तूफानी बारिश, हजारों का सैलाब और गूंजती एक ही ललकार… क्या बिंदुखत्ता की यह ऐतिहासिक हुंकार हिला पाएगी देहरादून का तख्त?

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लालकुआं / बिंदुखत्ता

आसमान से लगातार बरसता पानी, चारों तरफ जलभराव और मौसम का कड़ा मिजाज… आम दिनों में ऐसी बारिश किसी भी बड़े आयोजन को रद्द कराने के लिए काफी होती, लेकिन बिंदुखत्ता की सड़कों पर जो नजारा दिखा, उसने हर राजनीतिक और प्रशासनिक आकलन को उलट कर रख दिया। सुबह से हो रही झमाझम बारिश भी क्षेत्रवासियों के सीने में दशकों से सुलग रही राजस्व गांव की आग को बुझा नहीं पाई। सवाल उठने लगा है कि क्या हजारों लोगों का यह अप्रत्याशित आक्रोश अब शासन-प्रशासन को दशकों पुराने इस आंदोलन पर निर्णायक फैसला लेने के लिए मजबूर कर पाएगा?

बारिश की बूंदों पर भारी पड़ा जनता का जुनून

निर्धारित समय पर जनता इंटर कॉलेज, जड़ सेक्टर (कार रोड) में जब लोगों का जुटना शुरू हुआ, तो लगा कि मौसम शायद बाधा बन जाएगा। लेकिन देखते ही देखते सैकड़ों की टोली हजारों के विशाल जनसैलाब में तब्दील हो गई। मौसम की विकरालता के बीच जैसे-जैसे बारिश तेज हुई, वैसे-वैसे लोगों के गगनभेदी नारे और बुलंद होते चले गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो बरसती बूंदें आंदोलनकारियों का स्वागत कर रही हों। इस ऐतिहासिक महा रैली की सबसे खास और मजबूत तस्वीर यह रही कि इसमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने अभूतपूर्व संख्या में शिरकत कर आंदोलन की अग्रिम पंक्ति संभाल रखी थी।

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माता महाकाली के जयकारों के साथ भरी हुंकार

महासभा का शुभारंभ आस्था और संकल्प के साथ हुआ। सबसे पहले माता महाकाली के श्री चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद मांगा गया। जय महाकाली के गगनभेदी उद्घोष के साथ जब जनसमूह का काफिला आगे बढ़ा, तो पूरा क्षेत्र आंदोलन के रंगों में रंग गया।

मंच पर जुटे वक्ताओं ने दो-टूक शब्दों में कहा कि बिंदुखत्ता को उसका हक दिलाने का वक्त अब आ चुका है। दशकों से सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पी रही जनता अब आर-पार के मूड में है। वक्ताओं ने चेताया कि सरकार को अब बिना किसी टालमटोल के बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित करने की आधिकारिक अधिसूचना अविलंब जारी करनी चाहिए।

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तहसील मुख्यालय तक निकला ऐतिहासिक पैदल मार्च

महासभा के बाद यह विशाल हुजूम एक अनुशासित लेकिन आक्रोशित जुलूस की शक्ल में लालकुआं तहसील मुख्यालय की ओर कूच कर गया। मीलों लंबे इस जनसैलाब ने जब लालकुआं की सीमा में प्रवेश किया, तो प्रशासनिक महकमे में भी हड़कंप मच गया। तहसील पहुंचकर आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड सरकार को संबोधित एक विस्तृत मांग पत्र (ज्ञापन) सौंपा और चेतावनी दी कि यदि क्षेत्रवासियों के हक में शीघ्र शासनादेश जारी नहीं हुआ, तो यह आंदोलन यहीं नहीं थमेगा।

जन आंदोलन में उमड़ी दिग्गज हस्तियों की मौजूदगी

इस ऐतिहासिक प्रदर्शन को हर वर्ग और विचार का समर्थन मिला। कार्यक्रम में मुख्य रूप से:

  • वन अधिकार संगठन: अध्यक्ष उमेश भट्ट
  • वरिष्ठ जनप्रतिनिधि एवं राजनेता: पूर्व कैबिनेट मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरेंद्र बोरा, हेमवती नंदन दुर्गापाल
  • महिला शक्ति एवं सामाजिक नेतृत्व: संध्या डालाकोटी, ममता बिष्ट, बीना जोशी, उर्मिला धामी
  • प्रमुख आंदोलनकारी व क्षेत्रवासी: अर्जुन नाथ गोस्वामी, प्रकाश उत्तराखंडी, भरत नेगी, बलवंत सिंह बिष्ट, इंदर सिंह पनेरी, खिलाफ सिंह दानू, दलवीर सिंह कपोला, हीरा सिंह बिष्ट, कुंदन सिंह बिष्ट, कैप्टन एस.एस. खनका, रणजीत सिंह गढ़िया, प्रताप सिंह बिष्ट, प्रकाश मिश्रा, धर्म सिंह रमोला, बसंत पांडे, जीवन चंद्र उप्रेती, दीपक जोशी, कमलेश चंदोला, प्रमोद कलोनी, शेखर जोशी, कैलाश जोशी और पवन बिष्ट सहित हजारों की संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।
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खराब मौसम के बीच उम्मीद से कहीं अधिक उमड़ी यह भीड़ साफ संकेत दे रही है कि बिंदुखत्ता की जनता अब फैसले के अंतिम मोड़ पर पहुंच चुकी है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राजधानी देहरादून की सत्ता इस ऐतिहासिक महा रैली का जवाब किस रूप में देती है।

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