षेत्र में पूरे 15 वर्षों तक सुरभि कामधेनु की अनवरत सेवा की। प्रसन्न होकर कामधेनु ने उन्हें विपुल गो-कुल का वरदान दिया। गायों के विचरण के लिए ‘गोपीवन’ चुना गया और उनके संरक्षण का दायित्व नागकन्याओं (गोपियों) को सौंपा गया।
एक दिन शिवलीला के प्रभाव से गायें अचानक ओझल हो गईं। खोजते-खोजते नागकन्याएँ शाण्डिल्य ऋषि की तपो-गुफा के समीप पहुँचीं। गुफा दुर्गम थी, किंतु नागराज मूलनारायण की पुत्री ने माँ भद्रकाली का स्मरण करते हुए निष्कपट भक्ति की शक्ति से गुफा को पार किया। गुफा के पार घने अरण्य में गायों के झुंड के मध्य उन्हें एक दिव्य ज्योतिर्मय शिवलिंग के दर्शन हुए। नागकन्याओं की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें अभीष्ट वर दिया।
कालांतर में यही पावन स्थल ‘गोपीश्वर महादेव’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पुराणों के अनुसार भद्रकाली और गोपीश्वर महादेव के संयुक्त दर्शन से संपूर्ण पृथ्वी की 21 बार परिक्रमा करने जितना पुण्यफल प्राप्त होता है:
> त्रिःसप्तकृत्वः सकलां धरित्रीं प्रक्रम्य यद्याति महीतले वै॥
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रामायण कालीन प्रसंग: सुग्रीव की तपस्या और मूलनारायणी की कृपा
इस पावन क्षेत्र का संबंध त्रेतायुग से भी जुड़ता है। जब बालि ने वानरराज सुग्रीव का राज्य और पत्नी तारा छीन ली, तब व्यथित होकर सुग्रीव ने पवनपुत्र हनुमान जी के साथ इसी क्षेत्र में आकर मूलनारायणी देवी और माँ भद्रकाली की घोर तपस्या की थी। देवी के ही वरदान स्वरूप सुग्रीव का मिलन प्रभु श्री रामचंद्र जी से हुआ और उन्हें खोया हुआ सम्मान व राज्य पुनः प्राप्त हुआ।
नागपर्वतों पर विराजमान दिव्य नाग मंदिर व पुंगीश्वर महादेव
कमस्यार घाटी और आसपास के पर्वत शिखर आज भी नाग देवताओं की जीवंत आस्था के केंद्र हैं:
* पुंगीश्वर महादेव: बेणीनाग के निकट स्थित इस शिवालय के दर्शन वैद्यनाथ और महाकाल से दस गुना अधिक फलदायी माने गए हैं (पूगीश्वरेति विख्यातो देवदेवो महेश्वरः)। मान्यता है कि शिव-विवाह के उपरांत देवगणों ने यहाँ पूगीफल (सुपारी) से शिव-शक्ति का अर्चन किया था।
* नागराज मूलनारायण: वनछोर के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान मूलनारायण जी ने भगवान नारायण से अमरता का वर पाया।
* प्रमुख नाग तीर्थ: फेनिल नाग (धन-धान्य प्रदाता), भद्रनाग (सर्प-भय नाशक), त्रैलोक्य नाग (आरोग्य दाता), धौलीनाग, वासुकी नाग, वेलावती, कालियनाग, कर्कोटक, पुण्डरीक, शतरूप, पिङ्गल और त्रिपुर नाग।
* शक्तिपीठ: कांडा की माँ कालिका, कोटेश्वरी, शाकंभरी देवी और बेणीनाग-गंगोलीहाट मार्ग पर विराजमान भगवती त्रिपुर सुंदरी का दरबार।
यहाँ प्रवाहित होने वाली भद्रा, सरस्वती गंगा, गुप्त सरस्वती, सुभद्रा, चंद्रिका, सोमवती, मधुमती, शकटी, हिमगिरी, पृथा, भुजंगा, नारायणी, गौरी, जटागंगा और सुमेना जैसी पावन नदियाँ इस पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से अभिसिंचित करती हैं।
उपेक्षा के साए में ऐतिहासिक धरोहर: संरक्षण की पुकार
नाग पंचमी के पावन अवसर पर जहाँ समूचे देश में नाग देवताओं की आराधना हो रही है, वहीं नाग संस्कृति और शिव-शक्ति साधना का यह उद्गम स्थल आज भी सरकारी तंत्र की उपेक्षा का दंश झेल रहा है। शाण्डिल्य ऋषि की तपोस्थली शनिउडियार और प्राचीन गोपीश्वर महादेव मंदिर गुमनामी के साए में हैं। यदि शासन-प्रशासन इस ऐतिहासिक व आध्यात्मिक विरासत को संवारकर तीर्थाटन व पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित करे, तो यह क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर आस्था और सांस्कृतिक अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

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