पर्वतों के अंतस में छिपा देवभूमि का वो गूढ़ रहस्य जो श्रावण की संक्रांति पर जीवंत होता है

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पर्वतों के अंतस में छिपा देवभूमि का वो गूढ़ रहस्य जो श्रावण की संक्रांति पर जीवंत होता है

उत्तराखंड की ऊंची-नीची पहाड़ियों पर जब मेघों का सुंदर आगमन होता है और रिमझिम फुहारों से धरती का कण-कण महक उठता है, तब पहाड़ों की शांत घाटियों में एक अद्भुत हलचल शुरू हो जाती है। यह समय केवल ऋतु के बदलने का नहीं, बल्कि एक ऐसे गहरे और रहस्यमयी जुड़ाव का है जिसे सदियों से यहां के लोग जीते आ रहे हैं। जब चारों ओर धुंध की सफेद चादर बिछी हो और पहाड़ों के सीने से झरने फूट रहे हों, तब देवभूमि की संस्कृति अपने सबसे सुंदर रंग में रंग जाती है। इस जादुई और पावन समय को जीवंत करता है पहाड़ों का एक अनूठा लोक पर्व, जिसे हम हरेला के नाम से जानते हैं।

यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के बीच के उस अटूट और शाश्वत प्रेम का जीवंत दस्तावेज है, जो हर साल वर्षा ऋतु की पहली दस्तक के साथ और गहरा हो जाता है।
पर्वतीय संस्कृति में इस त्योहार का महत्व इतना गहरा है कि इसके बिना पहाड़ों के अस्तित्व की कल्पना भी अधूरी लगती है। इस पर्व के केंद्र में शिव और शक्ति की आराधना का वह परम सत्य छिपा है जो सृष्टि के सृजन का आधार है। माना जाता है कि इसी पावन बेला में देवाधिदेव महादेव शिव और आदि शक्ति माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। शिव इस जगत के मौन चैतन्य हैं तो शक्ति इस चराचर जगत की साक्षात ऊर्जा यानी हमारी प्रकृति हैं। इसी कारण हमारे पूर्वजों ने इस दिन को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं रखा, बल्कि यह संदेश दिया कि हमारी यह हरी-भरी प्रकृति ही वास्तव में ईश्वर का साक्षात रूप है। जब हम पहाड़ों, नदियों, वनों और मिट्टी को आदर देते हैं, तो हम साक्षात शिव और शक्ति की ही आराधना कर रहे होते हैं। इस पावन अवसर पर यह भाव हर हृदय में जाग्रत होता है कि इस विराट प्रकृति का संरक्षण करना ही शिव-शक्ति की सच्ची और सबसे बड़ी पूजा है।
समय के चक्र के अनुसार, यह अनूठा पर्व आषाढ़ महीने के अंतिम दिनों में शुरू होकर सावन की संक्रांति के ठीक पहले दिन चरम पर पहुंचता है। आमतौर पर अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह जुलाई महीने के मध्य में, यानी सोलह जुलाई के आसपास मनाया जाता है। सावन का पहला दिन, जिसे कर्क संक्रांति भी कहा जाता है, इस उत्सव का मुख्य दिन होता है। यह वह समय होता है जब पूरी प्रकृति अपने चरम यौवन पर होती है और कृषक अपनी फसलों के लिए बादलों की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे होते हैं।
इस पर्व की शुरुआत बेहद शांत और श्रद्धापूर्ण तरीके से त्योहार से ठीक नौ दिन पहले ही हो जाती है। घर की महिलाएं मिट्टी के छोटे-छोटे पात्रों या बांस की टोकरियों में स्वच्छ और उपजाऊ मिट्टी भरती हैं। इसके बाद इस मिट्टी में पांच या सात प्रकार के अनाज, जैसे गेहूं, जौ, सरसों, मक्का, गहत और भट्ट को बड़ी ही श्रद्धा के साथ बोया जाता है। इसे बोने के बाद घर के मंदिर या किसी अंधकारमय कोने में रखा जाता है, ताकि सीधे सूर्य का प्रकाश इस पर न पड़े। प्रकाश से दूर रखे जाने के कारण ही इसके पौधे हल्के पीले और सुनहरे-हरे रंग के उगते हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक और दिव्य लगते हैं। इन नौ दिनों तक प्रतिदिन सुबह इस पर पवित्र जल छिड़का जाता है और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है
जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, टोकरियों में बोए गए बीज नन्हें-नन्हें पौधों का रूप ले लेते हैं। संक्रांति के ठीक एक दिन पहले इन्हें विशेष रूप से सजाया जाता है और मिट्टी के सुंदर खिलौने, जिन्हें डिकारे कहा जाता है और जो शिव-पार्वती के प्रतीक होते हैं, उनके पास स्थापित किए जाते हैं। दसवें दिन, यानी संक्रांति के मुख्य पर्व पर, इस हरेले को काटने की बेहद खूबसूरत और भावुक प्रक्रिया शुरू होती है। घर के वरिष्ठ सदस्य विधि-विधान से पूजा करने के बाद इन हरी-पीली पत्तियों को बड़े आदर के साथ जड़ से काटकर अलग करते हैं।
काटने के बाद इस हरेले को सबसे पहले घर के मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित किया जाता है। इसके बाद, परिवार के पूज्य बड़े अपने से छोटों के सिर और कानों के पीछे इस हरेले के तिनकों को रखकर उन्हें दीर्घायु, समृद्धि और आरोग्यता का आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान कुमाऊंनी भाषा में एक मधुर आशीष गीत गाया जाता है, जिसके बोल हवाओं में गूंज उठते हैं कि तुम जियो हजारों साल, यह हरेला बार-बार तुम्हारे जीवन में आए, तुम दूब की तरह फैलते रहो और बरगद की तरह मजबूत बने रहो। यह दृश्य इतना आत्मीय होता है कि देखने वाले की आंखें श्रद्धा और प्रेम से सजल हो उठती हैं।
इसी पावन दिन पर उत्तराखंड की पहाड़ियों में वृक्षारोपण की एक बेहद गौरवशाली और विशेष महिमा देखने को मिलती है। जब घर के भीतर हरेला काटने और पूजने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो पूरा परिवार और ग्रामीण मिलकर खेतों, पगडंडियों और बंजर ढलानों की ओर निकल पड़ते हैं। इस दिन हर हाथ में एक नन्हा पौधा होता है। पहाड़ों में यह लोक विश्वास आज भी जीवित है कि हरेला के दिन रोपा गया कोई भी पौधा कभी सूखता नहीं है, बल्कि वह पहाड़ों की जड़ों को थामकर सदैव के लिए अमर हो जाता है। लोग फलदार, छायादार और औषधीय पौधे रोपकर धरती माता को उनके आंचल की हरियाली वापस लौटाने का संकल्प लेते हैं। यह वृक्षारोपण केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राणवायु और जीवन को सुरक्षित करने का एक महायज्ञ बन जाता है।
जब घरों में खुशियों का यह अंकुर फूटता है, तो गांवों के प्राचीन देव मंदिरों में भी एक अलौकिक उत्सव का वातावरण बन जाता है। ऊंचे देवदार के वृक्षों के बीच स्थित पत्थरों के प्राचीन शिवालयों में सुबह से ही घंटियों की मधुर ध्वनि गूंजने लगती है। धूणी की पवित्र सुगंध और शंखनाद से पूरा वातावरण आध्यात्मिक हो उठता है। लोग अपने हाथों में सजे-धजे हरेले की थाली लेकर देवालयों की ओर उमड़ पड़ते हैं। स्थानीय देवी-देवताओं को नया अनाज और हरेला अर्पित कर पूरे क्षेत्र की खुशहाली की मन्नतें मांगी जाती हैं। ढोल और दमाऊं की थाप पर देवताओं के आह्वान के स्वर पहाड़ों की कंदराओं से टकराकर एक असीम शांति का अहसास कराते हैं। ऐसा लगता है मानो साक्षात ईश्वर इन पहाड़ों पर उतर आए हों।
इस धार्मिक उल्लास के साथ ही पहाड़ों की वादियों में मेलों, जिन्हें स्थानीय भाषा में कौतिक कहा जाता है, की छटा बिखरा जाती है। दूर-दराज के गांवों से रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्रों में सजे-धजे लोग इन मेलों की ओर खिंचे चले आते हैं। पहाड़ों की संकरी पगडंडियों पर हंसते-गाते लोगों के जनसमूह को देखना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव होता है। मेले के प्रांगण में सजी जलेबियों और बाल मिठाई की दुकानें बच्चों से लेकर वृद्धों तक के चेहरों पर मीठी मुस्कान ला देती हैं। संध्या ढलते ही जब मैदान के मध्य में झोड़ा और चांचरी लोकनृत्यों के घेरे बनते हैं, तो पूरा पहाड़ एक सुर में थिरक उठता है। हुड़के की थाप और सुरीले लोकगीतों के बोल इस कौतिक के उत्साह को आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचा देते हैं।
हरेला पर्व वास्तव में हमें यह सीख देता है कि हम चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न कर लें, हमारा अस्तित्व इसी हरी-भरी प्रकृति की गोद में ही सुरक्षित है। यह त्योहार पहाड़ों की उस समृद्ध परंपरा का दर्पण है जो विज्ञान, अध्यात्म और पर्यावरण संरक्षण को एक सुंदर धागे में पिरोती है। जब पूरा परिवार मिलकर हरेला मनाता है, देव मंदिरों में शीश नवाता है, मेलों की खुशियां बांटता है और नए पौधे रोपता है, तब देवभूमि का हर कोना खुशियों से चहक उठता है। प्रकृति का यह अनुपम उपहार हमें हर साल यह याद दिलाने आता है कि धरती को हरा-भरा रखना ही हमारी सबसे बड़ी पूजा और परंपरा है।

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@# रमाकान्त पन्त#@

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